

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ, 8 मार्च। लोक संस्कृति की अनुपम छटा, संगीत की मधुर तरंगों और होली के रंगोत्सव से अभिसिंचित वातावरण में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के मुक्ताकाशीय मंच पर आयोजित दो दिवसीय लोकोत्सव ने राजधानी को लोकजीवन की रंगमय आभा से सराबोर कर दिया। लोक पर्व और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस–2026 के पावन अवसर पर 7 एवं 8 मार्च को आयोजित इस सांस्कृतिक महोत्सव में लोकगायन, नृत्य और परंपरागत उत्सवधर्मिता का ऐसा समन्वित संगम देखने को मिला, जिसने उपस्थित दर्शकों के मन में भारतीय लोकधारा के प्रति गहन अनुराग और उत्साह का संचार कर दिया।

उत्सव की द्वितीय संध्या रविवार को उस समय विशेष रूप से आलोकित हो उठी, जब लखनऊ की सुप्रसिद्ध वरिष्ठ लोक गायिका रीना टंडन और ब्रजभूमि के लोकप्रिय लोकनृत्याचार्य मुरारी लाल शर्मा ने अपनी सशक्त और मोहक प्रस्तुतियों से पूरे समारोह को उल्लास के चरम पर पहुँचा दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ अकादमी के अध्यक्ष प्रो. जयंत खोत, उपाध्यक्ष विभा सिंह, निदेशक डॉ. शोभित कुमार नाहर, उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजातीय कला एवं संस्कृति संस्थान के निदेशक डॉ. अतुल द्विवेदी तथा केजीएमयू की वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. विनीता सिंह द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। दीप की ज्योति के साथ ही मंच पर लोकसंस्कृति का आलोक फैल गया और वातावरण श्रद्धा, संगीत और सौंदर्य से भर उठा।

समारोह का एक अत्यंत प्रेरक आयाम यह रहा कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में अकादमी द्वारा पहली बार महिलाओं का विशेष सम्मान समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर अकादमी परिवार की महिला सदस्यों—विभा सिंह, रेनू श्रीवास्तव, अर्चना, विभा सैकिया, नसरीन, महिमा सिंह, श्रुति शर्मा, नीता जोशी, रजनी और सुमन—के साथ ही समाज में महिला सशक्तिकरण के लिए सक्रिय स्वयंसेवी संस्थाओं की प्रतिनिधियों राधा यादव, सोनी पाठक, गीता, सुनीता, आरती आदि को पुष्प और अंगवस्त्र अर्पित कर सम्मानित किया गया। यह दृश्य केवल सम्मान का नहीं, बल्कि नारी शक्ति के प्रति समाज की कृतज्ञता का भावपूर्ण प्रतीक बन गया।

इसके उपरांत लोकोत्सव के प्रथम सत्र में जब वरिष्ठ लोक गायिका रीना टंडन मंच पर आयीं, तो उनके मधुर कंठ से निकली पारंपरिक गणपति वंदना—“गणपति खेलै रंग आज पर्वत पर”—ने संपूर्ण वातावरण को भक्तिभाव और उल्लास के अद्भुत सम्मिलन से भर दिया। गणेश वंदना के पश्चात उन्होंने वसंत ऋतु की रमणीयता से ओतप्रोत रचना “घिर आयो नवल वसंत” तथा फाग गीत “उड़त अबीर गुलाल, रंगीली होली है” प्रस्तुत कर श्रोताओं को मानो रंग और रस के लोक में प्रवेश करा दिया।

