
एंटीबायोटिक युग के अंत और न्यूट्रीशनल संकट की दस्तक
हरेंद्र सिंह दैनिक इंडिया न्यूज़,नई दिल्ली।भारत आज एक ऐसे मौन किंतु घातक स्वास्थ्य आपातकाल की ओर बढ़ रहा है, जिसकी आहट तो हर गली, हर परिवार और हर अस्पताल में सुनाई दे रही है, लेकिन जिसकी जड़ तक पहुँचने में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी असहज दिखाई दे रहा है। साइलेंट हार्ट अटैक, अचानक हाइपोग्लाइसीमिया, कार्डियक अरेस्ट, ब्रेन स्ट्रोक और प्रतिरोधक क्षमता का एकाएक ध्वस्त हो जाना अब विरल घटनाएँ नहीं रहीं। ये घटनाएँ इस बात का संकेत हैं कि देश का स्वास्थ्य ढांचा भीतर से दरक रहा है और आम नागरिक को यह तक भरोसा नहीं रह गया है कि अगली सुबह वह सुरक्षित देख पाएगा या नहीं।
आज की सबसे भयावह तस्वीर वह है, जहाँ पिता जीवित हैं और युवा पुत्र का असमय निधन हो रहा है। यह केवल किसी एक परिवार का शोक नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। यदि यही प्रवृत्ति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में भारत की युवा जनसंख्या में भारी गिरावट एक संभावित यथार्थ बन जाएगी। यह संकट केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना को भी गहराई से प्रभावित करेगा।
वर्ष 2005 के बाद भारत की खान-पान संस्कृति में आए आमूलचूल परिवर्तन ने इस संकट की आधारशिला रखी। फास्ट फूड, चाइनीज़ फूड, प्रोसेस्ड और रिफाइंड खाद्य पदार्थों ने परंपरागत संतुलित आहार को लगभग विस्थापित कर दिया। मोनोसोडियम ग्लूटामेट (MSG), ट्रांस फैट, कृत्रिम रंग, रासायनिक फ्लेवर और प्रिज़र्वेटिव्स ने धीरे-धीरे शरीर की कोशिकाओं में अपनी पैठ बना ली। इन तत्वों ने माइटोकॉन्ड्रियल स्तर पर क्षति पहुँचाकर शरीर की ऊर्जा उत्पादन प्रणाली को कमजोर कर दिया, जिसका प्रतिफल आज गिरते स्वास्थ्य और अचानक मौतों के रूप में सामने आ रहा है।
2020 में आई कोविड-19 महामारी ने इस संकट को और गहरा कर दिया। पोस्ट-कोविड सिंड्रोम, क्रॉनिक थकान, हृदय गति संबंधी विकार, न्यूरोलॉजिकल समस्याएँ और इम्यून सिस्टम की अस्थिरता अब सामान्य होती जा रही हैं। भोजन तो पहले की तरह किया जा रहा है, लेकिन शरीर की कोशिकाएँ आवश्यक पोषण के लिए संघर्ष कर रही हैं। यह एक ऐसा छिपा हुआ कुपोषण है, जिसे न तो आम व्यक्ति समझ पा रहा है और न ही सामान्य चिकित्सकीय जांचों में यह स्पष्ट हो पा रहा है।
स्थिति तब और अधिक चिंताजनक हो जाती है जब यह सामने आता है कि आज फल और सब्जियाँ भी पहले जैसी पोषक नहीं रहीं। आधुनिक खेती में अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों, पेस्टिसाइड और इंसेक्टिसाइड के प्रयोग ने फलों और सब्जियों की पोषण क्षमता को 50 से 70 प्रतिशत तक घटा दिया है। इन रसायनों के अवशेष शरीर में प्रवेश कर लिवर, किडनी और एंडोक्राइन सिस्टम को धीरे-धीरे विषाक्त बना रहे हैं, जिसका प्रभाव दीर्घकालिक और घातक है।
इसी के समानांतर एक और अदृश्य संकट तेजी से उभर रहा है—एंटीबायोटिक का अनियंत्रित उपयोग। आज एक औसत व्यक्ति वर्ष में 12 से 15 बार दवाइयों का सेवन कर रहा है। बार-बार दी जा रही शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाइयाँ शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट कर रही हैं। चिकित्सा विज्ञान इसे एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस या सुपरबग संकट कहता है, जहाँ भविष्य में सामान्य संक्रमणों पर भी दवाइयाँ बेअसर हो जाएँगी।
जब वह समय आएगा, तब डॉक्टरों के पास उपचार के विकल्प सीमित रह जाएंगे और चिकित्सा जगत को अनिवार्य रूप से न्यूट्रीशनल मेडिसिन की ओर लौटना पड़ेगा। किंतु विडंबना यह होगी कि तब तक यह चिकित्सा पद्धति इतनी महंगी हो चुकी होगी कि सामान्य व्यक्ति के लिए इसे अपनाना कठिन हो जाएगा।
आज जो लोग पोषण की उपेक्षा कर रहे हैं, वे कल इसके लिए भारी कीमत चुकाने को विवश होंगे।
सच्चाई यह है कि आज हम भोजन कर रहे हैं, लेकिन पूर्ण आहार नहीं ले रहे। हम स्वाद के लिए खा रहे हैं, स्वास्थ्य के लिए नहीं। हमारी कोशिकाएँ ऊर्जा और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से जूझ रही हैं। शरीर बाहर से भरा हुआ दिखता है, लेकिन भीतर से कमजोर और खोखला होता जा रहा है।
इस भयावह परिदृश्य में समाधान केवल दवाइयों में नहीं, बल्कि पोषण को प्राथमिकता देने, जीवनशैली में अनुशासन लाने और कोशिकीय स्तर पर शरीर को सशक्त करने में निहित है। आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज, चिकित्सक और नीति-निर्धारक आने वाले इस संकट को गंभीरता से समझें और समय रहते ठोस कदम उठाएँ। क्योंकि आने वाला समय केवल इलाज का नहीं, बल्कि पोषण, सजगता और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का समय है।
