
हरेंद्र सिंह ,दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली। मानव-जीवन के गहनतम प्रश्नों में यदि कोई जिज्ञासा सर्वाधिक प्राचीन, सर्वाधिक सूक्ष्म और सर्वाधिक दार्शनिक रही है, तो वह है—“प्रारब्ध क्या है?” यह प्रश्न केवल भाग्य-चिन्तन का विषय नहीं, अपितु आत्मतत्त्व की मीमांसा का प्रवेश-द्वार है। परम विद्वान महामंडलेश्वर, वेदान्त-वक्ता पूज्य अभयानन्द सरस्वती के ओजस्वी संभाषण में यह तथ्य उद्घाटित हुआ कि प्रारब्ध को समझे बिना न तो कर्म का मर्म उद्घाटित होता है और न ही आत्मबोध का प्रकाश पूर्णरूपेण प्रकट होता है। प्रारब्ध वह अदृश्य सूत्र है, जो अतीत के संस्कारों को वर्तमान की परिस्थितियों से जोड़ता है और भविष्य के पथ का संकेत देता है।
शास्त्रीय परिभाषा में ‘प्रारब्ध’ उस कर्मफल को कहा गया है, जिसका भोग वर्तमान जन्म में अनिवार्यतः आरम्भ हो चुका है। वेदान्त के आचार्यों ने कर्म को त्रिविध स्वरूप में निरूपित किया है—संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण। संचित कर्म वह अनन्त कर्म-संचय है, जो जीव के साथ अनादि से संलग्न है; प्रारब्ध उसी संचित का वह परिपक्व अंश है, जो इस जन्म में फलस्वरूप प्रकट हो रहा है; और क्रियमाण वह कर्म है, जो वर्तमान में संपादित होकर भविष्य के संचित में परिवर्तित होगा। इस प्रकार प्रारब्ध कोई आकस्मिक दैविक विधान नहीं, बल्कि हमारे ही पूर्वकृत कर्मों की अनिवार्य परिणति है।
अद्वैत वेदान्त के आलोक में प्रारब्ध की स्थिति और भी सूक्ष्म हो जाती है। शंकराचार्य का प्रतिपादन है कि आत्मा स्वभावतः असंग, निरवयव और अविकार है; कर्म-बंधन का अनुभव जीवभाव में होता है, आत्मभाव में नहीं। ज्ञानी पुरुष प्रारब्ध का भोग करते हुए भी उससे आन्तरिक रूप से असंपृक्त रहते हैं। उनके लिए प्रारब्ध केवल देहधर्म है, आत्मधर्म नहीं। जब तक प्रारब्ध कर्म का क्षय नहीं होता, तब तक देह-यात्रा चलती रहती है; परन्तु आत्मा की साक्षीचेतना उस समस्त अनुभूति से परे स्थित रहती है। यही साक्षीभाव प्रारब्ध को दासता से साधना में रूपान्तरित कर देता है।
पूर्वमीमांसा दर्शन कर्म की अनिवार्यता पर विशेष बल देता है। उसके अनुसार प्रत्येक विधिसम्मत कर्म ‘अपूर्व’ नामक अदृश्य शक्ति का सृजन करता है, जो कालान्तर में फलरूप में अभिव्यक्त होती है। यही अपूर्व प्रारब्ध का आधार है। इस दृष्टि से प्रारब्ध न तो ईश्वर की मनमानी है और न अंधी नियति; वह नैतिक व्यवस्था की सूक्ष्म परिणति है। यह सिद्धान्त मानव को गहन उत्तरदायित्व का बोध कराता है—क्योंकि कोई भी कर्म, कोई भी संकल्प, कोई भी विचार ब्रह्माण्डीय व्यवस्था में निष्फल नहीं होता।
सांख्य दर्शन प्रकृति और पुरुष के तत्त्व-विभाग के माध्यम से प्रारब्ध को समझाता है। प्रकृति के त्रिगुण—सत्त्व, रज और तम—जीव के अनुभवों का ताना-बाना रचते हैं। जब पुरुष इन गुणों से तादात्म्य करता है, तब वह सुख-दुःख को अपना मानता है; किंतु विवेक-ज्ञान से जब वह अपने शुद्ध चैतन्यस्वरूप को पहचान लेता है, तब प्रारब्ध की अनुभूति परिवर्तित हो जाती है। दुःख आता है, परन्तु आत्मा विचलित नहीं होती; सुख आता है, परन्तु अहंकार उद्भूत नहीं होता। यही विवेक प्रारब्ध पर आन्तरिक विजय का मार्ग है।
योगदर्शन में प्रारब्ध का सम्बन्ध संस्कारों और क्लेशों से जोड़ा गया है। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—ये पंच क्लेश कर्मबीजों को उत्पन्न करते हैं, जो जन्म-मृत्यु के चक्र को गतिमान रखते हैं। साधना, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान के माध्यम से जब संस्कार-बीज क्षीण होते हैं, तब प्रारब्ध की जकड़न शिथिल होने लगती है। यहाँ बाह्य परिस्थितियों का परिवर्तन गौण है; अन्तःकरण की शुद्धि ही वास्तविक मुक्ति का आधार है।
भगवद्गीता में पुरुषार्थ और प्रारब्ध का अद्वितीय समन्वय दृष्टिगत होता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं—“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” फल—जो प्रारब्ध के रूप में प्राप्त होता है—उसका समत्व से स्वीकार ही योग है। परिस्थिति हमारे अधिकार में नहीं, परन्तु उसके प्रति हमारी प्रतिक्रिया पूर्णतः हमारे विवेक पर निर्भर है। प्रारब्ध जीवन का मंच है; पुरुषार्थ उस मंच पर किया गया अभिनय। मंच अपरिवर्तनीय हो सकता है, परन्तु अभिनय की गरिमा हमारे संकल्प से निर्धारित होती है।
अतः प्रारब्ध को निष्क्रिय भाग्यवाद समझना दार्शनिक भ्रान्ति है। वह जीवन की पृष्ठभूमि अवश्य है, किन्तु वह मनुष्य को जड़ नहीं बनाता। यदि प्रारब्ध दुःख प्रदान करता है, तो वह धैर्य और सहिष्णुता की परीक्षा है; यदि सुख देता है, तो वह विनम्रता और संयम की कसौटी है। दोनों ही स्थितियाँ आत्मोन्नति के साधन बन सकती हैं, यदि चेतना साक्षीभाव में स्थित हो।
परम विद्वान महामंडलेश्वर अभयानन्द सरस्वती के वचनों में प्रारब्ध का सार यह है कि “जीवन नियति और पुरुषार्थ का समन्वित नृत्य है।” अतीत की प्रतिध्वनि वर्तमान में सुनाई देती है, और वर्तमान का प्रत्येक संकल्प भविष्य का प्रारब्ध रचता है। इस चिरंतन चक्र में निराशा का स्थान नहीं, अपितु जागरूकता का आवाहन है। जब मनुष्य साक्षीभाव, समत्व और धर्मनिष्ठ कर्म के साथ जीवन-यात्रा करता है, तब प्रारब्ध उसके लिए बंधन नहीं, बल्कि आत्मबोध की सीढ़ी बन जाता है।
इसी समन्वित दृष्टि में प्रारब्ध की परम मीमांसा निहित है—नियति को स्वीकार करना, पुरुषार्थ से उसे आलोकित करना, और आत्मा को कर्म-बंधन से परे पहचानना। यही दर्शन मानव-जीवन को अर्थ, उत्तरदायित्व और अन्ततः मोक्ष की दिशा प्रदान करता है।
