
दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ।भारत केवल भौगोलिक नाम नहीं, न ही मात्र एक शासन-प्रणाली; भारत एक जीवंत प्रवहमान राष्ट्रचेतना है—ऐसी चेतना, जिसकी धमनियों में वेदों का घोष, उपनिषदों की गहन तत्त्वमीमांसा और श्रीमद्भगवद्गीता का कर्मयोग युगों से अविरल प्रवाहित होता आया है। यह चेतना ही भारत को सभ्य बनाती है, संस्कृति देती है और इतिहास के प्रत्येक संकटकाल में उसे पुनः खड़ा होने की शक्ति प्रदान करती है। आज जब राष्ट्र अनेक वैचारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है, तब इसी सनातन चेतना को जाग्रत, सुदृढ़ और संगठित बनाए रखना सबसे बड़ा राष्ट्रीय दायित्व बन चुका है। इसी दायित्व-बोध की सशक्त प्रतिध्वनि राजधानी लखनऊ के प्रताप नगर स्थित इन्द्रबस्ती (पूरब भाग) में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी समारोह के अंतर्गत आयोजित विराट हिंदू सम्मेलन में मुखर रूप से सुनाई दी।

यह आयोजन किसी औपचारिक सभा की सीमाओं में बंधा नहीं था, बल्कि वह राष्ट्र-जागरण का विराट उद्घोष था, जो समाज की सुप्त आत्मा को झकझोर कर उसे आत्मबोध, आत्मगौरव और आत्मदायित्व की चेतना से भर देने का सामर्थ्य रखता है। संघ के शताब्दी वर्ष की केंद्रीय अवधारणा—पंच परिवर्तन के माध्यम से सामाजिक नवजागरण के विचार-प्रवाह में ऐसे प्रवाहित हो रही था, मानो वह केवल विचार नहीं, बल्कि आने वाले भारत की कार्ययोजना हो। यह आयोजन इस सत्य को रेखांकित करता प्रतीत हुआ कि संघ का शताब्दी पर्व अतीत की उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि भविष्य के भारत की वैचारिक आधारशिला है।

इस गरिमामय अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत घोष प्रमुख डॉ. नीलकंठ जी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में नंदित श्रीवास्तव, सीनियर अधिवक्ता, उच्च न्यायालय तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रभात अधोलिया भाग संघचालक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं शासकीय अधिवक्ता, उच्च न्यायालय की गरिमामयी उपस्थिति रही। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. मोहित शुक्ला आचार्य—धर्मगुरु एवं ज्योतिषाचार्य—द्वारा किया गया, जिनके कुशल संयोजकत्व में यह सम्मेलन अनुशासन, वैचारिक स्पष्टता और भावनात्मक ऊष्मा के साथ अत्यंत सुव्यवस्थित रूप में संपन्न हुआ।

अपने धर्मपरक और शास्त्रसम्मत व्याख्यान में डॉ. मोहित शुक्ला आचार्य ने कहा कि हिंदू धर्म किसी संकीर्ण पूजा-पद्धति का नाम नहीं, बल्कि एक समग्र जीवन-दर्शन है, जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र—तीनों को संतुलन प्रदान करता है। उन्होंने वेदों, उपनिषदों और गीता के संदर्भों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि सनातन परंपरा का मूल तत्व सह-अस्तित्व, कर्तव्य और करुणा है। उन्होंने कहा कि जब समाज अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों से कटता है, तब वह दिशाहीन हो जाता है। मंदिर, संस्कार, पर्व और परंपराएँ केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता के स्तंभ हैं। हिंदू चेतना का जागरण ही वह आधार है, जिस पर राष्ट्र की आत्मा सुरक्षित रह सकती है।

इसके पश्चात मुख्य वक्ता डॉ. नीलकंठ जी का ओजस्वी संबोधन राष्ट्रनिर्माण की वैचारिक धुरी बनकर उभरा। उन्होंने कहा कि आज का भारत केवल राजनीतिक या आर्थिक चुनौतियों से नहीं, बल्कि सामाजिक विघटन, सांस्कृतिक विस्मृति और नागरिक उदासीनता जैसी गहरी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे संक्रमणकाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रतिपादित पंच प्रण कोई साधारण संकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्र के पुनरुत्थान की पंचसूत्री साधना हैं। ये पंच प्रण—सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य—मिलकर उस भारत का निर्माण करते हैं, जो आत्मनिर्भर भी है और आत्मगौरव से भी परिपूर्ण।
उन्होंने अत्यंत दृढ़ शब्दों में कहा कि सामाजिक समरसता पंच प्रण की आत्मा है। जाति, उपजाति, वर्ग और क्षेत्रीय संकीर्णताओं में विभाजित समाज कभी भी सशक्त राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकता। संघ का उद्देश्य किसी एक वर्ग का उत्थान नहीं, बल्कि संपूर्ण हिंदू समाज को एकात्म भाव से जोड़ना है। समरसता का अर्थ समानता का दिखावा नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान, सहयोग और अपनत्व की वह भावना है, जो समाज को भीतर से मजबूत बनाती है।

