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अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा: सनातन धर्म और हिंदू चेतना का भव्य महोत्सव

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Dainik India News

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अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा: सनातन धर्म और हिंदू चेतना का भव्य महोत्सव

दैनिक इंडिया न्यूज़,अयोध्या में 500 वर्षों के संघर्ष के बाद भगवान श्रीरामलला की भव्य प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई। यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का प्रतीक बन गया। इस ऐतिहासिक क्षण ने पूरे देश में उल्लास और भक्ति का वातावरण उत्पन्न किया। इस क्षण को जीवंत रखने हेतू विश्व हिन्दु परिषद ने अशोक तिवारी के कुशल सम्पादन मे हिन्दु चेतना पत्रिका विमोचन कर जन जन के हृदय तक भगवान बालक राम को स्थापित करने का महत्ति कार्य किआ।

हिंदू चेतना पत्रिका को सराहना

संस्कृतभारतीन्यास अवधप्रांत के अध्यक्ष, जितेंद्र प्रताप सिंह और संस्कृतभारती क्षेत्र संगठन मंत्री प्रमोद पंडित जी ने हिंदू चेतना पत्रिका की भूरी-भूरी प्रशंसा की। प्रमोद पंडित जी ने इसे 'हिंदू चेतना का अभिनंदन' बताते हुए कहा कि यह पत्रिका सनातन धर्म की जागरूकता को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

सनातन धर्म पर राष्ट्रप्रहरियों का संदेश

श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर देशभर के संतों, महापुरुषों और राष्ट्रप्रहरियों ने हिंदू चेतना पत्रिका के माध्यम से अपने संदेश भेजे। इन संदेशों में हिंदुत्व की महिमा और श्रीराम के महत्व को सरलता एवं प्रमुखता से संदर्भित किया गया। यह पत्रिका सनातन धर्म के आदर्शों को जनमानस तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम बनी है।

अयोध्या में संतों का विराट समागम

भारत के कोने-कोने से 15,000 से अधिक संत अपनी मंडलियों के साथ अयोध्या पहुंचे। अयोध्या का हर मठ, मंदिर, आश्रम, धर्मशाला, होटल और अन्य भवन संतों और श्रद्धालुओं से भरे हुए थे। यहां तक कि अयोध्या के बाहर 35-40 किमी की परिधि तक के क्षेत्र में भी आवास की व्यवस्था करनी पड़ी। इस अवसर पर अशोक तिवारी केन्द्रीय मंत्री,विश्व हिन्दु परिषद ने हिन्दु चेतना की स्वहस्ताक्षरित प्रति जितेन्द्र प्रताप सिंह अध्यक्ष संस्कृतभारतीन्यास को भेंट कर सम्मानित किआ।

हनुमानगढ़ी के पूज्य धर्मदास जी ने कहा, "हमारा जीवन धन्य हो गया, इस जीवन में श्रीराम की प्राण प्रतिष्ठा हमारी आँखों के सामने हो रही है। यह उसी प्रकार है जैसे त्रेतायुग में गुरुवशिष्ठ और विश्वामित्र के समक्ष भगवान श्रीराम का प्राकट्य हुआ था।"

सनातन धर्म के मूल्यों की पुनर्स्थापना

सनातन धर्म पर आज भी अनेक षड्यंत्र किए जा रहे हैं, परंतु यह आयोजन दर्शाता है कि रामराज्य की पुनर्स्थापना के लिए संपूर्ण राष्ट्र को मर्यादाओं का पालन व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर करना होगा।

500 वर्षों के संघर्ष का समापन

1526 में श्रीराम जन्मस्थान के विध्वंस से 22 जनवरी 2024 को प्राण प्रतिष्ठा तक 500 वर्षों का यह संघर्ष अनगिनत महापुरुषों के बलिदान और तपस्या से संभव हुआ। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के इस यज्ञ में अपनी आहुति देने वाले समस्त रामभक्तों को श्रद्धापूर्वक नमन।

तुलसी जाके मुखन ते, धोखेहु निकसत राम। ताके पग की पगतरी मोरे तन को चाम ॥

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