सेवा ही मानवता का परम धर्म: स्वान्त रंजन

“कौशल, सेवा और संस्कार का समन्वित उत्कर्ष—जब स्वावलंबन बना सामाजिक पुनर्जागरण का प्रखर शंखनाद”

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।आज महामना मालवीय विद्या मंदिर का पावन प्रांगण केवल एक औपचारिक आयोजन का साक्षी नहीं बना, अपितु वह एक ऐसे सूक्ष्म, किंतु व्यापक परिवर्तन का सृजन-स्थल सिद्ध हुआ, जिसकी स्पंदनशील तरंगें दीर्घकाल तक समाज के अंतःकरण को आंदोलित करती रहेंगी।

वातावरण में एक अनिर्वचनीय जिज्ञासा व्याप्त थी—क्या “सेवा” मात्र कर्तव्य का निर्वहन है, अथवा वह जीवन का वह परम सौभाग्य है, जो मनुष्य को स्वयं के सीमित अस्तित्व से परे ले जाकर व्यापक लोकमंगल से अभिन्न रूप में जोड़ देता है? इस मौन प्रश्न का उत्तर मानो सभागार की प्रत्येक झिलमिलाती किरण, प्रत्येक सजग दृष्टि और प्रत्येक धड़कते हृदय में अंतर्निहित था…

इसी भावमयी प्रतीक्षा के मध्य वह क्षण अवतरित हुआ, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वान्त रंजन मंचासीन हुए। उनके साथ पूर्व प्रांत संघ चालक प्रभुनारायण, राज्य सूचना आयुक्त दिलीप अग्निहोत्री, टीसीआई आई केयर सेंटर के निदेशक डा. उपशम गोयल, सेवा भारती लखनऊ पूर्व के महामंत्री एवं स्वावलंबन प्रमुख सुधीर कुमार गुप्ता, सदस्य नरेन्द्र सिंह एवं करन सिंह, मंत्री देवेश्वर सिंह, विभाग महामंत्री आलोक दीक्षित, विभाग अध्यक्ष पुष्कर केसरवानी, प्रांत उपाध्यक्ष राजेश अग्रवाल, प्रांत कोषाध्यक्ष एमबी रजावत तथा क्षेत्रीय बौद्धिक प्रमुख पश्चिम डा. रूप नारायण की सुसंयत एवं गरिमामयी उपस्थिति ने मंच को एक अद्वितीय वैचारिक ऊँचाई प्रदान कर दी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अनुभव, तप, चिंतन और सेवा का समग्र निचोड़ एक ही बिंदु पर साकार हो उठा हो—और यहीं से किसी नवचेतना का उद्भव होने जा रहा हो…


परंतु यह तो केवल भूमिका थी—वास्तविक उत्कर्ष तो तब उदित हुआ, जब स्वान्त रंजन का प्रखर, ओजस्वी एवं अंतःकरण को उद्वेलित कर देने वाला उद्बोधन आरंभ हुआ। उनके प्रत्येक शब्द में ऐसी तपश्चर्या, ऐसी नैतिक प्रखरता और ऐसी आत्मानुभूत सत्यता थी कि सभागार का प्रत्येक श्रोता अनायास ही आत्मावलोकन के गहन गर्त में उतरने को विवश हो उठा। उन्होंने स्पष्ट किया—“सेवा वह साधना है, जो मनुष्य को समाज के ऋण से उऋण होने का सशक्त पथ प्रदान करती है।

” यह कथन केवल ध्वनि बनकर नहीं रहा, अपितु वह प्रत्येक चेतना में एक अनवरत प्रतिध्वनि के रूप में प्रतिष्ठित हो गया…
और यहीं से वह अंतर्द्वंद्व और भी प्रखर हो उठा—क्या हम वास्तव में उस उत्तरदायित्व का निर्वहन कर पा रहे हैं, जिसका निर्वहन हमारा नैतिक दायित्व है? इसी आत्ममंथन के मध्य जब प्रमाण-पत्र वितरण का क्रम प्रारंभ हुआ, तो वह एक साधारण प्रक्रिया नहीं रही; वह उन अथक परिश्रमों, उन मौन संघर्षों और उन अदृश्य संकल्पों का सार्वजनिक अभिषेक बन गई, जिन्हें प्रशिक्षुओं ने महीनों तक साधा था। एसी, फ्रिज एवं वॉशिंग मशीन मरम्मत का यह प्रशिक्षण केवल कौशल-प्राप्ति तक सीमित नहीं रहा, अपितु उसने आत्मनिर्भरता का वह बीज रोपित किया, जो कालांतर में सामाजिक सशक्तिकरण के विराट वटवृक्ष में परिणत होने की क्षमता रखता है…


जब दृष्टि मंच से हटकर उन प्रशिक्षुओं के मुखमंडल पर पड़ी, तो वहाँ केवल उल्लास नहीं था—वहाँ आत्मविश्वास की एक नवीन प्रभा थी, एक निःशब्द प्रतिज्ञा थी, जो संकेत कर रही थी कि अब उनका जीवन केवल आत्मकेंद्रित नहीं रहेगा, बल्कि वह समाजोपयोगी चेतना से अनुप्राणित होगा। सेवा भारती द्वारा संचालित यह समग्र प्रयास वस्तुतः उसी व्यापक, समावेशी और राष्ट्रोन्मुख चिंतन का प्रतिफल है, जिसमें समाज के अंतिम छोर पर स्थित व्यक्ति तक अवसर, सम्मान और स्वाभिमान पहुँचाने का संकल्प निहित है…


अंततः, जब यह आयोजन अपने औपचारिक समापन की ओर अग्रसर हुआ, तब भी उसका भावार्थ समाप्त नहीं हुआ—वह एक गूढ़ संदेश बनकर प्रत्येक हृदय में स्पंदित होता रहा। जब मनुष्य सेवा को अपने जीवन का केन्द्रीय तत्व बना लेता है, तब वह केवल एक व्यक्तित्व नहीं रहता, वह एक विचारधारा बन जाता है… एक प्रेरणा बन जाता है… और संभवतः यही वह सूक्ष्म, किंतु निर्णायक क्षण है, जहाँ से एक साधारण जीवन असाधारण अर्थवत्ता का आलोक प्राप्त करता है।

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