क्या यूजीसी पर जो नए नियम बनाए गए हैं, भारत में दंगल खड़ा करेगा?

शिक्षा, पलायन, वैचारिक दुर्बलता और भारत के अधूरे विश्वगुरु होने का प्रश्न

क्या भारत में शिक्षा को लेकर उठती हर बहस केवल प्रशासनिक असहमति है, या इसके गर्भ में कोई गहरा सभ्यतागत संकट छिपा है?

क्या यह केवल नियमों का विवाद है, या राष्ट्र की चेतना को दिशा देने वाली संस्थाओं पर अविश्वास का उद्घोष?

और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—क्या उच्च शिक्षा पर लगाए गए नए नियम भारत में ज्ञान का संवर्धन करेंगे या विचारों का दंगल खड़ा कर देंगे?

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ।भारत का इतिहास जब भी संकटों से घिरा, तब शस्त्र पहले नहीं टूटे—शिक्षा पहले कमजोर हुई। जब गुरुकुल उजड़े, तब आक्रांताओं के मार्ग खुले। जब विश्वविद्यालय नष्ट हुए, तब विचारों की पराजय हुई। नालंदा और तक्षशिला की ज्वालाएँ केवल इमारतों की नहीं थीं, वे भारत की बौद्धिक आत्मा पर प्रहार थीं। आज, जब कोई तलवार नहीं, कोई सेना नहीं, तब यदि शिक्षा व्यवस्था ही वैचारिक प्रयोगों का अखाड़ा बना दी जाए, तो यह पराजय उससे भी गहरी होगी—क्योंकि यह आत्मघात होगी।

आज यह प्रश्न केवल UGC के कुछ नियमों का नहीं है। यह प्रश्न उस निरंतर चलती प्रक्रिया का है, जिसके अंतर्गत भारत की सर्वश्रेष्ठ मेधा—जो कभी इसी मिट्टी में खेलती थी, इसी देश में पली-बढ़ी—आज किसी अन्य राष्ट्र की प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक बन चुकी है, किसी अन्य देश के अस्पतालों में जीवन रक्षक डॉक्टर बन चुकी है, किसी विदेशी विश्वविद्यालय में नीति-निर्माता तैयार कर रही है।

यह प्रतिभा अचानक वहाँ नहीं पहुँची। यह यहाँ से हतोत्साहित होकर, उपेक्षित होकर, प्रणाली से निराश होकर गई।

कल्पना कीजिए—यदि भारत अपनी शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से इस प्रतिभा को आरंभ से संजो पाता, उसे वैचारिक सुरक्षा, बौद्धिक स्वतंत्रता और उत्कृष्टता का सम्मान दे पाता, तो क्या आज भारत केवल “संभावित विश्वगुरु” कहलाता, या कब का स्थापित विश्वगुरु बन चुका होता?

और इससे भी बड़ा प्रश्न—यदि भारत विश्वगुरु बन भी जाता, तो क्या वह उस दायित्व को निभा पाने की वैचारिक क्षमता अपने भीतर बनाए रख पाता?

यहाँ हमें ईमानदारी से स्वीकार करना होगा कि स्वतंत्रता के बाद भारत को कई बार ऐसी नीतिगत दिशाओं में मोड़ा गया, जहाँ शिक्षा राष्ट्रनिर्माण का साधन नहीं, सत्ता-संतुलन का औजार बनती चली गई। बीच-बीच में देश की बागडोर ऐसे हाथों में जाती रही, जिनकी प्राथमिकता दीर्घकालिक बौद्धिक निवेश नहीं, तात्कालिक सामाजिक या राजनीतिक समीकरण थे। परिणामस्वरूप भारत न तो पूरी तरह समृद्ध हो सका, न ही अपनी बौद्धिक क्षमता का सम्यक उपयोग कर सका।

आज वही चूक एक नए रूप में सामने खड़ी है।

UGC के नए नियम “समता” के नाम पर प्रस्तुत किए गए हैं। समता एक पवित्र विचार है—परंतु जब वही समता प्रशासनिक अनिवार्यता बनकर ज्ञान पर आरोपित हो जाए, तब वह समरसता नहीं, विभाजन को जन्म देती है। इन नियमों के अंतर्गत शिक्षा संस्थानों को ऐसे निगरानी-तंत्र में बाँधा जा रहा है, जहाँ प्रत्येक शैक्षणिक निर्णय संभावित आरोप का विषय बन सकता है। यह स्थिति विश्वविद्यालयों को संवाद के केंद्र से संदेह के क्षेत्र में परिवर्तित कर देती है।

