दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान प्रतिबंधों पर सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती के बाद केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने हलफनामा दाखिल कर मांगी माफी। सरकार ने जानबूझकर न्यायिक आदेश की अवहेलना से किया इनकार, इंटरनेट बंद करने के निर्णय को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए आवश्यक बताया और अवमानना नोटिस वापस लेने की गुहार लगाई।
दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट और सार्वजनिक परिवहन पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी के बाद केंद्र सरकार को अपने कदमों का स्पष्टीकरण देना पड़ा है। 10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन के संदर्भ में प्रतिबंधों पर उठे विवाद के बाद न्यायालय ने 11 अक्टूबर को केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल निगम की अध्यक्ष डी. थारा को कथित अवमानना के संबंध में नोटिस जारी किए थे। न्यायालय ने इससे पहले निर्देश दिया था कि दिल्ली आने-जाने वाली मेट्रो एवं अन्य रेल सेवाओं की आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जाए। इसी प्रकरण में गृह सचिव गोविंद मोहन ने हलफनामे के माध्यम से बिना शर्त माफी मांगते हुए कहा कि न्यायालय के आदेशों का जानबूझकर अथवा सोची-समझी रणनीति के तहत उल्लंघन करने का कोई अभिप्राय नहीं था।
केंद्र सरकार ने अपने बचाव में तर्क दिया कि रायसीना हिल्स के चार किलोमीटर के दायरे में 9 अक्टूबर की रात 10 बजे से 10 अक्टूबर की रात 10 बजे तक केवल मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित की गई थीं; वाई-फाई और ब्रॉडबैंड सेवाएं इस प्रतिबंध के दायरे में नहीं थीं। सरकार के अनुसार, यह निर्णय संभावित अशांति की रोकथाम और सार्वजनिक शांति बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया तथा परिस्थितियों के अनुपात में आवश्यक था। साथ ही, केंद्र ने न्यायालय से अवमानना नोटिस वापस लेने और भविष्य में आवश्यक परिस्थितियों में विधिसम्मत सुरक्षा उपायों के अधीन इंटरनेट निलंबन की अनुमति देने के लिए अपने पूर्व आदेश में संशोधन का अनुरोध किया है। हालांकि, माफी को न्यायालय द्वारा अवमानना स्वीकार कर लेने या प्रकरण समाप्त कर देने के समान नहीं माना जा सकता। अब प्रश्न यह है कि सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर लगाए गए प्रतिबंध न्यायिक निर्देशों और नागरिक स्वतंत्रताओं की कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं।