पंच प्राण : हिंदू समाज के आत्मोत्थान और राष्ट्र-पुनर्निर्माण का वैचारिक उद्घोष


दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ।भारत किसी कालखंड की राजनीतिक संरचना मात्र नहीं, अपितु सहस्राब्दियों से प्रवाहित एक जीवंत राष्ट्रचेतना है, जिसकी जड़ें सनातन जीवन-दर्शन में अंतर्निहित हैं। इसी चिरंतन चेतना को पुनः जाग्रत, संगठित और सुदृढ़ करने का वैचारिक प्रयत्न विकास नगर स्थित प्रताप नगर में आयोजित हिंदू सम्मेलन में परिलक्षित हुआ, जहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत घोष प्रमुख डॉ. नीलकंठ ने हिंदू समाज को संबोधित करते हुए संघ के पंच प्राण पर गंभीर, सारगर्भित और दूरदर्शी व्याख्यान प्रस्तुत किया। यह संबोधन केवल वर्तमान का विश्लेषण नहीं था, बल्कि भविष्य के भारत की वैचारिक दिशा का स्पष्ट संकेत भी था।


डॉ. नीलकंठ ने प्रतिपादित किया कि पंच प्राण किसी संगठनात्मक औपचारिकता का नाम नहीं, बल्कि हिंदू समाज के आत्मपरीक्षण, आत्मसंस्कार और आत्मपुनर्निर्माण का समग्र सूत्र है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सामाजिक समरसता पंच प्राण की आधारशिला है। जाति, उपजाति, वर्ग और क्षेत्रीय संकीर्णताओं में विभाजित समाज कभी भी राष्ट्र-निर्माण का सक्षम माध्यम नहीं बन सकता। समरसता का तात्पर्य कृत्रिम समानता नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान, सहभागिता और सामाजिक उत्तरदायित्व की वह चेतना है, जो समाज को आंतरिक रूप से अविच्छिन्न और सुदृढ़ बनाती है।


परिवार प्रबोधन पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि परिवार केवल सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि संस्कारों की प्रथम प्रयोगशाला है। यदि परिवार दुर्बल होगा तो समाज दिशाहीन होगा और यदि समाज दिशाहीन हुआ तो राष्ट्र केवल प्रशासनिक संरचना बनकर रह जाएगा। आज का सबसे गंभीर संकट पीढ़ियों के बीच संवाद का टूटना है। पंच प्राण का यह आयाम हमें स्मरण कराता है कि चरित्र, संस्कार और राष्ट्रभाव किसी पाठ्यक्रम से नहीं, बल्कि पारिवारिक आचरण से निर्मित होते हैं।
पर्यावरण संरक्षण को उन्होंने आधुनिक विमर्श से ऊपर उठाकर सभ्यतागत उत्तरदायित्व के रूप में प्रस्तुत किया। भारतीय संस्कृति ने सदैव प्रकृति को भोग की वस्तु नहीं, बल्कि माता के रूप में स्वीकार किया है। विकास के नाम पर प्रकृति का अंधाधुंध दोहन केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि नैतिक पतन का संकेत है। पंच प्राण हमें उपभोगवादी मानसिकता से मुक्त होकर संयम, संतुलन और सह-अस्तित्व के मार्ग पर लौटने का आह्वान करता है।


स्वदेशी पर अपने विचार रखते हुए डॉ. नीलकंठ ने इसे आर्थिक नीति के बजाय मानसिक स्वाधीनता का प्रश्न बताया। जब तक हमारी आवश्यकताएँ, हमारी सोच और हमारा उपभोग पराधीन मानसिकता से संचालित होंगे, तब तक आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न साकार नहीं हो सकता। स्वदेशी का अर्थ है—स्थानीय संसाधनों, स्थानीय श्रम और स्थानीय प्रतिभा पर अटूट विश्वास। यही आत्मगौरव राष्ट्र को आत्मबल प्रदान करता है।


पंच प्राण का सबसे व्यापक और निर्णायक तत्व नागरिक कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल अधिकारों के उद्घोष से जीवित नहीं रहता, बल्कि कर्तव्यों के निर्वहन से सशक्त होता है। अनुशासन, ईमानदारी, परिश्रम और त्याग—यही नागरिक कर्तव्य का सार है। राष्ट्र की रक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सैनिक नहीं करते, बल्कि अपने-अपने क्षेत्र में कर्तव्यनिष्ठ आचरण करने वाला प्रत्येक नागरिक राष्ट्र का मौन प्रहरी होता है।
अपने संबोधन के समापन में डॉ. नीलकंठ ने कहा कि यदि हिंदू समाज पंच प्राण को केवल मंचों और प्रस्तावों तक सीमित न रखकर अपने व्यवहार, परिवार, व्यवसाय और सामाजिक जीवन में आत्मसात कर ले, तो भारत को विश्वगुरु बनने से कोई भी शक्ति नहीं रोक सकती। संघ का शताब्दी काल इसी चेतना का स्मरण कराता है—व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण।
यह सम्मेलन इस सत्य का सशक्त प्रमाण बना कि हिंदू समाज के भीतर नवभारत निर्माण की चेतना निरंतर अधिक प्रखर, संगठित और वैचारिक रूप से परिपक्व होती जा रही है। पंच प्राण आज की आवश्यकता ही नहीं, आने वाले युग का अनिवार्य पथ है।

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