जब पेट हमारी रातों-और-ख़्वाबों से बात करने लगा — मेलाटोनिन, गट-बैक्टीरिया और हमारी त्वचा के खोते हुए रक्षक

दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दल्ली । रात का पहला सन्नाटा जब किवदंतियों की तरह छूटता है, तब हमारे अंदर एक महीन-सा संकेत चलने लगता है — नींद आने का, आँखों का थकना-सुकून पाने का। इस संकेत के पीछे एक छोटा-सा जीनीय रसायन होता है: मेलाटोनिन। हम जानते हैं कि मेलाटोनिन मुख्यतः पाइनियल ग्रंथि बनाती है — अँधेरा हुआ तो उत्सर्जन बढ़ता है, रौशनी हुई तो कम। पर पिछले कुछ वर्षों के शोध ने हमें बताया कि यह कहानी केवल पाइनियल ग्रंथि तक सीमित नहीं है। आंतें — हमारा वह अनदेखा अंग — भी इस नाटक का हिस्सा हैं; और साथ में हमारे त्वचा पर बसे सूक्ष्मजीव (microbiome) की भूमिका पर सवाल उठता है, खासकर तब जब हम सख्त साबुन और शक्तिशाली डिटर्जेंटों से उसे साफ़ कर रहे होते हैं।

आंतों में रहने वाला माइक्रोबायोटा न सिर्फ पाचन करता है, बल्कि ट्रिप्टोफैन जैसे अमीनो-अम्ल से मेलाटोनिन के पूर्ववर्ती पदार्थों की दिशा-निर्देश में भी भाग लेता है। हाल की समीक्षाएँ और प्रयोगात्मक अध्ययनों ने दिखाया है कि गट-माइक्रोबायोम सीधे या परोक्ष रूप से मेज़बान के मेलाटोनिन स्तर और आत्मीय नींद-चक्र को प्रभावित कर सकता है — आंतों के कुछ जीव एंजाइमेटिक मार्गों के माध्यम से मेलाटोनिन उत्पादन में योगदान कर सकते हैं और आंतें अपने स्तर पर भी मेलाटोनिन (intestinal melatonin) उत्पन्न करती हैं, जो स्थानीय और प्रणालीगत संकेतों को बदलता है। इस खोज का अर्थ साधारण है: हमारा पेट, जो शायद हमसे कुछ कहता आ रहा था, अब स्पष्ट स्वर में बोल रहा है — वह हमारी नींद और मूड को प्रभावित कर सकता है।

खानपान उसी संवाद की भाषा है। कुछ खाद्य-पदार्थों में प्राकृतिक मेलाटोनिन होता है — जैसे थोड़ा-सा चेरी (विशेषकर टार्ट चेरी), अखरोट, अंडे, अनानास, बादाम और पिस्ता — और साथ ही ट्रीपटोफैन-समृद्ध आहार (दालें, अंडे, सामन जैसे फिश) शरीर को मॉलिक्यूल बनाने के कच्चे माल प्रदान करते हैं। अध्ययनों ने दिखाया है कि नियमित रूप से मेलाटोनिन-समृद्ध खाद्य-वस्तुएँ या ट्रिप्टोफैन-समृद्ध आहार खाने से मूड और नींद-गुणवत्ता में सुधर के संकेत मिले हैं; हाल के रैंडमाइज़्ड परीक्षणों में अखरोट पदार्थों का सेवन मूड और मेलाटोनिन मार्कर्स पर सकारात्मक प्रभाव दिखा चुका है। लेकिन यह भी सच है कि खाना-पीना अकेला उत्तर नहीं — जीवनशैली, व्यायाम, प्रकाश-नियमन और माइक्रोबायोटा का संतुलन साथ चाहिए।

