लखनऊ की रात : जब मासूमियत पर दरिंदगी ने हमला किया

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ। यह शहर, जो अपनी तहज़ीब और रौनक के लिए जाना जाता है, 15 अक्तूबर की रात एक ऐसी घटना का गवाह बना जिसने इंसानियत के चेहरे से पर्दा हटा दिया।
विकास नगर इलाके में रहने वाली 18 वर्षीय इंटर की छात्रा उस दिन घर से निकली थी — बस नाराज़ होकर, मामूली बात पर। किसी ने नहीं सोचा था कि उसकी यह नाराज़गी, उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान बन जाएगी।

सुबह वह हमेशा की तरह स्कूल के लिए निकली थी, पर ग़ुस्से में उसने रास्ता बदल दिया। सहेली के साथ घूमते हुए बीबीडी तक गई, और जब शाम हुई तो वह अकेली गोमतीनगर की ओर निकल गई। शायद उस वक्त उसे एहसास भी नहीं था कि रात उसके लिए क्या साज़िश बुन रही है।
रात बढ़ती गई, शहर की रोशनी धीमी होती चली गई, और लड़की ऑटो से घर लौटने लगी। मगर खुर्रमनगर पहुंचते-पहुंचते ऑटो चालक ने रास्ता भटका दिया। लड़की ने ऑटो से उतरकर रास्ता खोजने की कोशिश की — और तभी वहां एक कार आकर रुकी।

कार में तीन युवक बैठे थे। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “हम घर छोड़ देंगे, रात बहुत हो गई है।”
वह झिझकी, उसने इंकार किया, मगर कार सवार युवकों ने ज़िद की, भरोसा दिलाया — और अगले ही पल उस भरोसे को तोड़ते हुए उसे जबरन गाड़ी में खींच लिया गया।
कार की खिड़कियों से बाहर निकलती हवा अब डर की सिसकियों में बदल गई थी। चाय का प्याला आगे बढ़ाया गया, जिसमें घुला था नशीला ज़हर, और कुछ ही देर में उसकी होश की दुनिया धुंधला गई।

जब आंख खुली, तो वह किसी अनजान फ्लैट के भीतर थी — बंद दरवाज़ों, अजनबी चेहरों और डर की दीवारों के बीच।
उसी रात दरिंदों ने उसकी अस्मिता को कुचल दिया। हर चीख, हर विनती उन बेशर्म दीवारों में गुम हो गई। अगले चार दिन एक आरोपी ने उसे बंधक बनाए रखा। बाहर दुनिया चलती रही, लोग हँसते रहे, पर उसके हिस्से में सिर्फ सन्नाटा था, और भीतर एक टूटा हुआ आत्मविश्वास।

18 अक्टूबर को जब वह घर लौटी, तो घरवाले उसे देखकर सिहर उठे। उसकी आंखों में कुछ ऐसा था, जो शब्दों में नहीं था। पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज थी, लेकिन लड़की चुप रही। डर और शर्म ने उसकी जुबान को जकड़ रखा था।
फिर भी, उस चुप्पी के भीतर एक आग जल रही थी।
19 अक्टूबर को जब आरोपी जुनैद ने उसे फोन कर धमकी दी, तो वही आग भड़क उठी। डर की जगह अब प्रतिरोध था। लड़की ने अपने घरवालों को सब बताया — हर वह सच, जिसे सुनकर खून खौल जाए।

22 अक्टूबर की सुबह, वह थाने पहुंची। कांपते हाथों से उसने रिपोर्ट दर्ज कराई। इंस्पेक्टर मड़ियांव शिवानंद मिश्र ने तुरंत जांच शुरू की।
बृहस्पतिवार को पुलिस ने दो आरोपियों — अंशुमान और जुनैद — को गिरफ्तार कर लिया।
अंशुमान वही युवक था जो खुद एलएलबी का छात्र था, जिसे कानून की रक्षा करनी थी, मगर उसने कानून को ही अपने पैरों तले रौंद दिया।
उसके पिता वायरलेस विभाग में कार्यरत हैं। जुनैद, जो कारपेंटर का काम करता था, दिन में फर्नीचर बनाता था और रात में इंसानियत तोड़ देता था।
तीसरा आरोपी शिवांश अभी भी पुलिस की पकड़ से बाहर है, और टीमें उसकी तलाश में लगातार दबिश दे रही हैं।

पुलिस का कहना है कि यह केस सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि समाज की सोच पर सवाल है।
कैसे एक पढ़ा-लिखा युवक, एक कानून का विद्यार्थी, एक साधारण लड़की को सिर्फ मनोरंजन का साधन समझ बैठा?
और कैसे एक शहर, जो खुद को सुरक्षित कहता है, उसकी गलियों में अब भी बेटियों की चीखें गूंजती हैं?

लखनऊ की हवा आज भी उस रात की ख़ामोशी से भारी है।
हर मां अपनी बेटी को गले लगाकर पूछ रही है —
“कब तक हमारी बच्चियां डर और भरोसे के बीच कुचलती रहेंगी?”
और हर पिता की आंखें पूछ रही हैं —
“कब तक कानून की किताबें हैवानों के हाथों में हथियार बनती रहेंगी??????”

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