हरिंद्र कुमार सिंह दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली। जो शाश्वत है वह सनातन है। सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, आकाश, सागर, पर्वत, ठोस, द्रव, गैस, विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त प्राणतत्त्व से लेकर अणु-अणु आदि सब शाश्वत तत्त्व हैं। अतः जो कृत्रिमता से मुक्त रहकर प्रकृति के इन शाश्वत मूल सूर्य, चंद्र, आकाश, ब्रह्माण्ड के अणु-अणु के प्रति समर्पित जीवन जीता है वह सनातनी कहलाता है और जिसमें सनातन को भेदने की सामर्थ्य है वह संत कहा जाता है। अर्थात जिसने सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, आकाश, सागर, पर्वत, ठोस, द्रव, गैस, आदि तत्त्वों को भेदने की सामर्थ्य अर्जित कर ली है, वह संत कहलाता है। इस प्रकृति व ब्रह्माण्ड के अणु-अणु में प्रवाहित सविता शक्ति, दिव्य चेतन प्राण प्रवाह एवं जीवनी शक्ति को आकर्षित करने, धारण करने का मंत्र है गायत्री।
जीवन को समुचित विधि से संचालित करने के लिए मानव सहित हर प्राणी, वृक्ष-वनस्पतियों को कम ज्यादा मात्रा में जिन शाश्वत व सनातन तत्त्वों की आवश्यकता है उनमें हैं शारीरिक सक्रियता, सजीवता, प्रफुल्लता, स्फूर्ति, रूप-लावण्य, निरोगता, परिपुष्टता, जीवनीशक्ति, उर्वरता, स्मरणशक्ति, सूझ-बूझ, कुशाग्रता, बुद्धिमत्ता, तुलनात्मक निर्णय की क्षमता, एकाग्रता, मनस्विता, तेजस्विता, प्रतिभा जैसी मानसिक विभूतियाँ तथा शौर्य, साहस, अभय एवं सन्मार्ग पर निरंतर चलते रहने वाला पुरुषार्थ, अहर्निशता, सहृदयता, करुणा, कर्तव्यनिष्ठा, संयमशीलता, सहनशीलता, श्रद्धा, सद्भावना आदि हैं। जीवन के विकास के लिए ये सभी गुणों को वैज्ञानिक प्राण शक्ति की उपलब्धियों के रूप में आँकते हैं। यह प्राण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सहज प्रवाहित है। पर इसका मूल केंद्रक है सूर्य। दूसरी दृष्टि से कहें तो इस सूर्य को भी जहाँ से ऊर्जा मिलती है, उसे सविता स्रोत कहते हैं।
गायत्री मंत्र जप साधना से साधक इसी सविता तत्त्व तक पहुँच बनाने में सफल होता है। गायत्री मंत्र उपासना से जीवन में प्राणचेतना व जीवनशक्ति आकर्षित करके साधक इन्हीं तत्त्वों को आकर्षित एवं धारण करने का अभ्यास करते हैं। विश्व ब्रह्माण्ड में फैला यही प्राण तत्त्व हमारे अंदर जीवनी शक्ति रूप में स्थापित है। वैज्ञानिक इसे ईथर तत्त्व कहते हैं, आध्यात्म-विज्ञानी साधक, संत, ऋषिगण इसे ऋत व सविता नाम से संबोधित करते हैं। यह ऋत व सविता तत्त्व शाश्वत है, कभी न समाप्त होने वाली सनातन चेतना है। यह सूर्य से लेकर कण-कण को, मनुष्य से लेकर सम्पूर्ण प्राणी जगत को प्राण शक्ति व सम्पूर्ण जीवनी शक्ति देता है। वृक्ष वनस्पतियों को उत्सर्जन-पोषण की सम्पूर्ण शक्ति इसी से मिलती है। यही सूर्य की चेतन शक्ति है। इस दिव्य प्राण शक्ति, ऋत व सविता शक्ति के संदोहन की विधि है गायत्री व गायत्री मंत्र। इसे सामान्यतः सूर्य व सविता का मंत्र भी कहते हैं। ऋग्वेद अनुसार गायत्री मंत्र के रचयिता ऋषि विश्वामित्र हैं और इस मंत्र का देवता सविता है। अग्नि पिण्ड स्वरूपी सूर्य की सूक्ष्म सत्ता सविता ही तो है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जीवनी शक्ति रूप में फैली है और यही महाप्राण शक्ति भी है।
गायत्री मंत्र जप द्वारा सूर्य की चेतन शक्ति सविता से जुड़कर साधक महाप्राण को धारण करते हैं। गायत्री मंत्र की साधना प्राण धारण करने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली बनाती है। ऋषि याज्ञवल्क्य कहते हैं—
“गायत्रं त्रायते इति वा गायत्री प्रोच्यते तस्मात् गायन्तं त्रायते यतः॥”
अर्थात प्राणों का त्राण, परिष्करण, शोधन, संरक्षण करने वाली शक्तिधारा के कारण इसे गायत्री शक्ति कहा जाता है। गायत्री उपासना वास्तव में प्राण शक्ति, जीवनी शक्ति को परिष्कृत व प्रखर बनाने की ही साधना है। गायत्री साधकों ने अनुभूतियों के आधार पर बताया है कि यह मानव जगत के प्राणों की प्रत्यक्ष रक्षा करने वाली प्रयोग शक्ति है। गायत्री के 24 अक्षर का जब साधक उपासनात्मक प्रयोग करता है, तो शरीर के अंदर से दिव्य स्तर की ऊर्जा जनरेट होती है और वह सूर्यतत्त्व के पीछे कार्य करने वाली सविता स्रोत से कनेक्ट हो उठती है। इस प्रकार साधक अनन्तकाल से प्रवाहित शाश्वत सविता स्रोत से वैसी ही प्राणधारा आकर्षित होकर साधक का हर विधि से संरक्षण करने लगती है। इसीलिए यह गायत्री है, गायत्री माता है—गयाः प्राणा उच्यन्ते, गया प्राणान् त्रायते सा गायत्री। यहाँ गय का आशय प्राण से है।
देवर्षि नारद भी इसे प्राणों के परिष्कार एवं संवर्धन करने वाली शक्ति बताते हैं:—
“गायतस्त्रायसे देवि तद्गायत्रीति गद्यसे। गयः प्राण इति प्रोक्तस्तत्स्य त्राणादपीति वा॥”
इसीलिए प्राणि जगत की सक्रियता का सारा श्रेय प्राणशक्ति की दात्री गायत्री को जाता है। गायत्री ही विश्व ब्रह्माण्ड व्यापी दिव्य चेतन शक्ति है। यही विश्व माता है, वेदमाता है, देवमाता है। यही माँ जगदम्बा, दुर्गा, भवानी, पार्वती, सीता, सविता, ऋत भी है। गायत्री ऐसी शक्ति है, जो ब्रह्माण्ड के हर तत्त्व में मातृचेतना रूप में विराजित है। यह एक छोटे से बीज से लेकर ब्रह्माण्ड के मूल तक में विराजमान होकर प्रतिपल नवीनता जगाती है और पौधे को विकसित वही शक्ति करती है। श्री वेदव्यास जी को यह मातृ शक्ति 24 प्रकार की चेतन धाराओं में अनुभव होती हैं। पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी ने इसी को त्रिपदा शक्ति से ओतप्रोत 24 आयामों वाली गायत्री शक्ति कहा है। यही सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड में प्रवाहित दैवीय चेतन शक्ति-धारा है।