
दैनिक इंडिया न्यूज़,नई दिल्ली।भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था इस समय अपने इतिहास के एक अत्यंत संवेदनशील, जटिल और निर्णायक संक्रमणकाल से गुजर रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा जनवरी 2026 में अधिसूचित किए गए “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता संवर्धन विनियम, 2026” ने न केवल अकादमिक जगत को, बल्कि संवैधानिक मनीषियों, शिक्षक संगठनों, छात्र समुदाय और समाज के व्यापक बौद्धिक वर्ग को गहन आत्ममंथन के लिए विवश कर दिया है। एक ओर सरकार और आयोग इसे समानता, समावेशन और सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उभरता असंतोष इसे उच्च शिक्षा की आत्मा पर प्रहार और संस्थागत संतुलन को विघटित करने वाला नियम करार दे रहा है।
इस विवाद की जड़ों को समझने के लिए यह जानना अनिवार्य है कि यूजीसी की मूल अवधारणा क्या थी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना 1956 में एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय के रूप में इसलिए की गई थी ताकि देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता, समन्वय और समान अवसरों का संरक्षण हो सके। यूजीसी को कभी भी दंडात्मक, निगरानी-प्रधान अथवा भय-आधारित संस्था के रूप में परिकल्पित नहीं किया गया था, बल्कि यह एक मार्गदर्शक, संतुलनकारी और अकादमिक स्वतंत्रता का संरक्षक निकाय माना गया। किंतु 2026 के विनियमों के साथ इसकी भूमिका में जो परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहा है, वह अनेक शिक्षाविदों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुका है।
नए नियमों के अंतर्गत प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में इक्वल अपॉर्च्युनिटी सेंटर, इक्विटी कमेटी, इक्विटी एंबेसडर और इक्विटी स्क्वॉड का गठन अनिवार्य किया गया है। साथ ही 24 घंटे सक्रिय शिकायत निवारण प्रणाली, समयबद्ध जांच और त्वरित दंडात्मक कार्रवाई का कठोर प्रशासनिक ढांचा निर्धारित किया गया है। आयोग का दावा है कि यह व्यवस्था जाति, वर्ग, लिंग, धर्म, भाषा, विकलांगता अथवा जन्मस्थान के आधार पर होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करने हेतु आवश्यक है।
विवाद की वास्तविक चिंगारी यहीं से सुलगती है। नियमों के अंतर्गत गठित इक्विटी कमेटियों की संरचना पर गंभीर और मौलिक प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। इन समितियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग और महिला प्रतिनिधित्व को तो अनिवार्य किया गया है, किंतु सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर कोई स्पष्ट, सुनिश्चित या बाध्यकारी प्रावधान नहीं किया गया है। आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था स्वाभाविक न्याय और संतुलित प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों के प्रतिकूल है, क्योंकि जब निर्णय-प्रक्रिया में समाज के सभी वर्गों की समुचित भागीदारी नहीं होगी, तो निष्पक्षता केवल एक औपचारिक शब्द बनकर रह जाएगी।
सबसे गंभीर और चिंताजनक तथ्य यह है कि प्रारंभिक ड्राफ्ट नियमों में सम्मिलित झूठी, दुर्भावनापूर्ण अथवा प्रेरित शिकायतों पर दंड का प्रावधान अंतिम अधिसूचित नियमों से पूरी तरह हटा दिया गया है। इसका प्रत्यक्ष अर्थ यह है कि व्यक्तिगत द्वेष, अकादमिक प्रतिस्पर्धा, वैचारिक असहमति अथवा प्रशासनिक दबाव के तहत की गई शिकायतों पर शिकायतकर्ता की कोई उत्तरदायित्वपूर्ण जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की गई है। इससे शिक्षकों और छात्रों के मध्य भय, असुरक्षा, आत्म-संयम और मौन का वातावरण निर्मित होने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
इक्विटी स्क्वॉड जैसी निगरानी इकाइयों की अवधारणा ने भी शिक्षा जगत में तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया है। विश्वविद्यालय ज्ञान, संवाद, तर्क और विमर्श के जीवंत केंद्र होते हैं, न कि सतत निगरानी, रिपोर्टिंग और संदेह की प्रयोगशालाएं। आशंका यह भी व्यक्त की जा रही है कि इस प्रकार की व्यवस्था अकादमिक स्वतंत्रता को सीमित कर देगी और शिक्षक-छात्र संबंधों में सहजता के स्थान पर भय और अविश्वास की संस्कृति को बढ़ावा देगी।
नियमों के उल्लंघन की स्थिति में यूजीसी द्वारा मान्यता समाप्त करने, पाठ्यक्रमों पर रोक लगाने और अनुदान रोकने जैसे कठोर दंडात्मक प्रावधानों ने स्थिति को और अधिक विस्फोटक बना दिया है। विशेषज्ञों का मत है कि इस प्रकार की शक्तियां किसी भी नियामक संस्था को अत्यधिक केंद्रीकृत और दमनकारी बना सकती हैं, जिससे संस्थानों पर अनावश्यक प्रशासनिक, मानसिक और वैचारिक दबाव उत्पन्न होगा।
इन नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक चुनौती भी प्रस्तुत की गई है। याचिकाओं में यह तर्क दिया गया है कि ये विनियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) की मूल भावना के प्रतिकूल हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि समानता के नाम पर एकतरफा संरचना खड़ी करना स्वयं असमानता को संस्थागत वैधता प्रदान करने जैसा है।
सरकार और यूजीसी का तर्क है कि यह नियम राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 की भावना के अनुरूप हैं और शिक्षा में सामाजिक न्याय को सुदृढ़ करने की दिशा में अनिवार्य कदम हैं। किंतु विरोधी स्वर यह मूल प्रश्न उठाते हैं कि क्या समानता का अर्थ निगरानी, भय, दंड और असंतुलित प्रतिनिधित्व होना चाहिए, या फिर विश्वास, संवाद, पारदर्शिता और संस्थागत संतुलन।
आज यह विवाद मात्र यूजीसी के एक विनियम तक सीमित नहीं रह गया है। यह बहस भारत की उच्च शिक्षा की दिशा, उसकी वैचारिक स्वतंत्रता और उसके भविष्य को लेकर है। क्या विश्वविद्यालय स्वतंत्र चिंतन और बौद्धिक साहस के केंद्र बने रहेंगे, या वे प्रशासनिक नियंत्रण और सतत निगरानी की प्रयोगशालाओं में परिवर्तित हो जाएंगे—यह प्रश्न अब केवल अकादमिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन चुका है।
इसी संदर्भ में सामान्य वर्ग के भीतर एक गहरी और असहज होती जा रही मानसिक पीड़ा भी उभरकर सामने आ रही है। व्यापक रूप से यह भावना बलवती हो रही है कि केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए इन नियमों में सामान्य वर्ग को न केवल निर्णय-प्रक्रिया से दूर रखा गया है, बल्कि उसे एक संभावित अपराधी की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति भी परिलक्षित होती है। सामान्य वर्ग के मस्तिष्क में यह आशंका घर करती जा रही है कि राज्यसत्ता जब चाहे, जहां चाहे, उसे वैचारिक, प्रशासनिक अथवा संस्थागत रूप से निशाने पर ले सकती है। यह भावना लोकतांत्रिक संतुलन के लिए अत्यंत घातक संकेत है।
अतः यह मांग अब केवल अकादमिक असहमति नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन और संवैधानिक न्याय की पुकार बन चुकी है कि केंद्र सरकार यूजीसी 2026 के इन नियमों पर पुनर्विचार करे और इन्हें वर्तमान स्वरूप में वापस ले। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो समानता के नाम पर थोपी गई यह व्यवस्था समाज में नए प्रकार के विभाजन, अविश्वास और वैचारिक टकराव को जन्म दे सकती है—जिसकी कीमत केवल विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि पूरा राष्ट्र चुकाएगा।
