गोमती नगर के बौद्ध शोध संस्थान में श्रीमद्भागवत कथा के मंच से बोले सांसद जगदंबिका पाल, देश की आर्थिक प्रगति का श्रेय मोदी नेतृत्व को दिया


वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल और बदलते अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य के बीच भारत की आर्थिक प्रगति, सनातन संस्कृति की महत्ता और राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका पर लोकसभा सांसद एवं संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के सदस्य जगदंबिका पाल ने अपने विचार रखे। गोमती नगर स्थित बौद्ध शोध संस्थान में अभयानंद सरस्वती के सान्निध्य में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दौरान मंच पर आमंत्रित किए जाने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विकासयात्रा का उल्लेख किया। अपने संबोधन में उन्होंने देश की वैश्विक आर्थिक स्थिति में आए बदलावों को रेखांकित करते हुए अयोध्या में प्रभु श्रीराम के विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा और भगवान केदारनाथ के प्रति अपनी आस्था का भी उल्लेख किया। उनके वक्तव्य में आर्थिक विकास, सांस्कृतिक अस्मिता और आध्यात्मिक चेतना के विविध आयाम एक साथ उभरे।

भारत की आर्थिक प्रगति का उल्लेख करते हुए जगदंबिका पाल ने कहा कि वर्ष 2014 के बाद देश ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति सुदृढ़ की है। भारत सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अप्रैल 2024 के आँकड़ों के अनुसार, नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आधार पर भारत की वैश्विक रैंकिंग 2013-14 के दसवें स्थान से सुधरकर 2023-24 में पाँचवें स्थान पर पहुँची थी। वहीं, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा 5 जून 2026 को जारी अनंतिम अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत आँकी गई। ये आँकड़े अर्थव्यवस्था के विस्तार को दर्शाते हैं, जबकि वैश्विक रैंकिंग संबंधित वर्ष, विनिमय दरों और संशोधित अनुमानों के अनुसार बदल सकती है। इसी आर्थिक परिप्रेक्ष्य में सांसद ने केंद्र सरकार के नेतृत्व की सराहना की।

आर्थिक उपलब्धियों के साथ उन्होंने सनातन परंपरा और आध्यात्मिक चेतना को भारत की सांस्कृतिक पहचान का महत्त्वपूर्ण आधार बताया। अयोध्या में प्रभु श्रीराम के विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा और भगवान केदारनाथ की महिमा का उल्लेख करते हुए उन्होंने अपनी धार्मिक आस्था व्यक्त की। उनके दृष्टिकोण में आर्थिक विकास और सांस्कृतिक गौरव राष्ट्रजीवन के ऐसे आयाम हैं, जिन्हें साथ लेकर आगे बढ़ना आवश्यक है। उन्होंने भारत की विकासयात्रा को उसकी सभ्यतागत विरासत और आध्यात्मिक परंपराओं के व्यापक संदर्भ में देखने पर बल दिया। इस प्रकार उनका संबोधन आर्थिक उपलब्धियों के साथ सांस्कृतिक चेतना के महत्त्व पर भी केंद्रित रहा।

अपने संसदीय दायित्वों का उल्लेख करते हुए जगदंबिका पाल ने कहा कि वह सामान्यतः प्रत्येक शनिवार और रविवार को अपने संसदीय क्षेत्र में रहकर जनता की समस्याएँ सुनते हैं। उस दिन अपने क्षेत्र में उपस्थित नहीं हो पाने की कसक व्यक्त करते हुए उन्होंने श्रीमद्भागवत कथा में सम्मिलित होने को सौभाग्य बताया। उन्होंने गीता के उपदेशों का श्रवण करने को आध्यात्मिक अनुभूति से जोड़ते हुए ईश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। उनके वक्तव्य में जनप्रतिनिधि के रूप में जनता के प्रति उत्तरदायित्व और व्यक्तिगत आध्यात्मिक आस्था का समन्वय दिखाई दिया।
उन्होंने कठिन परिस्थितियों में ईश्वर के प्रति विश्वास को मनुष्य का संबल बताते हुए आध्यात्मिक चेतना की महत्ता पर भी बल दिया। उनके अनुसार, आस्था व्यक्ति को धैर्य, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देती है। भारतीय परंपरा में धर्म और अध्यात्म की भूमिका का उल्लेख करते हुए उन्होंने उस विश्वास को रेखांकित किया, जो विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य को आशावान बने रहने की प्रेरणा प्रदान करता है। कथा के आध्यात्मिक वातावरण में उनके इन विचारों ने संबोधन को धार्मिक अनुभूति और व्यक्तिगत विश्वास का आयाम दिया।
संबोधन के दौरान जगदंबिका पाल ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से संबंधित एक राजनीतिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन पर कटाक्ष भी किया। उनके कथनानुसार, राहुल गांधी ने उनसे अपनी बात सुनने के लिए कहा था। इस पर पाल ने जवाब दिया कि यदि राहुल गांधी ने उनकी बात सुनी होती, तो आज वह विपक्ष में बैठने के बजाय सत्ता पक्ष में होते। इस टिप्पणी के माध्यम से उन्होंने राजनीतिक अनुभव और नेतृत्व की समझ पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। इस प्रसंग की स्वतंत्र पुष्टि के लिए मूल रिकॉर्डिंग अथवा संबंधित पक्षों का अधिकृत विवरण आवश्यक होगा।
समग्र रूप से गोमती नगर स्थित बौद्ध शोध संस्थान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के मंच से जगदंबिका पाल ने भारत की आर्थिक प्रगति, केंद्र सरकार के नेतृत्व, सनातन संस्कृति, जनसेवा और समकालीन राजनीति के विविध पक्षों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उनके संबोधन में आर्थिक उपलब्धियों के तथ्यात्मक संदर्भ के साथ आध्यात्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्त्व भी प्रमुखता से सामने आया। कथा के इस आयोजन में उनका वक्तव्य विकास और परंपरा को लेकर उनके राजनीतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति के रूप में सामने आया।