महाशिवरात्रि: आत्मोत्कर्ष, तत्त्वबोध और शिवत्व की अनिवार्य साधना

हरेंद्र सिंह दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ। महाशिवरात्रि केवल आस्था का अनुष्ठान नहीं, अपितु चेतना के परिष्कार का परम अवसर है। यह वह महानिशा है, जब साधक अपने अंतर्मन के गर्भगृह में प्रवेश कर शिवतत्त्व का साक्षात्कार करने का साहस करता है। इस रात्रि में उपवास केवल अन्न का त्याग नहीं, बल्कि विकारों का परित्याग है; जागरण केवल नेत्रों का खुला रहना नहीं, बल्कि आत्मा का जाग्रत होना है। जब समस्त संसार निद्रा में लीन होता है, तब शिव का साधक मौन के मध्य उस निनाद को सुनने का प्रयास करता है, जो समस्त सृष्टि के मूल में स्पंदित हो रहा है। प्रश्न यह है कि क्या हम उस आह्वान को सुनने के लिए तत्पर हैं?
शिव महापुराण इस प्रश्न का उत्तर अद्भुत प्रतीकों के माध्यम से प्रदान करता है। वहाँ वर्णित है कि महाशिवरात्रि की रात्रि में किया गया एक लघु उपासना-कर्म भी अनंत पुण्यफलदायी हो जाता है। व्याध की कथा इसका ज्वलंत उदाहरण है—अज्ञानवश हिंसात्मक जीवन जीने वाला वह व्यक्ति अनायास बेलपत्र अर्पित कर बैठा और शिवकृपा का अधिकारी बन गया। यह प्रसंग उद्घोष करता है कि शिव विधि से अधिक भाव के उपासक हैं। जब भाव निर्मल हो, तो अनजाने में किया गया समर्पण भी मोक्ष का सेतु बन सकता है। यह विचार साधक के अंतःकरण में आशा का दीप प्रज्वलित करता है—यदि अनायास अर्पण इतना फलदायी है, तो सचेत साधना कितनी महिमामयी होगी?

इसी जिज्ञासा को और प्रखर करता है स्कंद पुराण, जहाँ शिवरात्रि को समस्त व्रतों का मुकुटमणि कहा गया है। वहाँ प्रतिपादित है कि इस रात्रि में ‘ॐ नमः शिवाय’ का एकनिष्ठ जप साधक को शिव-सायुज्य के समीप ले जाता है। किंतु यहाँ एक सूक्ष्म संकेत भी निहित है—शिवरात्रि केवल वरदान प्राप्ति का साधन नहीं, अपितु आत्मसंयम का अभ्यास है। जब मनुष्य एक रात्रि के लिए इंद्रियों को अनुशासित कर लेता है, तब उसे अनुभव होता है कि जीवन की वास्तविक स्वतंत्रता भोग में नहीं, संयम में निहित है। क्या यही आत्मविजय का प्रारंभ नहीं?
महाशिवरात्रि का एक और आयाम है—गुरुतत्त्व का स्मरण। गुरु गीता, जो शिव-पार्वती संवाद के रूप में प्रतिष्ठित है, यह उद्घोष करती है कि गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही महेश्वर हैं। स्वयं भगवान शिव ने पार्वती को गुरु की अनिवार्यता का उपदेश दिया। यह तथ्य संकेत करता है कि शिवत्व की प्राप्ति केवल बाह्य अनुष्ठानों से संभव नहीं; उसके लिए योग्य मार्गदर्शक का सान्निध्य आवश्यक है। अतः शिवरात्रि साधक को केवल पूजा की प्रेरणा नहीं देती, बल्कि उसे गुरु-कृपा की शरण में जाने का आह्वान भी करती है। क्या हम उस शरणागति के लिए तैयार हैं?
शिव का नीलकंठ स्वरूप इस पर्व की आत्मा है। समुद्र-मंथन में प्रकट हलाहल को धारण कर उन्होंने समस्त लोकों की रक्षा की। यह प्रसंग केवल पौराणिक आख्यान नहीं, अपितु जीवन-दर्शन है। मानव जीवन में भी विषमताएँ, अवसाद और संघर्ष अनिवार्य हैं। जो व्यक्ति उन विषों को धैर्यपूर्वक धारण कर लेता है, वही नीलकंठ बनता है। आज के युग में, जब व्यक्ति क्षणिक सुखों के लिए अपने धैर्य और संतुलन का परित्याग कर देता है, शिवरात्रि उसे स्मरण कराती है कि महानता त्याग और सहनशीलता में निहित है।

अंततः महाशिवरात्रि आत्मोत्कर्ष का घोष है। यह हमें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर, मृत्यु-बोध से अमृतत्व की अनुभूति की ओर ले जाने वाला सेतु है। जब साधक इस रात्रि में शिवनाम का जप करता है, तब वह अनुभव करता है कि शिव कहीं दूरस्थ कैलास पर नहीं, अपितु उसके स्वयं के अंतःकरण में प्रतिष्ठित हैं। यही इस पर्व का परम संदेश है—शिवत्व बाहर नहीं, भीतर है; उसे जाग्रत करना ही मानव जीवन का सर्वोच्च साध्य है।
इसी आत्मबोध, आत्मसंयम और आत्मोद्धार के संकल्प के साथ यह लेख प्रस्तुत है, ताकि प्रत्येक साधक महाशिवरात्रि की महानिशा में अपने भीतर सुप्त दिव्यता को जाग्रत कर सके और जीवन को शिवमय बना सके।

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