अब सवाल उठता है: हमारी त्वचा — वह पहला आवरण — और उसके बैक्टीरिया (स्किन माइक्रोबायोम) का क्या रोल है? त्वचा पर रहने वाले सूक्ष्मजीव हमारी प्रतिरक्षा, बैरियर फ़ंक्शन और सूजन-स्थिति को नियंत्रित करते हैं। स्किन-केयर की इतनी भारी-भरकम औद्योगिक उत्पादता — तेज़-कारक साबुन, एंटीबैक्टीरियल लोशन, शक्तिशाली डिटर्जेंट — ने लोगों की चिंता बढ़ा दी कि क्या हम अपने शरीर के उन मित्र-माइक्रोब्स को नष्ट कर रहे हैं जो हमारी रक्षा करते हैं। शोध के प्लेटफ़ॉर्म इस पर मिश्रित संकेत देते हैं: कुछ हालिया अध्ययनों में हल्के, त्वचा-अनुकूल क्लींज़र्स का प्रयोग माइक्रोबायोम की विविधता को बहुत बदलते नहीं दिखाता; वहीं व्यापक-अर्थ में कह सकते हैं कि लगातार कठोर surfactants और बार-बार होने वाला अति-सफाई व्यवहार त्वचा की बाधा (skin barrier) और माइक्रोबायोम को बदल सकता है — जिससे सूजन-प्रवणता और संवेदनशीलता बढ़ सकती है। दूसरे शब्दों में, हर साबुन एक जैसा नहीं; हल्का, pH-अनुकूल क्लिंजर और नमी लौटाने वाले उत्पाद माइक्रोबायोम के लिए कम नुकसानदेह साबित होते हैं।

यहाँ एक और दावे का परीक्षण ज़रूरी है जिसे आपने उठाया — क्या डिटर्जेंट्स ने हमारी त्वचा के बैक्टीरिया हटाकर विटामिन D₃ के निर्माण को प्रभावित किया? विटामिन D₃ का निर्माण त्वचा में 7-dehydrocholesterol के यूवी-बी एक्सपोज़र से होता है; यह प्रक्रिया त्वचा की ऊपरी परत और सूर्य के प्रकाश पर निर्भर करती है। वर्तमान प्रमाणों के मुताबिक़, सामान्य-प्रयोग वाले सनस्क्रीन से भी विटामिन D का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित नहीं होता (कुछ समीक्षाएँ कहती हैं कि रोज़ का रेगुलर सनस्क्रीन सामान्य परिस्थितियों में D₃ उत्पादन को काफी कम नहीं करता), और वस्त्रों/डिटर्जेंट्स के सामान्य उपयोग का सीधा प्रमाण यह दिखाने में सीमित है कि वे 7-dehydrocholesterol को नष्ट कर रहे हों। फिर भी, अगर कोई उत्पाद त्वचा की बाधा को नुकसान पहुँचाकर ऊपरी परत को क्षतिग्रस्त कर दे, तो सिद्धांततः उस क्षेत्र में D₃ संश्लेषण पर असर पड़ सकता है — पर यह एक सटीक, व्यापक रूप से स्थापित परिणाम नहीं है; शोध अभी विवादित और सीमित है। इसलिए वैज्ञानिक रूप से कहना होगा: डिटर्जेंट → सीधे विटामिन D₃ में कमी — इस बात का ठोस प्रमाण फिलहाल कम है; पर त्वचा-बाधा के माध्यम से परोक्ष प्रभाव की संभावना पर अध्ययन जारी हैं।

तो क्या इलाज-या-राह है? इस बिंदु पर यह ज़रूरी है कि हम भावुक अपील और प्रमाणिक सलाह को अलग रखें। जो सुझाव शोध-समर्थित और व्यावहारिक हैं वे ये हैं:

  1. आहार में स्मार्ट बदलाव — रात के कुछ घंटे पहले ट्रिप्टोफैन-समृद्ध खाद्य (दही, अंडा, अखरोट) और अगर संभव हो तो टार्ट चेरी/अनानास जैसे प्राकृतिक मेलाटोनिन स्रोत शामिल करें। यह मेलाटोनिन उत्पादन में सहायक हो सकता है।
  2. गट-हेल्थ का ख्याल — प्रोबायोटिक-समर्थित आहार और डायट फ़ाइबर माइक्रोबायोटा को संतुलित करने में मदद करते हैं; कुछ हालिया क्लिनिकल परीक्षणों ने probiotics के माध्यम से नींद-गुणवत्ता में लाभ दिखाया है।
  3. त्वचा-केयर सजगता — अत्यधिक कठोर साबुन/एंटीसेप्टिक बार-बार न लगाएँ; pH-संतुलित, हलके क्लींज़र्स और मॉइस्चराइज़िंग पर ध्यान दें ताकि त्वचा-बाधा और माइक्रोबायोम सुरक्षित रहें।
  4. सूर्य-सम्बंधी सावधानियाँ — विटामिन D के लिए संयमित सन-एक्सपोज़र और यदि जरूरत हो तो खून पर आधारित 25(OH)D जाँच और डॉक्टर की सलाह के मुताबिक़ सप्लीमेंट लें; सनस्क्रीन के उपयोग और D-निर्माण के बीच संतुलन पर विशेषज्ञों की राय भी पढ़ें।
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