ज्यों-ज्यों सुरों की यह धारा प्रवाहित होती गई, दर्शकों का उत्साह भी उत्कर्ष पर पहुँचता गया। राग काफी पर आधारित पारंपरिक होली “होली खेलत गिरधारी रे वनवारी रे, राधा प्यारी भीज गई” की प्रस्तुति ने पूरे परिसर को तालियों की गूँज से भर दिया। इसके बाद पूर्वांचल में प्रचलित चहका “सिर बाँधे मुकुट खेले होली” और नवरात्र परंपरा से जुड़ी लांगुरिया “सुंदर फूल परे परिया पे, मन मोह्यो लांगुरिया” ने श्रोताओं को लोकधुनों के मोहक संसार में डुबो दिया। अंत में श्रृंगार और विरह के भावों से परिपूर्ण उलारा “राधे नहीं बोले बुलाए से” ने प्रस्तुति को भावविभोर समापन प्रदान किया।
इन प्रस्तुतियों के साथ मंच पर नृत्यांगनाओं वैष्णवी वर्मा, परी वर्मा और श्रेष्ठा श्रीवास्तव के भावनृत्य ने संगीत को दृश्यात्मक सौंदर्य से परिपूर्ण कर दिया। वहीं वाद्य संगत में आर्गन पर जितेंद्र, ढोलक पर प्रदीप, नक्कारे पर सुनील विश्वकर्मा, साइड रिदम पर मनोज वर्मा और सैक्सोफोन पर शिव ने स्वर-लय का अद्भुत सामंजस्य रचा। सहगायिकाओं शिखा श्रीवास्तव और ज्योति शर्मा की मधुर संगति ने प्रस्तुति को और अधिक प्रभावपूर्ण बना दिया।
द्वितीय सत्र में मंच पर जब ब्रज के विख्यात लोकनृत्याचार्य पंडित मुरारी लाल शर्मा अपने दल के साथ अवतरित हुए, तो मानो वृंदावन और बरसाने की होली का जीवंत दृश्य अकादमी परिसर में साकार हो उठा। मयूर रास के अंतर्गत उन्होंने राधा-कृष्ण के अलौकिक प्रेम और महारास की दिव्य कथा को नृत्याभिनय के माध्यम से इस प्रकार प्रस्तुत किया कि दर्शक मंत्रमुग्ध होकर उस आध्यात्मिक सौंदर्य में डूबते चले गए।
“एक दिना श्री कुंवर राधिका मोर कुटी आयी” पर प्रस्तुत मयूर रास ने जहां कृष्ण के मयूर रूप की अलौकिक छवि को साकार किया, वहीं “फाग खेलन बरसाने में आये हैं नटवर नंद” और “फूलों में सज रहे हैं श्री वृंदावन बिहारी” जैसी रचनाओं पर लठमार होली और फूलों की होली के सजीव दृश्य ने समूचे वातावरण को सतरंगी उल्लास से सराबोर कर दिया।
गायन, वादन और नृत्य की समन्वित प्रस्तुति में कलाकारों संजय कुमार शर्मा, पप्पू, जगदीश प्रसाद, सोनू, रवि शर्मा, नरेश, लवेश, ज्योति, सपना, आशा, लेखराज शर्मा और सचिन ने अपनी प्रभावशाली सहभागिता से कार्यक्रम को कलात्मक ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
सुसज्जित और आकर्षक वातावरण में सम्पन्न इस सांस्कृतिक संध्या का आनंद लेने हेतु अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व भी उपस्थित रहे, जिनमें वरिष्ठ गायिका विमल पंत, कमलेश पाठक तथा राजेंद्र विश्वकर्मा सहित विभिन्न कला-रसिक सम्मिलित थे।
लोकधुनों, रंगों और सांस्कृतिक उल्लास से अभिसिंचित यह लोकोत्सव केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय लोकजीवन की जीवंतता, नारी सम्मान और सांस्कृतिक परंपराओं की अविरल धारा का सशक्त उत्सव बनकर उपस्थित हुआ—जिसने दर्शकों के मन में यह विश्वास पुनः दृढ़ कर दिया कि लोकसंस्कृति की यह अमूल्य विरासत आज भी उतनी ही सजीव, प्रेरक और प्राणवान है।
