उत्तरदायित्व का उद्गम : जहाँ गुरु कृपा नहीं, चेतना का अनुशासन बन जाती है

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ।सनातन परंपरा में गुरुसत्ता कभी भी अनुग्रह मात्र नहीं रही। वह ऐसी चेतना है जो साधक के जीवन में उतरते ही उससे प्रश्न करती है—अब तुम क्या बनोगे? गुरु की कृपा सुविधा नहीं देती, वह उत्तरदायित्व सौंपती है। यही कारण है कि शास्त्रों में गुरु को वरदाता नहीं, कर्तव्यबोध का दाता कहा गया है।
गुरु-गीता का एक अत्यंत गंभीर सूत्र इस सत्य को उद्घाटित करता है—


“गुरवो न हि भुञ्जन्ति शिष्यस्य पुण्यपापयोः।”


अर्थात गुरु शिष्य के पुण्य या पाप को स्वयं नहीं भोगते; वे केवल उसे योग्य बनाते हैं कि वह अपने कर्मों का उत्तरदायित्व स्वयं उठा सके। यह सूत्र साधक को यह स्मरण कराता है कि गुरु-तत्त्व आश्रय नहीं, उत्तरदायित्व का हस्तांतरण है।


सनातन दर्शन में गुरु का प्रथम उपकार यह है कि वह शिष्य से भ्रम छीन लेता है। भ्रम सुविधा देता है, गुरु विवेक देता है। और विवेक आते ही उत्तरदायित्व अपरिहार्य हो जाता है। जिस क्षण साधक यह कहता है कि “गुरु हैं, सब संभाल लेंगे,” उसी क्षण उसकी साधना अधूरी रह जाती है। गुरु तब प्रसन्न होते हैं जब शिष्य यह कहे—“अब दायित्व मेरा है।”


स्कंद पुराण में गुरु को ‘धर्म-सेतु’ कहा गया है—पर यह सेतु शिष्य को पार ले जाकर छोड़ नहीं देता; वह उसे पार उतारने योग्य बनाता है। गुरु शिष्य का बोझ नहीं उठाते, वे उसकी पीठ सीधी करते हैं ताकि वह स्वयं अपने दायित्व का भार वहन कर सके। यही गुरुसत्ता का अनुशासन है—मौन, कठोर और करुणामय।
यहाँ उत्तरदायित्व केवल व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित नहीं रहता। सनातन दृष्टि में जिस व्यक्ति ने गुरु-तत्त्व को आत्मसात कर लिया, उसके लिए समाज से पलायन असंभव हो जाता है। क्योंकि गुरु-तत्त्व भीतर जागते ही साधक को यह बोध कराता है कि जो समझ गया, वह अब उत्तरदायी है। ज्ञान से पलायन नहीं होता, ज्ञान से दायित्व जन्म लेता है।


यही कारण है कि सनातन परंपरा में ब्रह्मज्ञानी को लोकधर्मी कहा गया है। गुरु-तत्त्व व्यक्ति को साधु नहीं बनाता, वह उसे धर्मवाहक नागरिक बनाता है। उसकी दृष्टि में प्रत्येक पद, प्रत्येक भूमिका—चाहे वह गृहस्थ की हो, प्रशासक की हो या विचारक की—एक साधना बन जाती है। जहाँ गुरु-तत्त्व नहीं होता, वहाँ अधिकार अहंकार बन जाता है; और जहाँ गुरु-तत्त्व होता है, वहाँ अधिकार कर्तव्य में रूपांतरित हो जाता है।

गुरुसत्ता का वास्तविक प्रमाण शब्दों में नहीं, व्यवहार और निर्णयों में दिखाई देता है। यदि व्यक्ति गुरु को मानता है, तो उसके निर्णय लोकमंगलकारी होंगे; यदि वह केवल गुरु का नाम लेता है, तो निर्णय स्वार्थपरक रहेंगे।

आज के समय में गुरु-तत्त्व का सबसे बड़ा परीक्षण सत्ता, व्यवस्था और प्रभाव के क्षेत्रों में है। वहाँ यदि गुरुसत्ता नहीं होगी, तो व्यवस्था संवेदनहीन हो जाएगी। और यदि गुरुसत्ता वहाँ प्रवेश कर जाए, तो वही सत्ता सेवा में परिवर्तित हो जाती है। यही सनातन शासन-दृष्टि है—जहाँ शक्ति का केंद्र अहंकार नहीं, उत्तरदायित्व होता है।

अतः गुरुसत्ता का अंतिम संदेश यह नहीं है कि “मुझ पर भरोसा रखो,”बल्कि यह है कि—अब स्वयं पर उत्तरदायित्व लो।जहाँ गुरु-तत्त्व जाग्रत होता है, वहाँ शिकायत समाप्त हो जाती है,वहाँ दोषारोपण नहीं, आत्मपरीक्षण होता है,और वहीं से व्यक्ति साधक से दायित्ववान जीवनकर्ता बनता है।
गुरु वही है जो शिष्य को अपने कंधों पर नहीं उठाता,बल्कि उसे इतना समर्थ बना देता है
कि वह स्वयं समाज और राष्ट्र का भार उठाने योग्य हो जाए।

यही गुरुसत्ता है—
जो कृपा नहीं,
कर्तव्य बनकर जीवन में उतरती है।

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