
दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली।स्वास्थ्य को यदि केवल रोगों की अनुपस्थिति मान लिया जाए, तो यह जीवन के विराट यथार्थ का संकुचित मूल्यांकन होगा। वास्तविक स्वास्थ्य वह अवस्था है, जहाँ शरीर अपनी जैविक पूर्णता में कार्यरत हो, मन संतुलन और प्रसन्नता से ओत-प्रोत हो तथा विचारों की दिशा जीवन को विघटन नहीं, बल्कि उत्कर्ष की ओर ले जाए। यही वह बिंदु है, जहाँ समग्र स्वास्थ्य और सर्वोत्तम स्वास्थ्य की अवधारणाएँ जन्म लेती हैं—और यहीं से स्वास्थ्य, चिकित्सा से आगे बढ़कर जीवन-विज्ञान बन जाता है।
आधुनिक अनुसंधान यह स्वीकार करने लगे हैं कि मनुष्य का शरीर केवल कोशिकाओं और रसायनों का यांत्रिक संयोजन नहीं है। न्यूरोसाइंस, साइकोन्यूरोइम्यूनोलॉजी और एपिजेनेटिक्स यह सिद्ध कर चुके हैं कि विचार, भाव और मानसिक अवस्था सीधे तौर पर हार्मोनल स्राव, प्रतिरक्षा प्रणाली और जीन-अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं। यह वैज्ञानिक तथ्य उस प्राचीन बोध का आधुनिक प्रतिपादन है, जिसके अनुसार मनुष्य का आंतरिक भाव-जगत उसके शारीरिक स्वास्थ्य का मौन नियंता होता है।
यहीं से समग्र स्वास्थ्य की अवधारणा गहराई प्राप्त करती है। इसमें शरीर को केवल उपचार की वस्तु नहीं, बल्कि चेतना का उपकरण माना जाता है। भोजन यहाँ केवल कैलोरी का गणित नहीं, बल्कि ऊर्जा, स्मृति और संस्कार का संवाहक बन जाता है। जिस प्रकार अशुद्ध ईंधन यंत्र को क्षति पहुँचाता है, उसी प्रकार अविवेकी आहार मन और शरीर दोनों की कार्यक्षमता को क्षीण करता है। विज्ञान इसे मेटाबॉलिक डिसऑर्डर कहता है, जबकि दर्शन इसे जीवन-लय का विघटन मानता है—दोनों का निष्कर्ष एक ही है।
सर्वोत्तम स्वास्थ्य की अवस्था वहाँ प्रकट होती है, जहाँ शरीर अपनी प्राकृतिक लय में चलता है। नींद केवल विश्राम नहीं, बल्कि कोशिकीय मरम्मत की प्रक्रिया बन जाती है। श्वास केवल ऑक्सीजन का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि तंत्रिका तंत्र को संतुलित करने वाला सूक्ष्म अनुशासन बनती है। ध्यान केवल आध्यात्मिक क्रिया नहीं, बल्कि मस्तिष्क की न्यूरोप्लास्टिसिटी को सकारात्मक दिशा देने वाला वैज्ञानिक साधन सिद्ध होता है। यहाँ अध्यात्म और विज्ञान के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं रह जाती—दोनों एक ही सत्य को भिन्न भाषाओं में अभिव्यक्त करते हैं।
मानव जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि वह रोगग्रस्त होता है, बल्कि यह है कि वह अपने जीवन की मर्यादा खो देता है। अनियंत्रित दिनचर्या, असंतुलित इच्छाएँ और निरंतर मानसिक उत्तेजना—ये सभी मिलकर उस आंतरिक सामंजस्य को तोड़ देते हैं, जिस पर स्वास्थ्य टिका होता है। समग्र स्वास्थ्य इस मर्यादा की पुनर्स्थापना का विज्ञान है। यह व्यक्ति को सिखाता है कि कब रुकना है, कब आगे बढ़ना है और कब मौन रहना है।
विचारों की भूमिका यहाँ निर्णायक हो जाती है। नकारात्मक चिंतन केवल मानसिक समस्या नहीं, बल्कि जैव-रासायनिक विकृति का कारण बनता है। निरंतर भय, क्रोध और असंतोष की अवस्था में रहने वाला मन शरीर को क्रॉनिक स्ट्रेस की स्थिति में डाल देता है, जिसके परिणामस्वरूप उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय-रोग जैसे विकार जन्म लेते हैं। इसके विपरीत संतुलित, संयमित और अर्थपूर्ण विचार शरीर में हीलिंग रिस्पॉन्स को सक्रिय करते हैं—यह तथ्य आज प्रयोगशालाओं में प्रमाणित हो चुका है।
यही कारण है कि समग्र स्वास्थ्य किसी एक पद्धति या औषधि का नाम नहीं, बल्कि जीवन को देखने की दृष्टि है। यह व्यक्ति को उपभोक्ता नहीं, साधक बनाता है; रोगी नहीं, जागरूक सहभागी बनाता है। यहाँ उपचार बाहर से नहीं, भीतर से आरंभ होता है। जब मनुष्य अपने जीवन में अनुशासन को दमन नहीं, बल्कि संरक्षण के रूप में स्वीकार करता है, तब स्वास्थ्य एक संघर्ष नहीं, स्वाभाविक अवस्था बन जाता है।
आज की तीव्रगामी, प्रतिस्पर्धात्मक और तनावग्रस्त जीवन-शैली में सर्वोत्तम स्वास्थ्य की अवधारणा एक क्रांतिकारी आवश्यकता बन गई है। यह मनुष्य को सिखाती है कि सफलता और स्वास्थ्य परस्पर विरोधी नहीं हैं, बशर्ते जीवन की गति और दिशा में संतुलन हो। जब कार्य, विश्राम, आहार, विचार और उद्देश्य—इन पाँचों के बीच सामंजस्य स्थापित हो जाता है, तब जीवन केवल जीया नहीं जाता, अनुभूत किया जाता है।
अंततः समग्र और सर्वोत्तम स्वास्थ्य किसी बाहरी आदर्श की नकल नहीं, बल्कि आत्म-बोध की परिणति है। यह वह अवस्था है जहाँ शरीर साधन बन जाता है, मन सहयोगी और चेतना मार्गदर्शक। यहाँ जीवन न रोगों से डरता है, न मृत्यु से—क्योंकि वह हर क्षण पूर्णता के साथ प्रवाहित हो रहा होता है। यही स्वास्थ्य का सर्वोच्च विज्ञान है, यही जीवन का गूढ़ दर्शन।
