वारंटी का खेल या उपभोक्ता के साथ छल?45 मिनट में बदला स्टेटस, 62 हजार की मांग ने खड़े किए गंभीर सवाल


दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।राजधानी लखनऊ के राणा प्रताप मार्ग स्थित अधिकृत सर्विस पार्टनर Shalimar Logics पर लगे आरोपों ने उपभोक्ता अधिकारों की बहस को अचानक तीव्र और असहज बना दिया है। मामला अब किसी एक डिवाइस की तकनीकी खामी तक सीमित नहीं रहा—यह वारंटी की विश्वसनीयता, सर्विस प्रक्रिया की पारदर्शिता और कॉरपोरेट जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है।
लखनऊ निवासी जमील खान का दावा है कि उनका फोल्डेबल स्मार्टफोन OnePlus Open वारंटी अवधि में था। समस्या मामूली प्रतीत होती थी—कैमरे में डस्ट। इससे पहले दो बार “रिपेस्टिंग” की जा चुकी थी, किंतु समाधान अधूरा रहा। तीसरी बार जब डिवाइस जमा किया गया, तब भी वारंटी शेष थी—ऐसा उपभोक्ता का कहना है, और यह विवरण कथित रूप से जॉब शीट में भी दर्ज था।
13 नवंबर 2025 को सूचना मिली—फोन सर्विस होकर तैयार है। अगले दिन कर्मचारी प्रमोद डिवाइस लेने पहुँचे। काउंटर से मोबाइल लिया गया, रसीद औपचारिक रूप से पूरी हुई, और मामला सामान्य प्रतीत हुआ। परंतु कहानी यहीं से मोड़ लेती है।
जब फोन उपभोक्ता को सौंपा गया, तो पहली ही नज़र में साइड फ्रेम पर डेंट दिखाई दिया। फोन ऑन किया गया—डिस्प्ले पर स्पष्ट लाइन उभर आई। यह वही डिवाइस था जो कैमरे में धूल की शिकायत के साथ दिया गया था, न कि बाहरी क्षति या स्क्रीन दोष के साथ। सवाल उठा—यह क्षति कब और कैसे हुई?
शिकायत तत्काल पुनः दर्ज कराई गई। प्रारंभिक प्रतिक्रिया, उपभोक्ता के अनुसार, आश्वस्त करने वाली थी—फोन वारंटी में है, समस्या ठीक कर दी जाएगी। कर्मचारी को 40–45 मिनट प्रतीक्षा करने को कहा गया। प्रतीक्षा समाप्त हुई—पर स्थिति बदल चुकी थी।
कथित रूप से उसी डिवाइस को “आउट ऑफ वारंटी” घोषित कर दिया गया। अब दावा किया गया कि फोन में “लिक्विड डैमेज” है। समाधान? डिस्प्ले बदलना होगा—और उसके लिए 60 से 62 हजार रुपये का भुगतान करना होगा। जिम्मेदारी उपभोक्ता पर डाल दी गई।
यहीं से विवाद तकनीकी दायरे से निकलकर विश्वसनीयता के प्रश्न में बदल जाता है। यदि कुछ ही मिनट पहले तक डिवाइस वारंटी में था, तो अचानक उसकी स्थिति कैसे परिवर्तित हो गई? यदि लिक्विड डैमेज था, तो पहले क्यों नहीं बताया गया? यदि वारंटी समाप्त थी, तो जाँच और रिसीविंग किस आधार पर की गई? प्रश्न छोटे नहीं हैं—और इनके उत्तर भी साधारण नहीं हो सकते।
जमील खान ने विधिक नोटिस प्रेषित कर दिया है। आवश्यकता पड़ने पर वे उपभोक्ता फोरम और सिविल न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि यह संघर्ष केवल धन-वापसी या मरम्मत का नहीं, बल्कि उस विश्वास की रक्षा का है, जिसके आधार पर उपभोक्ता अधिकृत सर्विस सेंटरों को अपना महंगा उपकरण सौंपते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे विवादों की जड़ में प्रायः प्रक्रियागत अस्पष्टता होती है। यदि सर्विस से पहले और बाद की फोटो-रिकॉर्डिंग अनिवार्य हो, जॉब शीट में स्पष्ट तकनीकी टिप्पणियाँ दर्ज हों, और वारंटी स्थिति का डिजिटल टाइम-स्टैम्प सुरक्षित रहे, तो इस प्रकार के विवाद न्यूनतम हो सकते हैं। सेवा में कमी को उपभोक्ता कानून गंभीरता से देखता है—और पारदर्शिता को सर्वोच्च मानता है।
यह मामला केवल एक सर्विस सेंटर तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है, जहाँ उपभोक्ता अक्सर तकनीकी शब्दावली और प्रक्रियात्मक जटिलताओं के बीच स्वयं को असहाय महसूस करता है। तकनीक जितनी परिष्कृत हुई है, जवाबदेही भी उतनी ही कठोर होनी चाहिए।
लखनऊ की यह घटना चेतावनी भी है और कसौटी भी। चेतावनी—कि सेवा क्षेत्र में लापरवाही या अस्पष्टता अब प्रश्नों से बच नहीं सकती। कसौटी—कि यदि निष्पक्ष जाँच और पारदर्शी समाधान सामने आता है, तो उद्योग के लिए यह सुधार का अवसर सिद्ध हो सकता है।
एक मोबाइल फोन से उठी यह आवाज अब व्यापक विश्वास की परीक्षा बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि 45 मिनट में बदला गया “स्टेटस” केवल तकनीकी प्रविष्टि थी—या उपभोक्ता अधिकारों की गंभीर अनदेखी।
यदि सत्य पारदर्शी रूप से सामने आता है, तो यह केवल एक उपभोक्ता की जीत नहीं होगी—यह उस समाज की जीत होगी, जो अधिकारों के साथ जवाबदेही की भी समान अपेक्षा रखता है।

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