राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप बाल-केंद्रित और अनुभवात्मक शिक्षा पर जोर, दो दिवसीय कार्यशाला में रंगमंच, अभिनय, संगीत और बाल साहित्य के माध्यम से कहानी को शिक्षण से जोड़ने का व्यावहारिक प्रशिक्षण

दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।बच्चों के लिए शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रहे, बल्कि उनकी कल्पनाशक्ति, संवेदनशीलता और रचनात्मकता को विकसित करने का माध्यम बने—इसी उद्देश्य से मंडलीय शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET), मोती बाग में 8 और 9 अक्टूबर को डी.एल.एड. प्रथम वर्ष के प्रशिक्षुओं के लिए कहानी-कथन शिक्षाशास्त्र पर दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की बाल-केंद्रित, गतिविधि-आधारित और अनुभवात्मक शिक्षण की परिकल्पना के अनुरूप आयोजित इस कार्यशाला में भावी शिक्षकों को कहानी के माध्यम से कक्षा-कक्ष के वातावरण को अधिक संवादपरक, रोचक और प्रभावी बनाने की तकनीकों से परिचित कराया गया।
कार्यशाला का प्रमुख उद्देश्य यह समझ विकसित करना था कि कहानी केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बच्चों की भाषा, अभिव्यक्ति, कल्पनाशक्ति और सीखने की क्षमता को विकसित करने का प्रभावी शैक्षिक माध्यम भी है। इस प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप देने के लिए रंगमंच, अभिनय और बाल साहित्य के विशेषज्ञ गौरव ग्रोवर, डॉ. अनामिका सागर तथा सुश्री भारती ने प्रशिक्षुओं का मार्गदर्शन किया। विशेषज्ञों ने अलग-अलग विधाओं के माध्यम से स्पष्ट किया कि कहानी की प्रभावशीलता केवल उसके कथानक में नहीं, बल्कि उसे प्रस्तुत करने वाले शिक्षक की अभिव्यक्ति, संवाद-कौशल और बच्चों से जुड़ने की क्षमता में भी निहित होती है।
रंगमंच एवं अभिनय विशेषज्ञ गौरव ग्रोवर ने प्रभावशाली संवाद और प्रस्तुति की बारीकियों से परिचित कराते हुए बताया कि शिक्षक के हाव-भाव, आवाज के उतार-चढ़ाव और संवाद की सहजता कहानी को बच्चों के लिए अधिक आकर्षक बना सकती है। वहीं, डॉ. अनामिका सागर ने रंगमंच, संगीत और शारीरिक अभिव्यक्ति के समन्वय से कहानी को जीवंत बनाने की तकनीकों पर प्रकाश डाला। बाल साहित्य विशेषज्ञ सुश्री भारती ने कहानी-लेखन, बाल साहित्य और भाषा-विकास के पारस्परिक संबंधों को रेखांकित किया। इन सत्रों ने प्रशिक्षुओं के सामने यह दृष्टि रखी कि कहानी-कथन की सार्थकता तभी बढ़ती है, जब वह बच्चों की आयु, अनुभव और समझ के अनुरूप हो।
संस्थान की प्राचार्या डॉ. सुमन नेहरा ने विशेषज्ञों का स्वागत करते हुए कहानी को बच्चों की सीखने की प्रक्रिया का सहज, आनंददायक और प्रभावी माध्यम बताया। उन्होंने भावी शिक्षकों को प्रेरित किया कि वे केवल कहानी के चयन तक सीमित न रहें, बल्कि उसकी प्रस्तुति और कक्षा में उसके शैक्षिक उपयोग पर भी विशेष ध्यान दें। उनके अनुसार, कहानी का प्रभाव तभी व्यापक होता है, जब वह बच्चों की रुचि जाग्रत करने के साथ उन्हें विषयवस्तु से आत्मीय रूप से जोड़ने में सफल हो।
कार्यशाला के समन्वयक एवं संस्थान के सहायक आचार्य डॉ. प्रदीप कुमार पाण्डेय ने कहानी के जीवनगत और शैक्षिक महत्त्व पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कहानियाँ हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। शिक्षक जब उचित हाव-भाव, आवाज के उतार-चढ़ाव और संवेदनशील अभिव्यक्ति के साथ कहानी सुनाता है, तो वह बच्चों के लिए अधिक जीवंत और प्रभावशाली बन जाती है। उन्होंने प्रशिक्षुओं को बच्चों के अनुभवों और कल्पनाशक्ति से जुड़कर कहानी को शिक्षण का अभिन्न अंग बनाने के लिए प्रेरित किया।
कार्यशाला में सैद्धांतिक समझ के साथ व्यावहारिक अभ्यास पर भी विशेष बल दिया गया। प्रशिक्षुओं को समूहों में विभाजित कर विभिन्न गतिविधियाँ कराई गईं, जिसके बाद उन्होंने मंच पर सामूहिक प्रस्तुतियाँ दीं। इन अभ्यासों के माध्यम से उन्हें रचनात्मक अभिव्यक्ति, संवाद-कौशल, सामूहिक सहभागिता और कक्षा में कहानी-कथन के व्यावहारिक उपयोग का अनुभव प्राप्त हुआ। इस प्रकार कार्यशाला ने भावी शिक्षकों को यह समझने का अवसर दिया कि प्रभावी अध्यापन के लिए विषय-ज्ञान के साथ प्रस्तुति-कौशल और बाल-मनोविज्ञान की समझ भी आवश्यक है।
कार्यशाला का आयोजन, संचालन और समन्वयन डॉ. प्रदीप कुमार पाण्डेय ने किया। इस अवसर पर संस्थान के संकाय सदस्य खुशबू सैनी, नीरजा गुप्ता, अरुण कुमार, नीता वर्मा, सुशीला राणा और सुनीता यादव सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे।