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एक करोड़ के चेक' का रहस्य अब अदालत के कटघरे में

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Dainik India News

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एक करोड़ के चेक' का रहस्य अब अदालत के कटघरे में


सीजेएम कोर्ट पहुंची याचिका में अधिवक्ता और तत्कालीन कोतवाल पर गंभीर आरोप; आर्थिक लेन-देन से लेकर कथित अवैध हिरासत तक उठे कई सवाल

 दैनिक इंडिया न्यूज़,सुलतानपुर। क्या एक साधारण कानूनी परामर्श का विवाद कथित रूप से सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र में बदल गया? क्या एक हस्ताक्षरयुक्त खाली चेक का कथित दुरुपयोग कर किसी नागरिक को परक्राम्य लिखत अधिनियम के मुकदमे में फंसाया गया? क्या पुलिस कार्रवाई विधिक प्रक्रिया के अनुरूप थी या नागरिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ? ऐसे अनेक गंभीर प्रश्न अब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) सुलतानपुर की अदालत के समक्ष विचाराधीन हैं।

थाना बल्दीराय क्षेत्र के ग्राम पूरे कन्धई शुक्ल निवासी सन्तराम शुक्ला ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के अंतर्गत मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर अधिवक्ता अब्बास अहमद तथा कोतवाली नगर के तत्कालीन प्रभारी निरीक्षक राम आशीष उपाध्याय पर गंभीर आरोप लगाए हैं। याचिकाकर्ता ने न्यायालय से प्राथमिकी दर्ज कराने, निष्पक्ष विवेचना कराने तथा पूरे प्रकरण की विधिसम्मत जांच कराने की मांग की है।

विवाद की शुरुआत कानूनी सलाह से, आरोप पहुंचे आपराधिक षड्यंत्र तक

याचिका के अनुसार, सन्तराम शुक्ला अपनी पार्टनरशिप डीड और पावर ऑफ अटॉर्नी से जुड़े दस्तावेजों पर कानूनी सलाह लेने के लिए अधिवक्ता के संपर्क में आए थे। आरोप है कि इस दौरान उनसे लगभग 30 हजार रुपये लिए गए, किंतु अपेक्षित कार्य पूरा नहीं हुआ। जब उन्होंने धनराशि और अभिलेख वापस मांगे तो कथित रूप से विवाद उत्पन्न हो गया। याचिका में कहा गया है कि यहीं से घटनाओं की एक ऐसी श्रृंखला शुरू हुई, जिसने अंततः न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की नौबत पैदा कर दी।

1.50 लाख रुपये लौटाने के बाद भी विवाद समाप्त नहीं हुआ—याचिका

प्रार्थना पत्र के अनुसार, बाद में याचिकाकर्ता की पुत्री प्रियांशी शुक्ला के बैंक खाते में 1.50 लाख रुपये आरटीजीएस के माध्यम से भेजे गए। इसके बाद धनराशि वापस न करने का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत की गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि पुलिस के दबाव में मई 2023 में पूरी राशि लौटा दी गई, लेकिन इसके बावजूद उनके विरुद्ध कार्रवाई जारी रही।

तीन दिन की कथित अवैध हिरासत का आरोप

याचिका में दावा किया गया है कि जून 2023 में उन्हें लखनऊ से लाकर कोतवाली नगर में तीन दिनों तक कथित रूप से अवैध हिरासत में रखा गया। इस दौरान हथकड़ी और बेड़ियां लगाकर शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना दिए जाने का भी आरोप लगाया गया है। यदि जांच में ऐसे आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह केवल पुलिस आचरण का प्रश्न नहीं होगा, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विधिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों से भी जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय होगा।

सबसे गंभीर आरोप—'एक करोड़ के खाली चेक' का कथित दुरुपयोग

पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु वह आरोप है, जिसमें याचिकाकर्ता ने कहा है कि 1 जुलाई 2023 को उनके पर्स से केनरा बैंक का हस्ताक्षरयुक्त खाली चेक कथित रूप से निकाल लिया गया। आरोप है कि बाद में उसी चेक पर ₹1,00,00,000 (एक करोड़ रुपये) की राशि अंकित कर उसे बैंक में प्रस्तुत किया गया और चेक अनादृत होने के बाद परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 के अंतर्गत उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराया गया। याचिकाकर्ता ने इसे सुनियोजित षड्यंत्र और न्यायिक प्रक्रिया के कथित दुरुपयोग का मामला बताया है।

पुलिस से लेकर एसपी कार्यालय तक शिकायत, फिर अदालत की शरण

याचिकाकर्ता का कहना है कि उन्होंने पूरे घटनाक्रम की शिकायत स्थानीय पुलिस एवं पुलिस अधीक्षक, सुलतानपुर को भी भेजी, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने BNSS की धारा 173(4) के अंतर्गत न्यायालय में प्रार्थना पत्र दाखिल कर संबंधित थाना प्रभारी को एफआईआर दर्ज करने और विधिसम्मत विवेचना कराने का आदेश देने की मांग की।

अब अदालत के निर्णय पर टिकी हैं निगाहें

यह मामला फिलहाल न्यायालय के विचाराधीन है। यदि न्यायालय प्रथम दृष्टया आरोपों को जांच योग्य मानते हुए एफआईआर दर्ज करने का आदेश देता है, तो पूरे प्रकरण की निष्पक्ष विवेचना होगी और उसी के आधार पर आरोपों की सत्यता अथवा असत्यता स्पष्ट हो सकेगी। वर्तमान समय में न्यायालय ने आरोपों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है और संबंधित आरोपियों का पक्ष सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

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