2016 से शुरू हुई विवादित भर्तियों पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल, उच्च न्यायालय तक पहुंचा था मामला; नियुक्तियों के विज्ञापनों, चयन सूचियों और वास्तविक पदों का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग
दैनिक इंडिया न्यूज़, दिल्ली।मेडिकल कॉलेजों में भर्ती की कथित अनियमितताओं को लेकर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार से सवाल पूछे हैं। लेकिन इसी के साथ एक दूसरा सवाल भी सार्वजनिक विमर्श में उठना स्वाभाविक है—यदि सरकारी संस्थानों में नियुक्तियों की पारदर्शिता और योग्यता से कोई समझौता स्वीकार्य नहीं है, तो उत्तर प्रदेश विधानसभा और विधान परिषद सचिवालयों में हुई भर्तियों की भी उसी कसौटी पर समीक्षा क्यों न हो? खासकर तब, जब इन सचिवालयों की नियुक्तियों को लेकर पहले भी न्यायालय में आपत्तियां उठ चुकी हैं। सवाल किसी दल को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि भर्ती की निष्पक्षता का सिद्धांत सभी संस्थानों और सभी राजनीतिक कार्यकालों पर समान रूप से लागू हो।
वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय के 47 समीक्षा अधिकारी और 60 सहायक समीक्षा अधिकारी—कुल 107 पदों की भर्ती प्रक्रिया विवादों में आई थी। मई 2017 में प्रकाशित समाचारों के अनुसार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अभ्यर्थियों की याचिका पर सुनवाई के बाद विधानसभा के प्रमुख सचिव को आरोपों की जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ताओं ने चयन प्रक्रिया, न्यूनतम आयु, आरक्षण नियमों तथा अंतिम चयन सूची में नाम न होने के बावजूद नियुक्ति दिए जाने जैसे मुद्दे उठाए थे। ये आरोप थे, जिन्हें न्यायिक रूप से सिद्ध अनियमितता मानना उचित नहीं होगा; लेकिन उनका न्यायालय तक पहुंचना ही निष्पक्ष परीक्षण की आवश्यकता रेखांकित करता है।
मामला केवल 2016 की भर्ती तक सीमित नहीं रहा। सितंबर 2023 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में विधानसभा और विधान परिषद सचिवालयों की बाद की भर्तियों पर उठे सवालों का भी उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, 2020–21 में विधानसभा सचिवालय में समीक्षा अधिकारी और सहायक समीक्षा अधिकारी सहित 90 पदों की भर्ती हुई थी, जबकि 2022–23 की नियुक्तियों को लेकर भी विवाद सामने आए। विधान परिषद सचिवालय की नियुक्तियों के संदर्भ में उच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई जांच के आदेश दिए जाने की खबर भी प्रकाशित हुई थी। इन अलग-अलग मामलों की कानूनी स्थिति और जांच के निष्कर्षों को अलग-अलग देखना आवश्यक है; फिर भी उपलब्ध घटनाक्रम एक व्यापक, अभिलेख-आधारित समीक्षा की जरूरत पर प्रश्न खड़ा करता है।
ऐसे में अखिलेश यादव सहित समूचे विपक्ष से यह पूछना अनुचित नहीं होगा कि क्या विधानसभा और विधान परिषद सचिवालयों की नियुक्तियों की पारदर्शिता भी उनके सार्वजनिक एजेंडे का हिस्सा है? यदि मेडिकल कॉलेजों की भर्ती में कथित अनियमितताओं पर जांच और जवाबदेही की मांग की जा रही है, तो विधायी संस्थाओं में नियुक्तियों के संबंध में भी समान मानदंड अपनाने की मांग क्यों न हो? यह सवाल केवल समाजवादी पार्टी तक सीमित नहीं है। भाजपा, सपा, कांग्रेस और अन्य दलों के प्रतिनिधियों को भी अपने-अपने कार्यकाल से जुड़े आरोपों पर तथ्यपरक स्थिति स्पष्ट करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिन पदों के लिए विज्ञापन जारी हुए, क्या नियुक्तियां उन्हीं स्वीकृत पदों के अनुरूप हुईं? क्या चयनित अभ्यर्थियों की अंतिम सूची और वास्तविक नियुक्तियों का पूरा मिलान किया गया? क्या प्रतीक्षा सूची से नियुक्तियां निर्धारित नियमों के अनुसार हुईं? क्या आरक्षण, आयु-सीमा, शैक्षणिक योग्यता और चयन प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया गया? और यदि विज्ञापित पदों की संख्या से अधिक नियुक्तियां किए जाने की कोई शिकायत है, तो क्या उसके समर्थन में प्रमाण उपलब्ध हैं? इन प्रश्नों का उत्तर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि मूल विज्ञापनों, स्वीकृत पदों, चयन सूचियों, नियुक्ति आदेशों और संबंधित सेवा-नियमों की जांच से ही मिल सकता है।
इसलिए आवश्यकता है कि विधानसभा और विधान परिषद सचिवालयों में वर्ष 2016 से अब तक हुई नियुक्तियों का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ऑडिट कराया जाए। जांच में विज्ञापित पदों, वास्तविक नियुक्तियों, प्रतीक्षा सूची, चयन प्रक्रिया, आरक्षण प्रावधानों, नियुक्ति आदेशों और वित्तीय स्वीकृतियों का तुलनात्मक परीक्षण हो। जहां अनियमितता के प्रमाण मिलें, वहां संबंधित व्यक्तियों और निर्णय लेने वाले अधिकारियों की भूमिका का विधिसम्मत परीक्षण किया जाए। जांच का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति को पहले से दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी निर्धारित करना होना चाहिए।
विधानमंडल लोकतंत्र की जवाबदेही का महत्वपूर्ण केंद्र है। इसलिए उसके सचिवालयों में नियुक्तियों को लेकर उठने वाले सवालों का उत्तर भी पारदर्शी प्रक्रिया से मिलना चाहिए। मेडिकल कॉलेजों की भर्ती हो या विधानसभा सचिवालय की नियुक्तियां—नियमों की कसौटी सबके लिए समान होनी चाहिए। न दूध का दूध, पानी का पानी करने वाली जांच से किसी को बचाया जाए, न बिना प्रमाण किसी को दोषी ठहराया जाए। जनता के सामने तथ्य आएं, अभिलेखों की निष्पक्ष पड़ताल हो और जहां दोष प्रमाणित हों, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। यही संस्थागत पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की वास्तविक कसौटी है।