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भक्तियोग आत्मबोध, अनन्य श्रद्धा और परमात्म-समर्पण का सनातन महाविज्ञान : महामंडलेश्वर स्वामी अनंतानंद सरस्वती

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Dainik India News

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भक्तियोग आत्मबोध, अनन्य श्रद्धा और परमात्म-समर्पण का सनातन महाविज्ञान : महामंडलेश्वर स्वामी अनंतानंद सरस्वती
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दैनिक इंडिया न्यूज़ ,लखनऊ, 25 अक्टूबर। गोमती नगर स्थित अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संस्थान में श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय भक्तियोग पर महामंडलेश्वर स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के आध्यात्मिक प्रवचन ने भक्ति के सनातन स्वरूप, उसके गूढ़ तात्त्विक अधिष्ठान तथा मानव-जीवन के आध्यात्मिक परिष्कार में उसकी रूपांतरणकारी भूमिका को रेखांकित किया। अनंत विभूषित स्वामी अभयानंद सरस्वती जी महाराज के शिष्य महामंडलेश्वर स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित इस आध्यात्मिक अनुष्ठान में श्रद्धा, समर्पण, आत्मानुशासन और लोकमंगल की भारतीय ज्ञानपरंपरा को केंद्र में रखते हुए भक्तियोग की उस चिरंतन अवधारणा का प्रतिपादन किया गया, जो मनुष्य को बाह्य आडंबरों से ऊपर उठाकर अंतःकरण की निर्मलता तथा परमात्मा के प्रति अनन्य निष्ठा की ओर उन्मुख करती है।

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व्यासपीठ पर विराजमान होने से पूर्व राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष तथा संस्कृत भारती के पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के संपर्क प्रमुख जितेन्द्र प्रताप सिंह ने महामंडलेश्वर स्वामी अनंतानंद सरस्वती जी महाराज के साथ अध्यात्म, समकालीन सामाजिक परिदृश्य में संस्कारों के क्षरण तथा श्रीमद्भागवत के सकारात्मक प्रभावों पर सारगर्भित विमर्श किया। इस संवाद में भारतीय संस्कृति के नैतिक अधिष्ठान, आध्यात्मिक चेतना के सामाजिक प्रतिफल और सनातन जीवन-मूल्यों की प्रासंगिकता पर विचार-विनिमय करते हुए जितेन्द्र प्रताप सिंह ने आयोजन को अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं समाजोपयोगी निरूपित किया। उन्होंने इस तथ्य को रेखांकित किया कि जब शास्त्रसम्मत ज्ञान लोकजीवन से तादात्म्य स्थापित करता है, तब वह केवल आध्यात्मिक अनुभूति का माध्यम नहीं रहता, बल्कि सामाजिक समरसता, चारित्रिक दृढ़ता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रभावी संवाहक बन जाता है।

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प्रवचन के उपरांत जितेंद्र प्रताप सिंह ने भक्तियोग के तात्त्विक मर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि भक्ति चित्त की वह परिष्कृत एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष से अनुप्राणित अवस्था है, जिसमें अहंकारजनित पृथकत्व का परिमार्जन होकर संपूर्ण अस्तित्व परम चेतना के प्रति अनन्य अनुरक्ति, अखंड श्रद्धा और निष्काम समर्पण की भावभूमि में प्रतिष्ठित होने लगता है। श्रीमद्भगवद्गीता का द्वादश अध्याय भक्ति को मात्र कर्मकाण्डीय अनुष्ठानों अथवा क्षणिक भावावेग की अभिव्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि अंतःकरण की निर्मलता, आत्मानुशासन और परम तत्त्व के प्रति अविचल निष्ठा की साधना के रूप में प्रतिष्ठापित करता है। भगवान श्रीकृष्ण का भक्तियोग संबंधी उपदेश साधक को यह बोध कराता है कि जब मन भगवदाश्रय में स्थिर होता है, बुद्धि विवेकसम्मत धर्ममार्ग का अनुसरण करती है और कर्म निष्काम लोकसेवा से अनुप्राणित होते हैं, तभी आध्यात्मिकता जीवन की समग्र चेतना में अवतरित होती है।