शिक्षक, जो कभी ज्ञान का निर्भीक साधक होता था, अब शब्दों को तौल-तौलकर बोलने को विवश है। विद्यार्थी, जो प्रश्न पूछकर ही आगे बढ़ता है, अब यह सोचने लगा है कि कहीं प्रश्न उसकी पहचान के विरुद्ध न चला जाए। शोध, जो निष्पक्ष जिज्ञासा का परिणाम होना चाहिए, अब संभावित विवादों की छाया में किया जाने लगा है। यह स्थिति शिक्षा का विकास नहीं, बौद्धिक संकुचन है।

इतिहास हमें चेताता है कि जब शिक्षा का स्तर गिरता है, तब राष्ट्र की प्रतिरोधक क्षमता भी गिरती है। भारत जितनी बार आक्रांताओं के सामने झुका, जितनी बार सामाजिक विघटन का शिकार हुआ, वहाँ कहीं न कहीं शिक्षा का क्षरण मौजूद था। सशक्त शिक्षा केवल रोजगार नहीं देती—वह संस्कृति, आत्मविश्वास और विवेक देती है। और जब विवेक कमज़ोर होता है, तब समाज बाहरी आघातों के प्रति असहाय हो जाता है।

आज की वैश्विक प्रतिस्पर्धा केवल अर्थव्यवस्था की नहीं, ज्ञान-प्रधान शक्ति की है। जो राष्ट्र अपने विश्वविद्यालयों को स्वतंत्र, उत्कृष्ट और नवाचारी बनाए रखता है, वही भविष्य का नेतृत्व करता है। इसके विपरीत, जो राष्ट्र शिक्षा को पहचान-आधारित दंड-प्रणाली में बदल देता है, वह अपनी ही मेधा को पलायन के लिए प्रेरित करता है।
यह प्रश्न भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि जब योग्यता की कसौटियाँ निरंतर शिथिल होंगी, जब दक्षता से अधिक संतुलन की गणना होगी, तब उन क्षेत्रों का क्या होगा जहाँ एक छोटी-सी त्रुटि भी विनाशकारी सिद्ध होती है? चिकित्सा, विज्ञान, इंजीनियरिंग—ये भावनात्मक न्याय नहीं, निर्मम उत्कृष्टता माँगते हैं। यदि प्रारंभिक चरण में ही शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों को यह संकेत दे कि संघर्ष से अधिक पहचान निर्णायक है, तो परिणाम केवल संस्थानों में नहीं, समाज के जीवन-स्तर में दिखाई देगा।
यह लेख किसी वर्ग, समुदाय या विचारधारा के विरोध में नहीं है। यह एक राष्ट्र की आत्मसमीक्षा है। यह आग्रह करता है कि सरकार, नियामक संस्थाएँ और शिक्षा-विद एक क्षण ठहरें और सोचें—क्या हम वही भूल दोहरा रहे हैं, जिसने भारत को बार-बार अपनी पूरी क्षमता साकार करने से रोका है?
यदि शिक्षा को और अधिक परिष्कृत, स्वतंत्र और उत्कृष्ट नहीं बनाया गया, तो आने वाला कालखंड भारत के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। यह चुनौती केवल आर्थिक या राजनीतिक नहीं होगी—यह बौद्धिक और सभ्यतागत होगी। और ऐसे संकटों से न नीतियाँ बचाती हैं, न घोषणाएँ—उन्हें केवल दूरदर्शी शिक्षा बचाती है।

इसलिए आज आवश्यकता है कि उच्च शिक्षा से जुड़े नियमों पर पुनर्विचार हो। विरोध को हठ न समझा जाए, बल्कि राष्ट्र की चेतावनी माना जाए। यह समय है कि शिक्षा को पुनः राष्ट्रनिर्माण का आधार बनाया जाए, न कि प्रयोगशाला।
यह लेख एक आग्रह है, एक चेतावनी है और एक शंखनाद है—
कि यदि भारत को सचमुच विश्वगुरु बनना है, तो उसे पहले अपने विश्वविद्यालयों को भयमुक्त, मेधामुक्त और विचारमुक्त बनाना होगा।
क्योंकि राष्ट्र वही आगे बढ़ता है, जिसकी शिक्षा आगे देखती है।

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