करुणा की अविरल धारा: निर्मल हृदय से ही भगवत् साक्षात्कार

हरेंद्र सिंह, दैनिक इंडिया न्यूज़ ,नई दिल्ली। मनुष्य-जीवन केवल श्वासों का आवागमन नहीं, अपितु चेतना की एक दीर्घ, दिव्य और दुरूह साधना है। यह साधना बाह्य वैभव से नहीं, अंतरात्मा की परिशुद्धि से संपन्न होती है। जब तक अंतःकरण की धूल झाड़कर उसे निर्मल नहीं किया जाता, तब तक जीवन का कोई भी उपक्रम—चाहे वह संबंधों का हो, धर्म का हो या समाज-निर्माण का—अपने परम फल तक नहीं पहुँच सकता। आज मनुष्य बाह्य जगत् की चकाचौंध में इतना निमग्न है कि उसे अपने ही अंतःकरण की करुण पुकार सुनाई नहीं देती। किंतु सत्य यह है कि आत्मा का शोधन ही जीवन का परम प्रयोजन है।


हमारे संबंध—पति-पत्नी का मधुर बंधन, माता-पिता और संतानों का स्नेह, मित्रों का विश्वास—ये सब केवल सामाजिक अनुबंध नहीं, आत्माओं का पावन संयोग हैं। जब इन संबंधों में अहंकार का अंधकार प्रवेश कर जाता है, तब प्रेम का उज्ज्वल दीपक मंद पड़ने लगता है। मनुष्य अपने स्वार्थ, अपनी वासना, अपने मान-अपमान के जाल में ऐसा उलझ जाता है कि उसे सामने खड़ा अपना ही प्रियजन पराया प्रतीत होने लगता है। यदि उसी क्षण वह ठहरकर अपने अंतःकरण में झाँके, तो पाएगा कि द्वेष का मूल किसी और में नहीं, उसी के भीतर पल रहा है। आत्मपरिष्कार की प्रथम सीढ़ी यही है—दोषारोपण से पूर्व आत्मावलोकन।


वेदांत का घोष है कि यह समस्त जगत् एक ही परम चेतना की अभिव्यक्ति है। यदि समस्त प्राणी उसी एक परम तत्त्व के अंश हैं, तो किसी के प्रति घृणा करना वस्तुतः अपने ही अस्तित्व का अपमान करना है। मीमांसा हमें कर्म की पवित्रता का उपदेश देती है—कर्म ऐसा हो जो अंतःकरण को और अधिक स्वच्छ करे, जो संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाए। जब कर्म में करुणा का संचार होता है, तब वह केवल क्रिया नहीं रह जाता, साधना बन जाता है।


रामायण में प्रभु राम का जीवन त्याग, मर्यादा और करुणा की अनुपम गाथा है। वनगमन की वेला में उन्होंने न किसी के प्रति रोष प्रकट किया, न किसी को दोषी ठहराया; उन्होंने परिस्थितियों को भी प्रेम से आलिंगन किया। यही कारण है कि उनका चरित्र आज भी मानवता के हृदय में दीपशिखा की भाँति प्रज्वलित है। श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन विषाद से आकुल होकर शस्त्र त्याग देता है, किंतु जब उसे ज्ञान का आलोक प्राप्त होता है, तब वह समझता है कि मोह और ममता से ऊपर उठकर धर्ममय आचरण ही आत्मोद्धार का मार्ग है। यह विषाद से विजय की यात्रा, प्रत्येक मनुष्य की आंतरिक यात्रा है।


आज परिवारों में विघटन है, दांपत्य जीवन में दरारें हैं, मित्रताओं में अविश्वास है। किंतु क्या इन सबका मूल कारण बाह्य परिस्थितियाँ हैं? नहीं—मूल कारण है हृदय की कठोरता, संवेदना का क्षय, और करुणा का अभाव। यदि पति-पत्नी एक क्षण के लिए अपने-अपने अहं को त्यागकर केवल यह स्मरण कर लें कि वे एक-दूसरे के जीवन-सहचर हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं; यदि वे एक-दूसरे की वेदना को अपनी वेदना मान लें, तो कितने ही विवाद उसी क्षण शमन हो जाएँ। जब माता-पिता संतान में अपने स्वप्न नहीं, अपितु उसके स्वभाव का सम्मान देखें; जब संतान माता-पिता में अनुशासन नहीं, अपितु अनुभव का आशीर्वाद देखे—तब घर पुनः स्वर्गोपम बन सकता है।


करुणा वह अमृतधारा है जो पत्थरवत् कठोर हृदय को भी पुष्पवत् कोमल बना देती है। करुणा का अर्थ केवल आँसू बहाना नहीं, अपितु दूसरे के दुःख को हृदय में स्थान देना है। जब हम किसी के अपराध के पीछे छिपी उसकी पीड़ा को समझने लगते हैं, तब प्रतिशोध का स्थान क्षमा ले लेती है। क्षमा कोई दुर्बलता नहीं, अपितु आत्मबल की पराकाष्ठा है। जो क्षमा कर सकता है, वही वास्तव में विजयी है।


मानव चेतना का परिष्कार बाह्य उपदेशों से नहीं, आत्मानुभूति से होता है। प्रतिदिन कुछ क्षण स्वयं के साथ बिताइए—अपने विचारों को परखिए, अपनी प्रतिक्रियाओं को समझिए, अपने शब्दों को तौलिये। क्या वे किसी को आहत कर रहे हैं? क्या उनमें अहं की गंध है? यदि हाँ, तो उन्हें परिवर्तित कीजिए। धीरे-धीरे यह अभ्यास हृदय को निर्मल कर देगा। निर्मल हृदय में ही प्रेम का अंकुर फूटता है, और प्रेम से ही समस्त संबंधों में नवजीवन का संचार होता है।


अंततः स्मरण रहे—बिना करुणा और प्रेम के भगवत् प्राप्ति भी संभव नहीं। जब तक हमारे अंतःकरण में निर्मलता का उदय नहीं होगा, तब तक प्रेम का जन्म नहीं होगा; और जब तक प्रेम का जन्म नहीं होगा, तब तक भगवत् साक्षात्कार भी असंभव रहेगा। परमात्मा किसी बाह्य आडंबर में नहीं, अपितु उस करुणा-सिक्त हृदय में निवास करता है जो समस्त सृष्टि को अपना ही विस्तार मानता है। यदि हम सचमुच दिव्यता का अनुभव करना चाहते हैं, तो पहले अपने हृदय को करुणा की गंगाजल से पवित्र करें। संभव है, इस मार्ग पर चलते-चलते हमारी आँखों से पश्चात्ताप और प्रेम के आँसू बहें—पर वही आँसू आत्मा के शुद्धिकरण का प्रथम अभिषेक होंगे।

Share it via Social Media

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *