
दैनिक इंडिया न्यूज़ ,लखनऊ।आज विश्व युवा दिवस के पावन अवसर पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह ने विश्व भर के युवाओं को हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पित करते हुए उन्हें केवल उत्सवधर्मी अभिवादन ही नहीं दिया, बल्कि कर्म और चेतना की सुदृढ़ दिशा भी प्रदान की। उन्होंने वैचारिक–बौद्धिक मीडिया के माध्यम से युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि युवा केवल आयु का नहीं, बल्कि संकल्प का नाम है; केवल ऊर्जा का नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि युवा वही नहीं है जो गति में है, बल्कि वह है जो दिशा में है। दिशाहीन वेग विनाश की ओर ले जाता है, जबकि सुविचारित कर्म राष्ट्र और समाज का निर्माण करता है। आज का युवा यदि केवल तात्कालिक लाभ, भौतिक आकांक्षाओं और आभासी प्रशंसा के पीछे भटक गया, तो उसकी ऊर्जा क्षरण में परिवर्तित हो जाएगी। किंतु यदि वही युवा अपने भीतर अनुशासन, आत्मबोध और लक्ष्य-निष्ठा का दीप प्रज्वलित कर ले, तो वही ऊर्जा इतिहास रचने की क्षमता प्राप्त कर लेती है।
जितेंद्र प्रताप सिंह ने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने जीवन को केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित न रखें, बल्कि उसे समाज, संस्कृति और राष्ट्र के व्यापक हित से जोड़ें। उन्होंने स्पष्ट किया कि सनातन परंपरा में कर्म कभी स्वार्थ-प्रधान नहीं रहा, वह सदैव लोकमंगल और विश्वकल्याण से अनुप्राणित रहा है। युवा जब अपने कर्म को इस दृष्टि से देखना प्रारंभ करता है, तब उसका प्रत्येक प्रयास साधना में रूपांतरित हो जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज का युग सूचना का है, किंतु विवेक का अभाव इस युग की सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ज्ञान तभी मूल्यवान है, जब वह चरित्र का निर्माण करे; शिक्षा तभी सार्थक है, जब वह संस्कारों से संयुक्त हो। युवा को चाहिए कि वह केवल डिग्रियों का संग्रहकर्ता न बने, बल्कि अपने आचरण, विचार और व्यवहार से समाज के लिए प्रेरणा-स्तंभ बने।
अपने संदेश में उन्होंने असफलता के संदर्भ में युवाओं को विशेष रूप से संबोधित करते हुए कहा कि विफलता कोई अंत नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। जो युवा असफलता से कटुता नहीं, बल्कि शिक्षा ग्रहण करता है, वही आगे चलकर नेतृत्व के योग्य बनता है। संसार में प्रगति वही करता है, जिसकी दृष्टि दूसरों की उन्नति देखकर जलती नहीं, बल्कि स्वयं को और परिष्कृत करने के लिए प्रेरित होती है।
उन्होंने कहा कि ईश्वर की योजना भी पात्रता के सिद्धांत पर आधारित होती है। सफलता संयोग नहीं, संस्कार और साधना का प्रतिफल होती है। जिस दिन युवा यह समझ लेता है कि उसकी उन्नति उसकी आंतरिक योग्यता, श्रम और धैर्य के अनुपात में ही सुनिश्चित होती है, उसी दिन वह शिकायत छोड़कर साधना के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है।
अंत में उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे अपने भीतर की चेतना को जाग्रत करें, लक्ष्य को स्पष्ट करें और कर्म को निरंतर परिष्कृत करें। राष्ट्र को केवल नारों से नहीं, बल्कि चरित्रवान, कर्मठ और चिंतनशील युवाओं से शक्ति मिलती है। आज का युवा यदि संकल्पबद्ध होकर उठ खड़ा हो, तो न केवल अपना भविष्य, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का पथ भी आलोकित कर सकता है।
युवा ही युग का निर्माता है—यह दिवस उसी सत्य का स्मरण और उसी उत्तरदायित्व का आह्वान है।
