जब आयोजन नहीं, चेतना बोलती है

संस्कार, संगठन और स्मृति के सहारे सभ्यतागत आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ।लखनऊ के रामाधीन सिंह उत्सव स्थल पर 9 जनवरी 2026 को घटित हुआ दृश्य किसी सामान्य सार्वजनिक कार्यक्रम का नहीं था। वह एक ऐसी मौन उद्घोषणा थी, जिसमें शब्दों से अधिक अर्थ और उपस्थिति से अधिक संकेत निहित थे। हिंदू सम्मेलन एवं समरसता भोज नामक यह आयोजन सतह पर भले ही एक सामाजिक समागम प्रतीत हो, किंतु अंतःस्तर पर यह हिंदू समाज की सुप्त आत्मचेतना का एक सजग स्पंदन था—एक ऐसा स्पंदन, जो प्रश्न करता है, कुरेदता है और अंततः आत्मावलोकन के लिए विवश करता है।


यह संयोग नहीं था कि इस सम्मेलन में समाज के विविध वर्गों की उपस्थिति केवल संख्या का विस्तार नहीं, बल्कि भावात्मक सहभागिता का प्रमाण बनी। लोगों की आँखों में उत्सुकता थी, किंतु उससे अधिक एक अनकहा आग्रह—कि आज कुछ ऐसा कहा जाए, जो केवल सुना न जाए, बल्कि भीतर उतर जाए। यही कारण था कि यह आयोजन किसी औपचारिक वक्तव्य-श्रृंखला में सीमित न रहकर, विचारों की एक सतत धारा में परिवर्तित हो गया।
पद्मश्री विद्याबिन्दु जी का उद्बोधन उस धारा का पहला प्रवाह था—गंभीर, संयत और वैचारिक। उन्होंने लोकाचार और नैतिक अनुशासन को सनातन संस्कृति का मेरुदंड बताते हुए जैसे ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन प्रसंगों का स्मरण कराया, श्रोता किसी कथा में नहीं, बल्कि आत्मदर्पण में झाँकने लगे। लक्ष्मण-सीता-राम का वनगमन केवल इतिहास नहीं रह गया, वह आज के सुविधा-संस्कृत समाज के सामने एक मौन प्रश्न बनकर खड़ा हो गया—क्या त्याग अब केवल शब्दकोश में शेष है?


उनकी यह टिप्पणी कि सामूहिक जागरण अन्याय के प्रतिकार की शक्ति को जन्म देता है, किसी तात्कालिक प्रतिक्रिया का आवेग नहीं थी, बल्कि समाजशास्त्रीय सत्य का उद्घाटन थी। यह वह क्षण था, जब श्रोता केवल सुन नहीं रहे थे, बल्कि भीतर ही भीतर स्वीकार कर रहे थे कि बिखरे हुए विवेक से कोई सभ्यता जीवित नहीं रहती।


इसके पश्चात अवध प्रांत के प्रांत प्रचारक कौशल जी का वक्तव्य आया—और वातावरण का तापमान वैचारिक गहराई में परिवर्तित हो गया। संघ के शताब्दी वर्ष का संदर्भ मात्र ऐतिहासिक उल्लेख नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि सौ वर्षों की निरंतरता किसी संगठन की नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत धैर्य की कहानी है। 48 लाख परिवारों तक पहुँचा गृह संपर्क अभियान आँकड़ा नहीं, बल्कि संवाद की वह श्रृंखला है, जो समाज को समाज से जोड़ती है।


जब पंच परिवर्तन—स्व-बोध, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य और पर्यावरण संरक्षण—का उल्लेख हुआ, तब यह स्पष्ट हो गया कि यह सम्मेलन किसी राजनीतिक विमर्श का मंच नहीं, बल्कि नैतिक पुनर्निर्माण का प्रस्ताव है। यह प्रस्ताव सत्ता से नहीं, समाज से किया गया था—और यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति थी।


कौशल जी का यह कथन कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है, किसी आक्रामक उद्घोष की तरह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास की शांति के साथ व्यक्त हुआ। डॉ. हेडगेवार के विचारों का स्मरण कराते हुए उन्होंने यह स्पष्ट किया कि शक्ति शोर में नहीं, संगठन में होती है; और संगठन केवल संरचना नहीं, संस्कार से जन्म लेता है। सनातन संस्कृति का कोई एक संस्थापक न होना, उसके विस्तार की सीमा नहीं, बल्कि उसकी सार्वभौमिकता का प्रमाण है।


इसके पश्चात पूज्य महाराज श्री रितेश्वर महाराज जी का उद्बोधन आया—और जैसे पूरे सम्मेलन को आत्मालोचन का आईना मिल गया। उन्होंने जिस निर्भीकता से ‘सोशल मीडिया-आधारित बौद्धिकता’ और कर्महीन चेतना पर प्रश्न उठाया, वह असहज था, किंतु आवश्यक भी। उनका कथन कि युवा पीढ़ी अंग्रेज़ी मानसिकता के जंगल में भटक रही है, केवल भाषा का संकट नहीं दर्शाता, बल्कि पहचान के क्षरण की गहरी पीड़ा को उद्घाटित करता है।
संस्कारों की चर्चा करते हुए उन्होंने विज्ञान और अध्यात्म के सेतु को जिस सहजता से जोड़ा, वह इस बात का संकेत था कि हिंदू दर्शन किसी कालखंड में बँधा नहीं, बल्कि काल को दिशा देने वाली दृष्टि है। बाल्यावस्था में संस्कारों का प्रभाव कोई धार्मिक आग्रह नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और जैविक सत्य है—यह कथन जैसे अनेक माता-पिताओं के मन में प्रतिध्वनित हो उठा।
जब उन्होंने संघ को ‘चलते-फिरते संतों’ का संगठन कहा, तब यह केवल प्रशंसा नहीं थी, बल्कि उस तपस्वी परंपरा की स्वीकारोक्ति थी, जो बिना शोर के समाज की नींव को मजबूत करती आई है। हिंदू संस्कृति को मानव और प्रकृति के समन्वय की जीवन-दृष्टि बताना, इस सम्मेलन का सार बन गया।


यह सम्मेलन किसी संगठन की उपलब्धि-गाथा नहीं था, बल्कि समाज के लिए छोड़ा गया एक संकेत था—कि हिंदू होना केवल गौरव नहीं, उत्तरदायित्व है; जाति पहचान हो सकती है, विभाजन का औजार नहीं; और हिंदुत्व कोई संकीर्ण परिभाषा नहीं, बल्कि मानवता और विश्व-कल्याण की व्यापक चेतना है।


कुछ आयोजन समाप्त हो जाते हैं, किंतु कुछ भीतर आरंभ हो जाते हैं। यह सम्मेलन भी ऐसा ही था—जो समाप्त नहीं हुआ, बल्कि पाठक, श्रोता और समाज के मन में एक प्रश्न छोड़ गया। और शायद वही प्रश्न इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

Share it via Social Media

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *