

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ। प्रताप नगर स्थित शिव विहार में आयोजित हिंदू सम्मेलन उस दिन केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह भारत की सुप्त चेतना से संवाद करता हुआ एक वैचारिक महायज्ञ बन गया। अनिल जी, विभाग प्रचारक लखनऊ, अवध प्रांत (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के आगमन के साथ ही वातावरण में जो कंपन उत्पन्न हुआ, वह औपचारिक स्वागत का नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय आत्मा के जागरण का संकेत था, जिसकी आज भारत को सर्वाधिक आवश्यकता है। उपस्थित जनसमूह श्रोता नहीं था—वह अपने गौरवशाली अतीत, विचलित वर्तमान और उत्तरदायित्वपूर्ण भविष्य के मध्य आत्मबोध का सेतु तलाश रहा था।

अनिल जी ने उद्घाटन में कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष के अवसर पर संपूर्ण भारतवर्ष में 80,000 से अधिक हिंदू सम्मेलनों के माध्यम से समाज को पुनः वैचारिक रूप से जाग्रत करने का विराट अभियान चला रहा है। राजधानी लखनऊ में ही 400 से अधिक सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं। यह अभियान किसी उत्सवधर्मिता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना का पुनर्जागरण है, जिसने कभी भारत को विश्वगुरु के सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया था, किंतु आज आत्मविस्मृति और बौद्धिक शैथिल्य के कारण सुषुप्तावस्था में चली गई है।
अनिल जी ने स्पष्ट किया कि संघ का यह शताब्दी प्रयास हिंदू समाज को स्मरण कराने का है कि राष्ट्र केवल भू-खंड नहीं, वह संस्कार, चेतना, त्याग और अनुशासन की जीवंत अभिव्यक्ति है। उन्होंने चेताया—
“जब समाज सजग होता है, तब राष्ट्र अजेय रहता है; और जब समाज सो जाता है, तब इतिहास गुलामी के अध्याय लिखता है।”
उन्होंने शिक्षा और विद्या के अंतर को उजागर करते हुए कहा कि आज की सबसे बड़ी राष्ट्रीय विडंबना यह है कि समाज ने शिक्षा तो अंगीकार कर लिया है, किंतु विद्या को विस्मृत कर दिया है। शिक्षा जीविका का साधन है, पर विद्या जीवन का शिल्प है। शिक्षा व्यक्ति को दक्ष बनाती है, विद्या उसे चरित्रवान बनाती है। शिक्षा रोजगार देती है, विद्या राष्ट्र को नेतृत्व प्रदान करती है। जब विद्या का स्थान केवल शिक्षा ले लेती है, तब समाज प्रतिभाशाली तो बनता है, पर विवेकहीन हो जाता है।
अनिल जी ने स्मरण कराया कि गुलामी से पूर्व भारत की पहचान विद्यालयों से नहीं, गुरुकुलों से थी। वहाँ अध्ययन केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं था; शिष्य को यह सिखाया जाता था कि वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्र के लिए जिए। गुरुकुलों में बालक यह नहीं पूछता था कि मुझे क्या मिलेगा, बल्कि यह सीखता था कि मुझे क्या देना है। वहीं से मातृप्रेम, मातृभाषा और भारत माता के प्रति अनुराग अंकुरित होता था—यही विद्या थी, यही भारत की आत्मा थी।
सभा को मौन में डुबो देने वाले क्षण में अनिल जी ने इतिहास की उस विद्रोही और ज्वलंत कथा का स्मरण कराया, जो विद्या-संस्कार की शक्ति का शाश्वत प्रमाण है। मुगल आक्रांताओं के काल में एक माँ अपनी पाँच वर्षीय पुत्री से कहती है—“बेटी, तुम यहीं रहो, मैं शिवलिंग पर जलाभिषेक करने जा रही हूँ।” पर बालिका हठ करती है—“मैं भी चलूँगी।”
मंदिर पहुँचते ही बालिका ने देखा—एक मुगल आक्रांता शिवलिंग के ऊपर पैर रखकर खड़ा है, जैसे वह केवल पत्थर नहीं, बल्कि भारत की आस्था, अस्मिता और स्वाभिमान को रौंद रहा हो। माँ आगे बढ़ती है, पर बालिका दृढ़ स्वर में कहती है—
“हम शिव से प्रेम करते हैं, और यह आक्रांता हमारे शिव का तिरस्कार कर रहा है। परतंत्रता में किया गया जलाभिषेक भक्ति नहीं, अपमान है। जब तक हमारे शिव स्वतंत्र नहीं, तब तक हमारा शीश कैसे उठेगा।”
अनिल जी ने कहा—यह किसी पाठ्यक्रम की उपज नहीं थी, यह विद्या के संस्कार का प्रतिफल था। उसी क्षण उस बालिका के प्राणों ने केवल जल नहीं रोका, बल्कि मुगलों की गुलामी को चुनौती देने का संकल्प लिया। यही संकल्प आगे चलकर एक वीर का रूप धारण करता है, जो बारह वर्ष की आयु में परतंत्रता से युद्ध का मार्ग चुनता है—और इतिहास में अमर हो जाता है।
अपने उद्बोधन के अंतिम चरण में अनिल जी ने हिंदू समाज को आत्ममंथन का दर्पण दिखाते हुए कहा—आज हम सुख, विलास और प्रदर्शन पर अपार संसाधन व्यय करते हैं, किंतु अपने संगठन, चरित्र और लोकशक्ति पर नहीं। यदि यही ऊर्जा राष्ट्रनिर्माण में प्रवाहित हो जाए, तो भारत को कोई शक्ति पुनः पराधीन नहीं बना सकती।
अंततः उन्होंने युवाओं से आह्वान किया—
“केवल शिक्षित बनना पर्याप्त नहीं, विद्वान बनो। नौकरी पाना लक्ष्य नहीं, राष्ट्र के योग्य बनना लक्ष्य रखो। तुम उपभोक्ता बनने के लिए नहीं जन्मे हो—तुम भारत के योद्धा हो।”
कार्यक्रम में मुख्य रूप से संयोजक मंडल अखंड शुक्ला, आशुतोष सिंह, रुद्र प्रताप सिंह, हर्ष पांडे, सुनील सिंह, डॉ. टोडर मल्ल, प्रदीप वैश्य, अतुल वर्मा, डीडी मिश्र, प्राचार्य के.के., सी. नमीता शर्मा, प्रताप नगर संघ चालक के.सी. शाह, नगर कार्यवाह अमित कुमार अग्रवाल और नगर सहकारवाह धर्मेंद्र मिश्र सहित संपूर्ण प्रताप नगर कार्यकारिणी ने अपने समर्पण और सक्रिय योगदान से सभा को विशेष प्रभाव और गरिमा प्रदान की। उनकी संगठित उपस्थिती ने इस आयोजन को केवल एक सामान्य सभा नहीं, बल्कि सशक्त राष्ट्रीय चेतना और संगठित हिंदू समाज का प्रबुद्ध मंच बना दिया।
