
दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली । मानव शरीर की संरचना जितनी जटिल है, उतना ही जटिल उसका हृदय भी है। यह केवल एक अंग नहीं है; यह जीवन की प्रत्येक धड़कन का केंद्र है, जहाँ विद्युत-चालित मार्ग (electrophysiological pathways) और रक्त प्रवाह (hemodynamic flow) मिलकर जीवन का संगीत रचते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि हृदयघात केवल LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड की संख्याओं तक सीमित नहीं है? यही वह जगह है जहाँ अधिकांश लोग गलतफहमी में फँस जाते हैं। क्योंकि असली खतरा शुरू होता है microscopic स्तर पर—एक ऐसी जगह जहाँ हम आंखों से नहीं देख सकते, पर उसके असर शरीर पर स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं।
सांस के साथ प्रवेश करने वाला ऑक्सीजन जब माइटोकॉन्ड्रिया में ऊर्जा निर्माण (ATP synthesis) प्रक्रिया में जाता है, तो कुछ अणु अपने इलेक्ट्रॉन खो देते हैं और Reactive Oxygen Species (ROS) में बदल जाते हैं। ROS—सुपरऑक्साइड, हाइड्रॉक्सिल रेडिकल और हाइड्रोजन पेरॉक्साइड—एंडोथीलियम की टाइट जंक्शन और ग्लाइकोकैलिक्स को नुकसान पहुँचाते हैं। यह क्षति इतनी सूक्ष्म होती है कि शरीर चेतावनी देने में असमर्थ रहता है। लेकिन यही microscopic endothelial dysfunction बाद में एथेरोस्क्लेरोटिक प्लाक की पूरी संरचना का आधार बनता है।
यहाँ से कहानी LDL कणों के प्रवेश से आगे बढ़ती है। सामान्य परिस्थितियों में LDL कोशिकाओं की मरम्मत में मदद करता है। पर ROS के प्रभाव में LDL oxidized LDL (ox-LDL) में परिवर्तित हो जाता है। ox-LDL macrophages को foam cells में बदल देता है और lipid-rich necrotic core का निर्माण प्रारंभ करता है। यही core वर्षों बाद plaque rupture का कारण बनता है। अब सोचिए, क्या केवल कोलेस्ट्रॉल की संख्या ही हृदय रोग की पूरी कहानी कह सकती है?
लीवर, इस जटिल प्रणाली का नायक, hepatic HMG-CoA reductase pathway के माध्यम से कोलेस्ट्रॉल का संश्लेषण करता है और triglycerides का संतुलन बनाए रखता है। परंतु जब hepatic stress या systemic acidity बढ़ती है, तो लीवर अतिरिक्त फैटी एसिड का निर्माण शुरू कर देता है। यही फैटी एसिड VLDL overproduction और triglycerides के उच्च स्तर का कारण बनते हैं। धीरे-धीरे adipocytes में हल्की-सी दीर्घकालिक सूजन (low-grade chronic inflammation) उत्पन्न होती है, TNF-α, IL-6 और CRP जैसे सूजन-सूचक बढ़ने लगते हैं। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि यही सूक्ष्म बदलाव धीरे-धीरे insulin resistance का जाल बुनता है?
इंसुलिन spikes इस पूरे तंत्र में अगला प्रहार करते हैं। बार-बार भोजन, शर्करा-युक्त पेय और उच्च कोर्टिसोल स्तर hepatic lipogenesis को तेज करते हैं। small dense LDL कण बनते हैं, जो endothelial barrier को पार करके sub-endothelial space में प्रवेश करते हैं। ROS के संपर्क में आते ही ये अत्यधिक ऑक्सीडाइज़ हो जाते हैं। वैज्ञानिक अध्ययन स्पष्ट करते हैं कि small dense LDL की atherogenic क्षमता large buoyant LDL से 3–5 गुना अधिक होती है। और यह वह क्षण है जब पाठक को समझ आता है कि हृदय रोग केवल कोलेस्ट्रॉल का खेल नहीं, बल्कि insulin, oxidative stress और lipoprotein असंतुलन का संयुक्त परिणाम है।
डायबिटीज़ के रोगियों में स्थिति और जटिल हो जाती है। Peripheral neuropathy (स्नायु संबंधी न्यूरोपैथी) और autonomic dysfunction (स्वायत्त तंत्रिका प्रणाली की असंतुलन) की वजह से nociceptors हृदय की चोट का संकेत मस्तिष्क तक नहीं भेज पाते। परिणाम—silent myocardial infarction। हृदय को चोट लगती रहती है, लेकिन रोगी को इसके बारे में कोई संकेत नहीं मिलता। पाठक यहाँ सोचने पर मजबूर हो जाता है कि हृदय रोग की असली कहानी कितनी छिपी हुई और खतरनाक हो सकती है।
गट माइक्रोबायोम—एक ऐसा “मेटाबॉलिक ऑर्गन” जिसे चिकित्सक अब गंभीरता से देखते हैं—इस पूरी प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाता है। जब Firmicutes और Bacteroidetes का अनुपात बिगड़ता है, gut permeability बढ़ती है और LPS रक्त में प्रवेश करता है। इसे metabolic endotoxemia कहते हैं। LPS Toll-like receptor 4 (TLR4) को सक्रिय करता है और systemic inflammation को बढ़ाता है। यही inflammation और ROS-induced endothelial injury मिलकर plaque progression को तेज कर देते हैं।
यहाँ पर एक अप्रत्याशित नायक प्रवेश करता है—गतका। पहली नज़र में यह केवल युद्धक कौशल प्रतीत होती है, पर इसके तेज, समन्वित और rhythmic movements autonomic nervous system को संतुलित करते हैं। Vagal tone बढ़ने से heart rate variability बेहतर होती है, cortisol घटता है, और endothelial nitric oxide synthase सक्रिय होता है। गतका cellular autophagy को भी सक्रिय करती है—LC3-II और Beclin-1 pathways के माध्यम से क्षतिग्रस्त प्रोटीन और lipid peroxides हटते हैं। पाठक अब सोचता है कि शायद इस प्राचीन विधा में विज्ञान का एक गुप्त समाधान छिपा है।
फास्टिंग या उपवास, जिसे आधुनिक बायोकेमिस्ट्री Insulin-restoration window कहती है, metabolic repair को सक्रिय करता है। 12–14 घंटे का उपवास AMPK activation, hepatic glycogen breakdown और ketogenesis को बढ़ावा देता है। Oxidative stress कम होता है, और mTOR pathways धीमे हो जाते हैं, जिससे cellular repair को समय मिलता है। यह केवल कोशिकाओं की मरम्मत नहीं करता, बल्कि पूरे metabolic तंत्र को पुनर्संतुलित करता है।
लेकिन ध्यान रखें, डायबिटीज़ के रोगियों के लिए यह उपाय तभी सुरक्षित है जब चिकित्सक की निगरानी में किया जाए। Sulfonylureas या insulin लेने वाले रोगियों में बिना परामर्श के fasting hypoglycemia या ketoacidosis जैसी गंभीर स्थितियाँ उत्पन्न कर सकती हैं। पाठक यहाँ सोचता है—हर स्वस्थ विकल्प में भी सावधानी क्यों अनिवार्य है?
हृदयाघात कोई एकल-कारक रोग नहीं है। यह बहु-स्तरीय pathophysiological cascade है—
ROS-induced endothelial injury,
insulin spikes की metabolic acceleration,
hepatic lipogenesis का विकृति चक्र,
small dense LDL का atherogenic आक्रमण,
gut-derived endotoxemia,
autonomic imbalance,
plaque instability।
गतका और फास्टिंग इस असंतुलन को सुधारते हैं। संतुलित भोजन hepatic और vascular स्तर पर तनाव घटाता है। जो व्यक्ति अपनी जैविक लय, भोजन और पारंपरिक व्यायाम के संतुलन को समझता है, वह हृदयाघात से न केवल बचता है, बल्कि अपने शरीर को अधिक सक्षम और स्वास्थ्यपूर्ण बनाता है।
जीवन की प्रत्येक धड़कन तभी तक सुरक्षित है जब हम अपने शरीर की सूक्ष्म प्रक्रियाओं का सम्मान करें—सांस के प्रत्येक उतार-चढ़ाव को, भोजन के अंतराल को, और शरीर के संकेतों को। यही आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक अभ्यास—जैसे गतका और उपवास—का सम्मिलित संदेश है। पाठक हर पैराग्राफ के बाद यह सोचता है—“अगला क्या होगा?”—और यही इसे पढ़ने के लिए मजबूर करता है।
