
दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ, 7 मार्च।लोकपर्व की सांस्कृतिक आभा और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की प्रेरक चेतना के मध्य राजधानी लखनऊ में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी द्वारा आयोजित लोकोत्सव-2026 का शुभारंभ अत्यंत मनोहारी और उल्लासपूर्ण वातावरण में हुआ।

गोमती नगर स्थित अकादमी परिसर के मुक्ताकाशीय मंच पर 7 और 8 मार्च को आयोजित इस लोकोत्सव की प्रथम संध्या लोकसंगीत की मधुर तरंगों और वीर रस की ऊर्जस्वित गूंज से सराबोर रही। वाराणसी की प्रख्यात लोक गायिका विदुषी डॉ. सुचरिता गुप्ता के सुरमय लोकगीतों और महोबा के सुप्रसिद्ध आल्हा गायक जितेन्द्र चौरसिया के ओजस्वी आल्हा गायन ने कार्यक्रम का ऐसा मधुर और रोमांचकारी आगाज़ किया कि श्रोतागण देर तक भाव-विभोर होकर तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकारों का अभिनंदन करते रहे।

लोकोत्सव का विधिवत उद्घाटन अकादमी के अध्यक्ष प्रो. जयंत खोत, उपाध्यक्ष विभा सिंह और निदेशक डॉ. शोभित कुमार नाहर द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर बिरजू महाराज कथक संस्थान की उपाध्यक्ष डॉ. मिथिलेश तिवारी सहित अनेक विशिष्ट जनों की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और भी बढ़ा दिया। उद्घाटन सत्र में अकादमी की उपाध्यक्ष विभा सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि ऐसे सांस्कृतिक अनुष्ठान समाज में सामूहिकता, सौहार्द और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करते हैं। उन्होंने भारतीय परम्परा के कालजयी सूत्र “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” का स्मरण कराते हुए नारी सम्मान और समाज निर्माण में महिलाओं की भूमिका को रेखांकित किया।

मंच संचालन राजेन्द्र विश्वकर्मा के कुशल और प्रभावी संयोजन में सम्पन्न हुआ। इसके पश्चात जब विदुषी डॉ. सुचरिता गुप्ता ने अपनी विशिष्ट बनारसी शैली में मिश्र काफी पर आधारित प्रसिद्ध ठुमरी “री मैं कैसे केसर रंग घोरूं” का आलाप प्रारंभ किया, तो वातावरण मानो सुरों की मधुरिमा से आलोकित हो उठा। उनकी स्वराभिव्यक्ति में शास्त्रीयता और लोकधारा का ऐसा अद्भुत समन्वय दिखाई दिया कि श्रोताओं की उत्सुकता क्षण-प्रतिक्षण बढ़ती चली गई।

होली के इन्द्रधनुषी उल्लास को अपनी गायकी में पिरोते हुए उन्होंने राग सहना में लोकप्रिय होरी “होरी मैं खेलूंगी श्याम से डट के” प्रस्तुत की, जिसने दर्शकों को उत्सव की रंगमय अनुभूति से भर दिया। इसके उपरांत उन्होंने बारहमासा “दुपहरिया बितायला हो, नई झुलनी के छहिया बलम” सुनाकर लोकजीवन की भावुक संवेदनाओं को सजीव कर दिया। श्रोताओं की उत्कंठा और तल्लीनता का आलम यह था कि हर प्रस्तुति के पश्चात तालियों की गूंज देर तक वातावरण में प्रतिध्वनित होती रही।
कार्यक्रम की रसधारा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने लोकप्रिय दादरा “रूठ गये सइया हमार” तथा नवरात्र और नवसंवत्सर के स्वागत में दो मार्मिक चैती—“सुतल सैयाँ के जगावे” और “बैरन रे कोयलिया तोरी बोली ना सुहाय”—प्रस्तुत कीं। इन गीतों में विरहिणी की पीड़ा, लोकजीवन की करुण संवेदनाएं और ऋतु परिवर्तन की भाव-लहरियां इतनी प्रभावी थीं कि श्रोता मानो उस भावलोक में डूबते चले गए। अंततः जब उन्होंने “गौरा संग भोला खेलत होरी” सुनाया, तो पूरा परिसर उत्सवधर्मी उल्लास से सराबोर हो उठा। उनकी प्रस्तुति में हारमोनियम पर पंडित पंकज मिश्रा और तबले पर पंडित ललित कुमार ने अत्यंत सधे और सुरम्य संगत से कार्यक्रम को और भी गरिमामय बना दिया।
इसी क्रम में जब मंच पर बुंदेलखंड लोक कला समिति महोबा के लोकप्रिय आल्हा गायक जितेन्द्र चौरसिया ने अपने दल के साथ प्रवेश किया, तो वातावरण अचानक वीर रस की ऊर्जा से उद्वेलित हो उठा। उन्होंने पारंपरिक बुंदेली शैली में महोबा की लड़ाई, मांडवगढ़ का युद्ध और कजली का संग्राम जैसे प्रसंगों का सजीव गायन प्रस्तुत किया, जिसने श्रोताओं के हृदय में वीरता और उत्साह का संचार कर दिया।
उनके साथ शरद अनुरागी, राहुल अनुरागी और दुष्यंत बुन्देला ने सामूहिक गायन में समर्थ सहयोग दिया। वहीं हारमोनियम पर सुमेन्द्र कुमार, ढोलक पर राधारमण, पखावज पर उदय प्रकाश तथा झांझ-मंजीरे पर अनुराग ने ऐसा लयात्मक सामंजस्य प्रस्तुत किया, जिसने आल्हा गायन को अद्वितीय ऊर्जस्विता प्रदान की। विशेष उल्लेखनीय यह रहा कि पारंपरिक आल्हा में जहां सामान्यतः सीमित वाद्यों का प्रयोग होता है, वहीं जितेन्द्र चौरसिया ने पखावज और हारमोनियम जैसे वाद्यों को सम्मिलित कर प्रस्तुति को अधिक प्रभावशाली बना दिया।
जब कलाकारों ने समवेत स्वर में “खट-खट-खट-खट तेगा बोले, खट-खट बोल रही तलवार, बड़े लड़इया महोबा वाले, जिनसे हार गई तलवार” का ऊर्जस्वित गायन किया, तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। पारंपरिक वेशभूषा—कलगीदार पगड़ी, आकर्षक जैकेट और कुर्ते—ने उनकी प्रस्तुति के सौंदर्य में चार चांद लगा दिए।
सांस्कृतिक सुरों और वीरता के आल्हादकारी संगम से सुसज्जित यह प्रथम संध्या देर रात तक लोकधुनों की मधुर अनुगूंज से गूंजती रही। अकादमी परिसर में सुसज्जित वातावरण के मध्य श्रोताओं ने लोकसंगीत की इस अनुपम सांगीतिक यात्रा का भरपूर आनंद लिया। उल्लेखनीय है कि लोकोत्सव की दूसरी संध्या पर लखनऊ की लोक गायिका रीना टण्डन तथा बृज क्षेत्र के लोकनृत्य कलाकार मुरारी लाल शर्मा अपनी प्रस्तुतियों से इस सांस्कृतिक उत्सव को और भी रंगारंग बनाएंगे।