कुटुंब प्रबोधन पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि परिवार केवल सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि संस्कारों की प्रथम प्रयोगशाला है। यदि परिवार दुर्बल होगा, तो राष्ट्र की नींव स्वतः कमजोर हो जाएगी। आज की सबसे बड़ी चुनौती पीढ़ियों के बीच संवाद का टूटना है, और पंच प्रण इस संवाद को पुनः जीवित करने का आह्वान करते हैं। परिवार में संस्कार, मर्यादा और दायित्वबोध ही राष्ट्रनिर्माण की पहली सीढ़ी है।
पर्यावरण संरक्षण को उन्होंने कहा प्रकृति का दोहन आत्मघाती है। पंच प्रण हमें उपभोग की अंधी दौड़ से हटाकर संयम, संतुलन और सह-अस्तित्व की ओर ले जाते हैं। स्वदेशी पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि मानसिक स्वतंत्रता का उद्घोष है। जब तक हमारी आवश्यकताएँ और उपभोग पराधीन मानसिकता से संचालित होंगे, तब तक आत्मनिर्भर भारत केवल नारा बना रहेगा।
नागरिक कर्तव्य को पंच प्रण का सबसे व्यापक और निर्णायक आयाम बताते हुए डॉ. नीलकंठ जी ने कहा कि लोकतंत्र अधिकारों से नहीं, कर्तव्यों से जीवित रहता है। अनुशासन, ईमानदारी, परिश्रम और त्याग—यही सच्चे नागरिक का परिचय है। राष्ट्र की रक्षा केवल सीमाओं पर खड़े सैनिक ही नहीं करते, बल्कि ईमानदार शिक्षक, कर्तव्यनिष्ठ चिकित्सक, सजग मतदाता और उत्तरदायी नागरिक भी राष्ट्र के मौन प्रहरी होते हैं। यदि प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य को राष्ट्रधर्म मान ले, तो भारत को कोई शक्ति दुर्बल नहीं कर सकती।
अपने संबोधन के समापन में उन्होंने कहा कि यदि हिंदू समाज पंच प्रण को भाषणों की सीमा से निकालकर अपने आचरण, परिवार, व्यवसाय और सामाजिक जीवन में उतार ले, तो भारत को विश्वगुरु बनने से कोई शक्ति रोक नहीं सकती। संघ का शताब्दी वर्ष इसी संकल्प का स्मरण है—व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण।
कार्यक्रम का आयोजन नगर कार्यवाह अमित अग्रवाल एवं के.सी. शाह के मार्गदर्शन में तथा इन्द्रबस्ती (महावीर शाखा) के समर्पित स्वयंसेवकों द्वारा किया गया।
इस अवसर पर कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह नगर कार्यवाह धर्मेन्द्र मिश्र की विशेष सहभागिता रही। साथ ही राजीव मिश्र, नरेंद्र सिंह देवड़ी, राकेश मिश्र (पार्षद), राजा मिश्र, हनुमंत सिंह, हरेंद्र सिंह,अनूप सिंह, जी.एन. भट्ट, अखंडशुक्ला, योगेश शुक्ला, अवधेश शर्मा सहित बड़ी संख्या में स्वयंसेवक एवं राष्ट्रवादी हिंदू नागरिक उपस्थित रहे। उनकी सक्रिय उपस्थिति और अनुशासित सहभागिता ने इस सम्मेलन को केवल एक वैचारिक सभा नहीं, बल्कि संगठित सामाजिक चेतना का सजीव उदाहरण बना दिया। मंच से लेकर पंक्तियों तक दिखाई दे रहा यह अनुशासन और राष्ट्रभाव इस तथ्य का प्रमाण था कि संघ का विचार केवल भाषणों में नहीं, बल्कि समाज के जमीनी स्तर पर जीवंत रूप से प्रवाहित हो रहा है।