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जितेंद्र प्रताप सिंह ने आगे कहा कि भक्तियोग का मूल तात्त्विक प्रतिपाद्य अनन्यता, समत्व, अहंकार-विसर्जन और निष्काम कर्म की समन्वित साधना है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा प्रतिपादित “अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च” का संदेश मनुष्य को संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि से मुक्त कर समस्त प्राणिमात्र के प्रति मैत्री, करुणा और सद्भाव की व्यापक चेतना में प्रतिष्ठित करता है। सच्चा भक्त वही है, जो सुख-दुःख, मान-अपमान तथा निंदा-स्तुति के द्वंद्वों में समचित्त रहते हुए अपने आचरण को धर्म, विवेक और लोककल्याण के अनुरूप बनाए रखता है। भक्ति पलायन नहीं, अपितु जीवन के समस्त दायित्वों का आध्यात्मिक परिष्कार है; समर्पण दुर्बलता नहीं, बल्कि अहंकार के अतिक्रमण से अर्जित आंतरिक सामर्थ्य है। जब मनुष्य अपने कर्मों को परमात्मा के प्रति समर्पित कर फलासक्ति का परित्याग करता है, तब उसका सामान्य जीवन भी साधना का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार भक्तियोग आत्मोन्नयन के साथ सामाजिक समरसता, नैतिक उत्तरदायित्व और करुणामय सह-अस्तित्व की प्रतिष्ठा का मार्ग प्रशस्त करता है।

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कार्यक्रम में उपस्थित मुख्य अतिथि सांसद जगदंबिका पाल ने भी श्रीमद्भागवत के कथा-अमृत तथा आध्यात्मिक प्रवचन की महत्ता के प्रति अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति प्रस्तुत करते हुए इस आयोजन में सहभागिता को अपना परम सौभाग्य बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे पावन आध्यात्मिक अवसर पर उपस्थित होने और संत-महात्माओं के सान्निध्य में भारतीय धर्म-दर्शन के शाश्वत संदेश को श्रवण करने का अवसर प्राप्त होना उनके लिए अत्यंत गौरव एवं सौभाग्य का विषय है। श्रीमद्भागवत और श्रीमद्भगवद्गीता की ज्ञानपरंपरा भारतीय समाज को नैतिकता, कर्तव्यबोध, आत्मसंयम तथा लोककल्याण की प्रेरणा प्रदान करती है। संतों की वाणी में निहित आध्यात्मिक अनुभूति और शास्त्रों का जीवनोपयोगी संदेश व्यक्ति को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ समाज में सद्भाव, सेवा और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करने की प्रेरणा देता है। इस प्रकार उन्होंने आयोजन के आध्यात्मिक महत्त्व के प्रति अपनी श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त की।

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कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि सांसद जगदंबिका पाल एवं विशिष्ट अतिथि जितेंद्र प्रताप सिंह द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। प्रवचन प्रारंभ होने से पूर्व जितेंद्र प्रताप सिंह ने व्यासपीठ पूजन कर महामंडलेश्वर स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज को अंगवस्त्र एवं पुष्पहार प्रदान कर सम्मानित किया। इस अवसर पर उन्होंने अपनी नवप्रकाशित पत्रिका ‘अवध संपदा’ सांसद जगदंबिका पाल तथा महामंडलेश्वर अखंडानंद सरस्वती जी महाराज को समर्पित की। जितेंद्र प्रताप सिंह ने महामंडलेश्वर स्वामी अनंतानंद सरस्वती जी महाराज के प्रति हार्दिक आभार एवं कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि महाराज श्री के आध्यात्मिक मार्गदर्शन, शास्त्रसम्मत विवेचन और भक्तियोग के मर्मस्पर्शी प्रतिपादन से श्रद्धालुओं को श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत संदेश को आत्मसात करने की प्रेरणा प्राप्त हुई। उन्होंने महाराज श्री के आध्यात्मिक सान्निध्य, अमूल्य मार्गदर्शन तथा समाज में धर्म, संस्कार और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार हेतु किए जा रहे प्रयासों के प्रति साधुवाद अर्पित करते हुए हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित किया।

इस आध्यात्मिक आयोजन में स्वामी राघवानंद जी, स्वामी अभेदानंद जी, माता सनातन श्रुति जी, ब्रह्मचारी अमृत चैतन्य जी, वेदांत सत्संग आश्रम के अध्यक्ष बी.के. सिंह जी, विनोद सिंह जी (इंस्पेक्टर), अवकाशप्राप्त मेजर ज्ञान प्रकाश सिंह जी, जय भारत रक्षा मंच, काशी प्रांत के उपाध्यक्ष रमेश सिंह, कथा आयोजक अमरंजय सिंह जी उर्फ सोनू सिंह जी तथा मंच संचालक आलोक जी और के.पी. सिंह सहित अनेक संत-महात्मा, धर्मानुरागी, गणमान्य अतिथि एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम ने श्रीमद्भगवद्गीता के भक्तियोग संबंधी उपदेशों के माध्यम से आध्यात्मिक साधना, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक सद्भाव के परस्पर अंतर्संबंध को रेखांकित करते हुए उपस्थित जनसमुदाय को धर्ममय जीवन, आत्मानुशासन और लोकमंगल के पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान की।

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