
लखनऊ।सनातन परंपरा में जन्मदिवस केवल देह के पृथ्वी पर अवतरण की तिथि नहीं होता, बल्कि वह उस चेतना का स्मरण-दिवस होता है, जिसके माध्यम से परम तत्त्व स्वयं को अभिव्यक्त करता है। प्रभु श्री सीताराम के अनन्य उपासक एवं वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अजय दीप सिंह का जन्मदिवस इसी अर्थ में साधारण नहीं, बल्कि तत्त्व-बोध और चेतना-संस्कार का उत्सव है। इस पावन अवसर पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ द्वारा उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ एवं सनातन प्रणति अर्पित की गई हैं।
सनातन दर्शन के अनुसार परम तत्त्व एक है, किंतु उसकी अभिव्यक्ति द्वैत में होती है—पुरुष और प्रकृति। वही परम तत्त्व जब सृष्टि के अधिष्ठान के रूप में प्रकट होता है, तो श्रीराम कहलाता है; और जब उसकी चेतना-शक्ति सृजनशील, करुणामयी एवं गतिशील स्वरूप धारण करती है, तो वही मां सीता, गायत्री, राधा, रुद्राणी जैसे अनंत नामों से पूजित होती है। यह कोई पौराणिक कल्पना नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय चेतना का सनातन सूत्र है।
श्रीराम केवल अयोध्या के राजा नहीं हैं; वे काल, दिशा और नियमों से परे स्थित परम ब्रह्म हैं। और मां सीता उस ब्रह्म की जीवंत चेतना हैं—वह शक्ति, जिसके बिना ब्रह्म निष्क्रिय है। जिस प्रकार अग्नि बिना दाह-शक्ति के अग्नि नहीं कहलाती, उसी प्रकार राम बिना सीता के केवल तत्त्व हैं, चेतन नहीं। यही कारण है कि सनातन परंपरा में श्रीराम को समझने के लिए मां सीता को जानना अनिवार्य माना गया है।
द्वापर युग में यही तत्त्वज्ञान श्रीकृष्ण और राधा के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ। संत परंपरा में यह मान्यता है कि कृष्ण के जन्म से पूर्व ही ब्रह्मांड की चेतना राधा के रूप में प्रकट हो चुकी थी। प्रभु के साक्षात्कार से पूर्व राधा ने नेत्र नहीं खोले—क्योंकि चेतना तब तक पूर्ण नहीं होती, जब तक वह अपने परम तत्त्व में विलीन न हो जाए। यही सत्य त्रेता में सीता-राम और सतयुग में शिव-शक्ति के रूप में प्रकट हुआ।
मानव जीवन में भी यही सनातन नियम लागू होता है। यदि श्रीराम रूपी परम तत्त्व का वास जीवन में हो जाए, तो मां सीता रूपी चेतना स्वतः जागृत हो जाती है। तब जीवन केवल भोग या संघर्ष नहीं रहता, बल्कि परमानंद, परम तेज और परम शांति की अनुभूति बन जाता है। संतों ने स्पष्ट कहा है—
“प्रभु को जानना कठिन नहीं, कठिन है स्वयं को इतना सरल बनाना कि प्रभु स्वयं प्रकट हो जाएँ।”
वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अजय दीप सिंह का व्यक्तित्व इसी सनातन सरलता और तत्त्वनिष्ठा का प्रतिरूप प्रतीत होता है। प्रशासनिक कठोरता के मध्य आध्यात्मिक सौम्यता, और सत्ता के शिखर पर रहते हुए भी तत्त्व-बोध में स्थित रहना—यह साधारण उपलब्धि नहीं है। उनके जीवन में प्रभु श्री सीताराम केवल आराध्य नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि हैं। यही कारण है कि उनका कर्म प्रशासन तक सीमित न रहकर सेवा, संतुलन और संस्कार का माध्यम बन जाता है।
आधुनिकता के इस कोलाहलपूर्ण युग में, जहाँ चेतना का केंद्र बिखरता जा रहा है और मनुष्य अपने मूल से विमुख होता प्रतीत होता है, ऐसे व्यक्तित्व सनातन सेतु का कार्य करते हैं—जो परंपरा को आधुनिकता से जोड़ते हैं और तत्त्वज्ञान को व्यवहार में रूपांतरित करते हैं।
अजय दीप सिंह का जन्मदिवस इसलिए केवल एक व्यक्तिगत अवसर नहीं, बल्कि उस चेतना का स्मरण है जो यह बोध कराती है कि प्रकृति और पुरुष का संतुलन ही जीवन है, और श्री सीताराम का वास ही मानव को उसके उच्चतम स्वरूप तक ले जाता है।
प्रभु श्री सीताराम की कृपा से उनका जीवन इसी प्रकार लोकसेवा, तत्त्वचिंतन और चेतना-प्रकाश का पथ प्रशस्त करता रहे—यही सनातन कामना, यही हार्दिक शुभेच्छा।
