
दैनिक इंडिया न्यूज़ ,नोएडा। यह खबर किसी एक परिवार के शोक की नहीं है, यह उस समाज और उस व्यवस्था की सामूहिक आत्मग्लानि का दस्तावेज़ है, जहाँ 27 वर्ष का एक युवा नाले के गहरे, ठंडे पानी में जीवन और मृत्यु से संघर्ष करता रहा और चारों ओर खड़े लोग मोबाइल कैमरे उठाकर वीडियो बनाते रहे। यह वह दृश्य था, जिसने न केवल एक पिता का कलेजा चीर दिया, बल्कि पूरे देश की संवेदना को कठघरे में खड़ा कर दिया।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार युवक कार समेत जलभराव वाले गड्ढे/नाले में जा गिरा। वह पूरी तरह असहाय नहीं था—वह ज़िंदा था, होश में था, छटपटा रहा था। उसने अपने पिता को फोन किया, कहा—“पापा, मैं यहां हूँ… मुझे बचा लो।” पिता मौके पर पहुँचा, बेटे को अपनी आंखों के सामने डूबते देखा, चीखा, गिड़गिड़ाया, हाथ जोड़े—लेकिन वह कुछ नहीं कर सका। क्योंकि उसके पास न रस्सी थी, न गोताखोर, न वह अधिकार जिसे वर्दी और सिस्टम कहा जाता है।
112 पर कॉल हुआ। पुलिस पहुँची। एसडीआरएफ, फायर ब्रिगेड और रेस्क्यू टीमें बुलाई गईं। लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों और मीडिया की पुष्टि बताती है कि जब युवक पानी में संघर्ष कर रहा था, तब रेस्क्यू कर्मियों ने पानी में उतरने से इनकार कर दिया। कारण बताए गए—पानी ठंडा है, लोहे की रॉड हैं, जोखिम है। यह वह क्षण था जब एक व्यवस्था ने यह तय कर लिया कि उसका डर, एक नागरिक के जीवन से बड़ा है।
सबसे भयावह दृश्य यह नहीं था कि रेस्क्यू में देरी हुई—सबसे भयावह दृश्य यह था कि सैकड़ों लोग खड़े थे। कोई रस्सी लेकर नहीं बढ़ा, कोई कपड़ा बांधकर नहीं उतरा, कोई जान की बाज़ी लगाने को तैयार नहीं हुआ। चारों ओर मोबाइल थे, लाइव वीडियो थे, रील्स थीं—और बीच में एक आदमी मर रहा था। यह सिर्फ प्रशासन की विफलता नहीं थी, यह समाज की नैतिक मृत्यु थी।
मीडिया हाउसों की रिपोर्ट बताती है कि युवक काफी देर तक कार की छत या किनारे पर दिखाई देता रहा। यदि तत्काल साहसिक प्रयास होते, यदि प्रशिक्षित दल समय पर निर्णय लेता, तो शायद आज वह युवक ज़िंदा होता। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने दम घुटने से मौत की पुष्टि की, लेकिन असल में उसकी मौत उससे बहुत पहले हो चुकी थी—जब मदद के बावजूद कोई हाथ आगे नहीं बढ़ा।
आज सवाल केवल यह नहीं है कि रेस्क्यू टीम ने पानी में क्यों नहीं उतरने का साहस किया। आज सवाल यह है कि ऐसी टीमें किस उद्देश्य से बनाई गई हैं? क्या वे केवल वर्दी, वाहन और बयान देने के लिए हैं? यदि ठंड, जोखिम और कठिनाई के नाम पर वे जीवन रक्षा से पीछे हट जाएँ, तो उन्हें तत्काल पुनःप्रशिक्षण नहीं—पुनर्विचार की आवश्यकता है।
इस घटना ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जहाँ इंसान मरता है और समाज रिकॉर्ड करता है। मदद से पहले कैमरा उठता है, संवेदना से पहले कंटेंट खोजा जाता है। यदि आज हमने इससे सबक नहीं लिया, तो कल कोई और पिता अपनी संतान को यूँ ही डूबते देखेगा, और हम फिर वीडियो बनाएँगे।
यह खबर किसी सरकार, किसी विभाग या किसी अधिकारी के विरुद्ध केवल आरोप नहीं है—यह एक चेतावनी है। चेतावनी व्यवस्था के लिए भी और समाज के लिए भी। यदि ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों, तो केवल जांच और बयान पर्याप्त नहीं होंगे। साहसिक निर्णय, जवाबदेही तय करना, रेस्क्यू तंत्र को संवेदनशील बनाना और समाज में मानवता को फिर से जीवित करना होगा।
क्योंकि याद रखिए—
जिस दिन हम किसी की जान बचाने के बजाय उसकी मौत का वीडियो बनाते हैं,
उस दिन मरने वाला सिर्फ एक व्यक्ति नहीं होता,
उस दिन इंसानियत भी दम तोड़ देती है।
