
दैनिक इंडिया न्यूज़, मध्य प्रदेश – जिस बेटे के लिए मां ने सालों तक मन्नतें मांगीं, जिसे जन्म देने के लिए विज्ञान की सहायता ली, उसी मासूम की सांसें उसने अपने ही हाथों से छीन लीं। यह घटना केवल एक हत्या की कहानी नहीं, बल्कि एक कड़वा सच है, जो बताता है कि क्रोध का एक क्षण किस तरह पूरे जीवन को बर्बाद कर सकता है।
गुना जिले की चौधरन कॉलोनी में 15 वर्षीय अभ्युदय जैन की रहस्यमयी मौत ने सभी को झकझोर दिया। पहले यह आत्महत्या प्रतीत हो रही थी, लेकिन जब पुलिस ने गहराई से जांच की, तो सामने आया कि जिस मां ने संतान सुख के लिए वर्षों तक संघर्ष किया, उसी ने अपने ही बेटे की जान ले ली।
एक दिन में सब कुछ खत्म
14 फरवरी की शाम अभ्युदय का शव बाथरूम में पड़ा मिला। उसकी मां अलका जैन ने पुलिस को बताया कि वह बैडमिंटन खेलकर लौटी तो दरवाजा अंदर से बंद था। जब दरवाजा खुलवाया गया, तो बेटा बेसुध पड़ा था। पहले इसे आत्महत्या बताया गया, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने सच्चाई खोल दी – उसकी हत्या की गई थी।
तीन डॉक्टरों के पैनल ने जब शव का परीक्षण किया, तो स्पष्ट हुआ कि अभ्युदय की मौत गला दबाने से हुई थी। पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ाया, मकान मालिक, नौकरानी और पड़ोसियों से पूछताछ की। CCTV फुटेज खंगाले गए और मां अलका के बयानों में विरोधाभास मिलने लगा।
घर की नौकरानी ने बताया कि वह दोपहर 2:30 बजे घर से निकली थी, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, अभ्युदय की मौत इसके करीब एक घंटे बाद हुई। पुलिस को शक हुआ और गहराई से पड़ताल करने पर यह सच सामने आया कि जिस मां ने उसे जन्म दिया था, उसी ने गुस्से में उसकी जान ले ली।
क्रोध – जो अपनों को भी छीन लेता है
मां अलका ने पुलिस को बताया कि बेटा उसे हर बात पर टोकता था – “ऐसे कपड़े मत पहनो, यह बिंदी मत लगाओ।” यह बातें उसे चुभती थीं। घटना वाले दिन भी दोनों के बीच कहासुनी हुई। जब बेटा गुस्से में बाथरूम की ओर भागा, तो मां ने उसे रोकने की कोशिश की। इसी दौरान अभ्युदय की चांदी की चेन खिंच गई और गला घुटने से उसकी जान चली गई।
सोचिए – क्या यह क्षणिक क्रोध की कीमत थी?
जिस मां ने संतान के लिए न जाने कितनी मन्नतें मांगी थीं, वह एक झटके में सब कुछ खत्म कर बैठी। यह केवल एक हत्या नहीं, बल्कि एक चेतावनी है – क्रोध अंधा होता है, यह अपनों को भी छीन सकता है।
आज अलका जेल में है, पति अनुपम जैन अपनी पत्नी को छुड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन क्या कोई भी दलील उस बेटे को वापस ला सकती है? क्या कोई पछतावा उस एक क्षण को बदल सकता है?
क्रोध पर नियंत्रण रखना जरूरी है
यह घटना हमें सिखाती है कि एक क्षण का आवेश पूरा जीवन बर्बाद कर सकता है। परिवार, रिश्ते, प्रेम – सब कुछ गुस्से की आग में जल सकता है।
इस खबर को केवल पढ़कर भूल मत जाइए। इसे एक चेतावनी समझिए। इससे पहले कि क्रोध आपके रिश्तों को लील ले, उसे नियंत्रित करना सीखिए। वरना यह केवल पछतावा और अधूरी कहानियां छोड़ जाता है।
संस्कारों से जुड़ें, क्रोध से बचें
अगर हम अपने संस्कारों और धर्म की शिक्षाओं को अपनाएं, तो ऐसे हृदयविदारक अपराधों से बचा जा सकता है। संस्कार हमें संयम और धैर्य सिखाते हैं, जिससे क्रोध पर नियंत्रण रखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता और संतान के बीच स्नेह का गहरा संबंध बताया गया है, लेकिन आधुनिकता की दौड़ में यह भावनाएं कमजोर होती जा रही हैं। अगर हम अपने जीवन में धैर्य, सहनशीलता और प्रेम को प्रधानता दें, तो न केवल परिवार मजबूत होगा, बल्कि समाज में इस तरह की घटनाएं भी कम होंगी।
भगवद गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्रोध के दुष्परिणाम समझाते हुए कहा है:
“क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥” (भगवद गीता – अध्याय 2, श्लोक 63)
अर्थात, क्रोध से भ्रम उत्पन्न होता है, भ्रम से स्मृति नष्ट हो जाती है, स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है और जब बुद्धि नष्ट हो जाती है, तो व्यक्ति का पतन हो जाता है। यही इस घटना में देखने को मिला – एक क्षणिक क्रोध ने मां को अपनी संतान का हत्यारा बना दिया। अगर हम अपने संस्कारों और धार्मिक शिक्षाओं को अपनाएं, आत्मसंयम रखें और क्रोध पर नियंत्रण पाएं, तो इस तरह की दुखद घटनाएं कभी नहीं होंगी।