

राजधानी लखनऊ की सांस्कृतिक धरोहर में एक समय ऐसा भी आया जब नगर के सौंदर्यबोध और प्रकृति-प्रेम को सार्वजनिक उत्सव का रूप देने का साहसिक संकल्प तत्कालीन महापौर डॉ एस सी राय ने लिया।

अपने प्रथम कार्यकाल में उन्होंने जिस पुष्प प्रदर्शनी की परंपरा का श्रीगणेश किया, वह शीघ्र ही नगर की पहचान बन गई। विविधवर्णी पुष्पों की सुवास से आलोकित यह आयोजन केवल एक प्रदर्शनी नहीं, अपितु लखनऊ की राजसी सौंदर्य-संवेदना और सांस्कृतिक परिष्कार का उत्सव था—और यहीं से यह प्रश्न जन्म लेता है कि वह स्वर्णिम परंपरा पुनः कब और कैसे जीवंत होगी।

दीर्घ काल तक यह पुष्पोत्सव नगरवासियों के हृदय में आनंद और अभिरुचि का संचार करता रहा। किंतु वैश्विक महामारी के प्रकोप ने सामाजिक आयोजनों की निरंतरता को बाधित कर दिया। कोविडोत्तर परिस्थितियों में प्रशासनिक एवं सामाजिक सीमाओं के कारण यह भव्य आयोजन 2022 से स्थगित रहा और वर्ष 2025 तक इसकी अनुपस्थिति ने नगर के सांस्कृतिक जीवन में एक रिक्तता उत्पन्न कर दी। प्रकृति और संस्कृति के इस उत्सव का विराम लखनऊ के सौंदर्यबोध पर मानो एक अस्थायी आवरण-सा बन गया—परंतु इतिहास साक्षी है कि लखनऊ की जीवंत आत्मा अधिक समय तक मौन नहीं रह सकती।

इसी सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भावना से वर्ष 2026 में जनकल्याण समिति महानगर विस्तार के सचिव जितेंद्र प्रताप सिंह तथा वर्तमान महापौर सुषमा खर्कवाल के संयुक्त प्रयासों से पुष्प प्रदर्शनी का पुनः शुभारंभ हुआ। यह केवल एक आयोजन का पुनरारंभ नहीं था, बल्कि परंपरा, प्रतिबद्धता और प्रकृति-प्रेम के पुनर्संयोजन का उत्सव था। नगर प्रशासन और सामाजिक संगठनों की समन्वित पहल ने यह सिद्ध कर दिया कि जब संकल्प सशक्त हो, तो विराम भी नवप्रारंभ का माध्यम बन जाता है।

पुनर्जीवित इस पुष्प प्रदर्शनी में राजधानी के नागरिकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता कर उसे जन-उत्सव का स्वरूप प्रदान किया। विविध प्रजातियों के सुसज्जित पुष्पों, आकर्षक उद्यान-सज्जा और रचनात्मक प्रस्तुति ने लखनऊ की राजसी गरिमा को पुनः प्रखर कर दिया। नगरवासियों ने न केवल दर्शक के रूप में, बल्कि प्रकृति-संवर्धन के सहभागी के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

यह आयोजन स्मरण कराता है कि लखनऊ केवल इमारतों और सड़कों का नगर नहीं, बल्कि संवेदनाओं, सौंदर्य और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत प्रतीक है। पुष्प प्रदर्शनी की पुनर्प्रतिष्ठा ने यह प्रमाणित किया कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी विषम क्यों न हों, यदि इच्छाशक्ति और सामूहिक प्रयास सशक्त हों तो परंपराएँ पुनः प्रफुल्लित हो उठती हैं। राजधानी ने एक बार फिर अपने राजसी अंदाज को नवचेतना के साथ अभिव्यक्त किया है—और यही उसकी सांस्कृतिक अमरता का प्रमाण है।

