
धर्मध्वज के आकाशारोहण से धरा कंपित—अयोध्या में वैदिक ज्योति का पुनः प्रस्फुटन”

दैनिक इंडिया न्यूज़, अयोध्या धाम। अयोध्या धाम आज उस दिव्य प्रभात का आलोक बनकर उदित हुआ, जिसके स्वागत में मानो समूचे भारत का हृदय एक साथ धड़क उठा हो। सदियों की तपस्या, त्याग, संघर्ष और अविच्छिन्न आस्था के तेज से सिंचित यह क्षण जब आकार ले रहा था, तब लगता था कि स्वयं काल भी अपनी गति रोककर इस ऐतिहासिक दृश्य का साक्षी बनने को ठिठक गया है। रामलला के प्रांगण में व्याप्त वह दैदीप्य—जिसमें दीपों की पंक्तियाँ, वैदिक ऋचाओं की ध्वनि और श्रद्धालुओं की उमंग सब एकाकार थे—देखने वालों के मन को ऐसे आलोकित कर रहा था, मानो आत्मा के किसी गहरे कोने में सदियों से प्रतीक्षित आशा आज मूर्तिमान हो उठी हो।

जब मुख्यमंत्री मंच पर पधारे, तो पंडाल “जय श्रीराम!” के अदम्य, आकाश-भेदक नारों से थर्रा उठा। ऐसा दृশ্য था जिसमें जन-मन की ऊर्जा स्वयं एक तीर्थ बन गई हो। हर नारा एक नई शक्ति, हर स्वर एक नया संकल्प, और हर आँख अपने आराध्य के पुनरागमन की दीप्ति से चमकती हुई। यह केवल शोर नहीं था—यह सदियों की वेदना, प्रतीक्षा, अन्याय और संघर्ष का उफान था, जो आज आनंद के स्वर में परिवर्तित होकर आसमान तक उठ रहा था।

प्रधानमंत्री जब अपने कर-कमलों से रामलला की महिमा का व्याख्यान कर रहे थे, तो उनके शब्दों में केवल नेतृत्व का स्वर नहीं था—वहाँ एक तपस्वी राष्ट्रभक्त का धैर्य, एक कर्मयोगी का संकल्प और एक सनातन साधक का अनुभव बोल रहा था। उन्होंने कहा कि आज का दिन पत्थरों की स्थापना का नहीं, बल्कि उन करोड़ों निष्ठावान हृदयों की विजय का दिन है, जिन्होंने पाँच सौ वर्षों तक अपने भीतर राम को जीवित रखा। प्रधानमंत्री के शब्दों ने ऐसा भाव-संप्रेषण किया कि मानो अयोध्या की धरती स्वयं यह घोषणा कर रही हो कि भारत का सांस्कृतिक स्वाभिमान अब अडिग हो चुका है।

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जब मंच पर बोले, तो जन-समुद्र में एक दुर्लभ शांति उतर आई—ऐसी शांति, जिसमें चिंतन की गहनता और आत्मा की अनुभूति सहज ही प्रवाहित होने लगती है। उन्होंने स्मरण कराया कि राम केवल एक देवता नहीं, बल्कि मर्यादा, करुणा, संयम और धर्मनिष्ठा का अखंड आदर्श हैं। उनके शब्दों ने इस दिव्य आयोजन को दर्शन की उस ऊँचाई से जोड़ दिया, जहाँ मंदिर केवल ईंट-पत्थरों का नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर स्थित सत्य के आलोक का प्रतीक बन जाता है।
मुख्यमंत्री के विस्तृत व्याख्यान ने इस ऐतिहासिक दिवस को विकास, संस्कृति और जन-चेतना के एक विराट संवाद के रूप में रूपायित कर दिया। उन्होंने कहा कि अयोध्या अब केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं रहा; यह भारत की आत्मिक राजधानी बनकर उभर रहा है—वह राजधानी जहाँ से देश की संस्कृति, अध्यात्म और सामाजिक समरसता को नई दिशा मिलेगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राम के आदर्श—न्याय, करुणा, सेवा और राष्ट्रधर्म—अब शासन और लोकहित के नए मानक बनेंगे।
समारोह का प्रत्येक दृश्य ऐसा प्रतीत होता था, मानो यह केवल एक उद्घाटन नहीं, बल्कि इतिहास की नई संहिता लिखने का आयोजन हो। हर शंख-ध्वनि में युगों की परंपरा का विस्तार था, हर दीपशिखा में भविष्य की दिशा का संकेत, हर भक्त की आँखों में किसी पुनर्जन्मे स्वप्न की चमक। अयोध्या की हवाओं में आज जो सुगंध घुली थी, वह केवल चंदन या पुष्पों की नहीं थी—वह थी उन प्रज्वलित आत्माओं की, जिनकी आस्था ने पाँच शताब्दियों के अंधकार को चीरकर इस उजाले को जन्म दिया।
जब मंदिर के शिखर पर भगवा ध्वज आरोहित हुआ, तो ऐसा लगा कि यह ध्वज केवल मंदिर का नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के आत्म-सम्मान, सांस्कृतिक चेतना और शाश्वत गौरव का प्रतिरूप बनकर आकाश में लहराने लगा है। उस क्षण में हर भारतीय हृदय गर्व, कृतज्ञता और अदम्य संकल्प से परिपूर्ण था। यह दृश्य किसी एक पीढ़ी का नहीं—यह असंख्य पीढ़ियों की प्रतीक्षा का चरमोत्कर्ष था।
आज का यह दिवस इतिहास की उस दर्पण-दीवार पर अंकित हो चुका है, जिसे आने वाली अनेक पीढ़ियाँ नमन करेंगी—क्योंकि यह वह क्षण है जब राम लौटे, और उनके साथ लौटा भारत का वह शाश्वत तेज, जो कभी बुझ नहीं सकता।
