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15 साल से लंबित याचिका पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार को जवाब के लिए आखिरी दो सप्ताह

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15 साल से लंबित याचिका पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार को जवाब के लिए आखिरी दो सप्ताह

विधानसभा सचिवालय की सेवा नियमावली पर उठे सवालों के बीच राज्य सरकार को काउंटर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश। 29 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित सुनवाई पर निगाहें, प्रमुख सचिव विधानसभा प्रदीप कुमार दुबे की सेवा-स्थिति से जुड़े प्रश्नों की भी हो रही चर्चा।

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय की सेवा नियमावली से संबंधित लगभग 15 वर्षों से लंबित न्यायिक प्रकरण में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार को काउंटर हलफनामा दाखिल करने के लिए अंतिम दो सप्ताह का समय दिया है। 25 सितंबर 2026 के आदेश के अनुसार, न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सरकार को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए इससे अधिक समय नहीं दिया जाएगा। वर्ष 2011 में दाखिल याचिका पर अब 29 अक्टूबर 2026 को सुनवाई प्रस्तावित है। लंबे समय से न्यायिक विचाराधीन इस मामले में अदालत द्वारा समय-सीमा निर्धारित किए जाने से विधानसभा सचिवालय की सेवा नियमावली और उससे संबंधित प्रक्रियाओं पर एक बार फिर ध्यान केंद्रित हुआ है।

यह प्रकरण तेजेंद्र सिंह एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य से संबंधित है। याचिका संख्या रिट-ए 1375/2011 में विधानसभा सचिवालय की सेवा नियमावली में कथित संशोधन तथा उससे जुड़ी प्रक्रिया को चुनौती दिए जाने का विषय सामने आया है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अधिवक्ता को काउंटर हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया और इससे आगे समय न दिए जाने की बात आदेश में दर्ज की गई। अब यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार न्यायालय के समक्ष अपने पक्ष में कौन-से तथ्य, अभिलेख और विधिक प्रावधान प्रस्तुत करती है तथा याचिका में उठाए गए प्रश्नों का किस प्रकार उत्तर देती है।

इस मामले का महत्त्व केवल एक पुरानी सेवा संबंधी याचिका तक सीमित नहीं है। विधानसभा सचिवालय राज्य की विधायी व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण संस्थागत अंग है, इसलिए वहां लागू सेवा नियमों की वैधानिकता, संशोधन की प्रक्रिया और उनके अनुपालन से जुड़े प्रश्न प्रशासनिक पारदर्शिता तथा संस्थागत उत्तरदायित्व के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखे जाते हैं। यदि सेवा नियमावली में संशोधन किया गया था, तो उसकी प्रक्रिया क्या रही? क्या संबंधित निर्णय निर्धारित नियमों और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति के अनुरूप लिए गए? संशोधित प्रावधानों के आधार पर की गई कार्रवाई का विधिक आधार क्या है? इन प्रश्नों पर सरकार का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही प्रकरण के तथ्यात्मक और विधिक पहलुओं का अधिक स्पष्ट आकलन किया जा सकेगा।

इसी व्यापक संदर्भ में विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की सेवा-स्थिति को लेकर भी सार्वजनिक स्तर पर प्रश्न उठाए जाते रहे हैं। उनके परिचय संबंधी उपलब्ध विवरण में जन्मतिथि 15 अप्रैल 1957 दर्ज होने की बात कही गई है। हालांकि, केवल जन्मतिथि के आधार पर उनकी वर्तमान सेवा-स्थिति अथवा पद पर बने रहने की वैधानिकता के संबंध में अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसके लिए लागू सेवा नियमों, निर्धारित सेवानिवृत्ति आयु, संबंधित सेवा अभिलेखों तथा किसी वैध सेवा-विस्तार या अन्य सक्षम आदेश की पुष्टि आवश्यक है। साथ ही, वर्ष 2011 में दाखिल याचिका का प्रदीप कुमार दुबे की वर्तमान सेवा-स्थिति से प्रत्यक्ष संबंध है या नहीं, इसका निर्धारण भी न्यायालय के मूल अभिलेखों और संबंधित आदेशों के परीक्षण के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

अब इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न राज्य सरकार के जवाब और उसके समर्थन में प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेजों का है। लगभग डेढ़ दशक से लंबित मामले में याचिका के मूल आरोपों, संबंधित सेवा नियमावली तथा सरकारी निर्णयों की प्रक्रिया को समझने के लिए अभिलेखीय साक्ष्य निर्णायक महत्त्व रखते हैं। यदि किसी नियम, नियुक्ति अथवा सेवा संबंधी निर्णय की वैधानिकता पर प्रश्न उठाया गया है, तो उसका समाधान अटकलों या आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि संबंधित नियमों, प्रामाणिक दस्तावेजों और न्यायिक परीक्षण से ही संभव है।

अब निगाहें 29 अक्टूबर 2026 की सुनवाई पर हैं। निर्धारित समय-सीमा के भीतर राज्य सरकार अपना काउंटर हलफनामा दाखिल करती है या नहीं और उसमें याचिका में उठाए गए प्रश्नों पर क्या तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं, यह आगे की न्यायिक कार्यवाही के लिहाज से महत्त्वपूर्ण होगा। हालांकि, सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए समय दिए जाने अथवा अंतिम समय-सीमा निर्धारित किए जाने को याचिका में लगाए गए आरोपों की न्यायिक पुष्टि नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार, किसी अधिकारी की नियुक्ति, सेवा-विस्तार अथवा पद पर बने रहने की वैधानिकता पर निष्कर्ष संबंधित नियमों और सक्षम प्राधिकारी के आदेशों के परीक्षण के बाद ही निकाला जा सकता है।

विधानसभा सचिवालय से जुड़े इस प्रकरण में अब अपेक्षा है कि राज्य सरकार न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप अपना पक्ष और आवश्यक अभिलेख प्रस्तुत करे, ताकि लंबे समय से लंबित विवाद के तथ्यों की स्पष्टता सामने आ सके। अंततः इस मामले का महत्त्व केवल एक व्यक्ति की सेवा-स्थिति तक सीमित नहीं, बल्कि सेवा नियमों के अनुपालन, प्रशासनिक निर्णयों की वैधानिकता और सार्वजनिक संस्थानों में उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने की प्रक्रिया से भी जुड़ा है। न्यायिक परीक्षण के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि याचिका में उठाए गए प्रश्नों पर कानून और उपलब्ध साक्ष्य क्या निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं।

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