
दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ। सनातन धर्म का मूल तत्त्व यदि किसी एक शब्द में समाहित किया जा सके, तो वह शब्द होगा—गुरु। गुरु न तो केवल व्यक्ति हैं, न केवल संस्था, और न ही मात्र परंपरा; गुरु वह चैतन्य-सिद्धांत हैं, जिसके बिना सनातन का कोई भी दर्शन पूर्ण नहीं होता। गुरु के बिना साधना क्रिया बनकर रह जाती है, दर्शन कल्पना बन जाता है और जीवन उद्देश्यविहीन संघर्ष। गुरु वह धुरी हैं, जिनके चारों ओर साधक का सम्पूर्ण अस्तित्व घूमता है।
सनातन दृष्टि में गुरु उपदेशक नहीं, अनुभव का साक्षात् स्वरूप हैं। उनके सान्निध्य में जीवन कर्म से उठकर साधना और साधना से उठकर तत्त्वबोध में परिवर्तित हो जाता है। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म में गुरु को ईश्वर से भी पूर्व स्थान दिया गया—क्योंकि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग भी गुरु की चेतना से होकर ही गुजरता है।
भारतीय मनीषा का यह महावाक्य—
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः”
कोई भावुक स्तुति नहीं, बल्कि ब्रह्मज्ञान की सूत्रात्मक व्याख्या है। ब्रह्मा सृजन हैं, विष्णु संरक्षण हैं और महेश संहार हैं—परंतु गुरु वह तत्त्व हैं जो साधक के भीतर अज्ञान का संहार, विवेक का सृजन और चेतना का संरक्षण—तीनों को एक साथ संपन्न करते हैं। इसीलिए गुरु को देवताओं की श्रेणी में नहीं, देवतत्त्व के मूल स्रोत में प्रतिष्ठित किया गया।
स्कंद पुराण अंतर्गत गुरु-गीता इस दर्शन को और अधिक स्पष्टता एवं कठोर सत्य के साथ उद्घाटित करती है—
“न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः।”
यह वाक्य साधना-जगत का केन्द्रीय सूत्र है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि तप, योग या जप निरर्थक हैं, बल्कि यह कि ये सभी साधनाएँ गुरु-कृपा के बिना आत्मा तक नहीं पहुँच सकतीं। गुरु वह सूर्य हैं, जिनके प्रकाश के बिना साधना का आकाश केवल प्रयासों से भरा रहता है—प्रकाश से नहीं।
गुरु-गीता आगे उद्घोष करती है—
“गुरुकृपां विना देवि न सिद्धिः स्यात् कदाचन।”
यह कथन साधक के अहंकार को नहीं, उसके भ्रम को तोड़ता है। यह उसे यह बोध कराता है कि आत्मोन्नति का मार्ग स्वेच्छा नहीं, समर्पण से प्रशस्त होता है। जैसे बीज स्वयं को वृक्ष नहीं बना सकता, वैसे ही साधक भी गुरु-कृपा के बिना आत्मविस्तार नहीं कर सकता। गुरु-कृपा कोई कृपा-दृष्टि नहीं, बल्कि चेतना का वह प्रवाह है, जो साधक को उसकी ही गहराइयों से जोड़ देता है।
स्कंद पुराण गुरु को भवसागर से पार उतारने वाला सेतु कहता है। यह केवल उपमा नहीं, बल्कि अस्तित्वगत यथार्थ है। संसार-समुद्र में डूबता हुआ जीव जब केवल अपने विवेक या प्रयास के बल पर तैरना चाहता है, तो वह शीघ्र ही थक जाता है। किंतु जब वही जीव गुरु-तत्त्व के सेतु का आश्रय लेता है, तब पार जाना सहज हो जाता है। गुरु ज्ञान नहीं थोपते—वे साधक के भीतर से भय, संशय और अहंकार का क्षरण करते हैं। जहाँ गुरु का वास होता है, वहाँ अज्ञान का टिकना असंभव हो जाता है।
गुरु-तत्त्व का सबसे सूक्ष्म और गहन पक्ष यह है कि वह बाह्य नहीं, अंतःस्थ होता है। पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का यह कथन इसी सत्य की पुष्टि करता है कि गुरु कोई दूरस्थ सत्ता नहीं, बल्कि वह चेतना है जो साधक के चिंतन को शुद्ध, चरित्र को दृढ़ और कर्म को लोकमंगलकारी बनाती है। उनके अनुसार गुरु पर साधक का अधिकार सुविधा का नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का होता है। गुरु-कृपा कोई भोग की वस्तु नहीं, बल्कि एक जीवंत दायित्व है—जिसे साधक को अपने जीवन-कर्म से सिद्ध करना पड़ता है।
गुरु-गीता यह भी स्पष्ट संकेत देती है कि गुरु केवल मोक्ष का मार्ग नहीं दिखाते, बल्कि जीवन को सार्थक कर्मभूमि में रूपांतरित करते हैं। जब साधक गुरुसत्ता को अपने जीवन की अंतःप्रज्ञा मान लेता है, तब उसकी साधना आत्मकेंद्रित मुक्ति से आगे बढ़कर समाज, संस्कृति और राष्ट्र के उत्थान का माध्यम बन जाती है। यही वह अवस्था है, जहाँ साधक स्वयं दीप बन जाता है—जो न केवल स्वयं प्रकाशित होता है, बल्कि असंख्यों के जीवन का अंधकार भी दूर करता है।
इसी गहन दार्शनिक और सनातन दृष्टि को आधार बनाकर हाल ही में राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय महासचिव, और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अजय दीप सिंह—विश्व हिंदू परिषद के प्रन्यासी, के मध्य गुरु-तत्त्व पर एक अत्यंत गंभीर विमर्श हुआ। यह संवाद किसी औपचारिक चर्चा का रूप नहीं, बल्कि दो विचारशील सनातनी मनीषियों के मध्य तत्त्वबोधात्मक संवाद था। गुरु-गीता और स्कंद पुराण के शास्त्रीय सूत्रों के आलोक में दोनों ने यह प्रतिपादित किया कि गुरुसत्ता केवल साधना का केंद्र नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज, शासन और राष्ट्र—सभी के लिए नैतिक व वैचारिक आधार है।
यह विमर्श इस तथ्य का साक्ष्य बनकर उभरा कि सनातन गुरु-तत्त्व न तो अतीत की स्मृति है, न ही केवल आश्रमों तक सीमित अवधारणा—बल्कि आज भी वह जीवंत शक्ति है, जो चिंतनशील व्यक्तित्वों के माध्यम से राष्ट्र की चेतना को दिशा देने की क्षमता रखती है। यही गुरुसत्ता का शाश्वत स्वरूप है—अक्षय, अविचल और कालातीत।
