दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ।राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष एवं संस्कृत भारती के पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र प्रमुख जितेंद्र प्रताप सिंह ने महानवमी, मां दुर्गा के विसर्जन और विजयदशमी की पूर्व संध्या पर राष्ट्रवासियों को दीं शुभकामनाएं। बोले—भारतीय संस्कृति का वैशिष्ट्य है कि यहां शक्ति की उपासना और नारायण की आराधना, दोनों से जीवन को धर्म, मर्यादा, करुणा, कर्तव्य और सामाजिक समन्वय की प्रेरणा प्राप्त होती है।
शारदीय नवरात्र की आध्यात्मिक पूर्णता और विजयदशमी के पावन आगमन के मध्य राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष एवं संस्कृत भारती के पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र प्रमुख जितेंद्र प्रताप सिंह ने समस्त राष्ट्रवासियों को महानवमी, मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन तथा विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित कीं। मीडिया के माध्यम से अपने आध्यात्मिक एवं सामाजिक संदेश में उन्होंने भारतीय सनातन परंपरा की उस दिव्य चेतना को रेखांकित किया, जिसमें शक्ति की आराधना केवल उपासना का विधान नहीं, बल्कि आत्मबल, नारी-सम्मान, कर्तव्यनिष्ठा और समाज के कल्याण का संकल्प भी है। उन्होंने कहा कि भारतभूमि में जन्म लेकर ऐसी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत का अंग होना गौरव का विषय है, जहां मां दुर्गा की भक्ति और भगवान श्रीराम की मर्यादा, दोनों जीवन को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
जितेंद्र प्रताप सिंह ने नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना के आध्यात्मिक मर्म को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह पर्व मनुष्य को अपनी अंतर्निहित शक्तियों के जागरण, विकारों के परिष्कार और सद्गुणों के संवर्धन की प्रेरणा देता है। मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूप साहस, संयम, करुणा, ज्ञान, धैर्य और दुष्प्रवृत्तियों के प्रतिरोध का संदेश देते हैं। देवी की आराधना तभी सार्थक है, जब उसका प्रभाव व्यक्ति के आचरण में दिखाई दे, परिवार में परस्पर सम्मान बढ़े और समाज में दुर्बल, वंचित तथा असहाय व्यक्तियों के प्रति संवेदनशीलता विकसित हो। उनके अनुसार, वास्तविक धार्मिकता केवल अनुष्ठानों की पूर्णता में नहीं, बल्कि जीवन में मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा में निहित है।
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के चरित्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि श्रीराम का जीवन भारतीय संस्कृति में आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति, आदर्श शासक और लोककल्याण के प्रति समर्पित व्यक्तित्व की प्रेरक प्रतिमूर्ति है। उनका जीवन यह सिखाता है कि शक्ति का सर्वोच्च उद्देश्य किसी पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा, न्याय की प्रतिष्ठा और समाज में विश्वास का संवर्धन करना है। श्रीराम ने विपरीत परिस्थितियों में भी मर्यादा, धैर्य, सत्यनिष्ठा और कर्तव्य का परित्याग नहीं किया। विजयदशमी पर रावण-दहन की परंपरा का वास्तविक संदेश भी यही है कि मनुष्य अपने भीतर विद्यमान अहंकार, क्रोध, लोभ, द्वेष और अन्याय जैसी प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने का संकल्प ले। बाहरी विजय तभी स्थायी होती है, जब अंतर्मन में सदाचार और विवेक की प्रतिष्ठा हो।
उन्होंने शक्ति की उपासना और नारायण की भक्ति के मध्य निहित आध्यात्मिक समन्वय को भारतीय जीवन-दर्शन की विशिष्ट उपलब्धि बताया। उनके संदेश का भाव था कि मां की आराधना मनुष्य को साहस, ऊर्जा और आत्मविश्वास प्रदान करती है, जबकि भगवान श्रीराम के आदर्श उसे उस शक्ति के सदुपयोग की दिशा दिखाते हैं। एक ओर शक्ति अन्याय का प्रतिरोध करने की प्रेरणा देती है, तो दूसरी ओर मर्यादा यह सुनिश्चित करती है कि सामर्थ्य का उपयोग न्याय, लोकमंगल और धर्मसम्मत आचरण के लिए हो। जब शक्ति के साथ विवेक, भक्ति के साथ सेवा और अधिकार के साथ उत्तरदायित्व जुड़ते हैं, तभी व्यक्ति का जीवन संतुलित तथा समाज का स्वरूप सुदृढ़ बनता है।
परिवार और सामाजिक जीवन की वर्तमान आवश्यकताओं के संदर्भ में उन्होंने समन्वय, परस्पर सम्मान और संवाद की महत्ता पर बल दिया। परिवार केवल संबंधों का समूह नहीं, बल्कि संस्कारों, संवेदनाओं और उत्तरदायित्वों की प्रथम पाठशाला है। यदि परिवार में बड़ों के प्रति आदर, छोटों के प्रति स्नेह, महिलाओं के प्रति सम्मान और प्रत्येक सदस्य के प्रति न्यायपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित हो, तो वही संस्कार व्यापक समाज में सामाजिक समरसता का आधार बनते हैं। जाति, भाषा, क्षेत्र और सामाजिक स्थिति के भेद से ऊपर उठकर परस्पर सहयोग तथा मानवीय गरिमा को प्राथमिकता देना ही सनातन जीवन-दृष्टि की लोककल्याणकारी भावना को व्यवहार में उतारना है।
जितेंद्र प्रताप सिंह ने विजयदशमी के अवसर पर राष्ट्रवासियों से आह्वान किया कि वे पर्व की आध्यात्मिक ऊर्जा को व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक दायित्वों में परिणत करें। उत्सव की सार्थकता तभी है, जब उसके पश्चात भी हमारे व्यवहार में विनम्रता, विचारों में उदारता, कर्तव्यों में निष्ठा और समाज के प्रति संवेदनशीलता बनी रहे। उन्होंने मां दुर्गा से समस्त देशवासियों के जीवन में सुख, शांति, आरोग्य और समृद्धि की कामना करते हुए भगवान श्रीराम के आदर्शों से प्रेरित होकर राष्ट्र की एकता, सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने का संदेश दिया।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि नवदुर्गा की आराधना से प्राप्त आत्मबल और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के चरित्र से मिलने वाली जीवन-दृष्टि के समन्वय से ऐसा समाज निर्मित किया जा सकता है, जिसमें धर्म का अर्थ सदाचार, शक्ति का अर्थ संरक्षण, भक्ति का अर्थ सेवा और राष्ट्रप्रेम का अर्थ समस्त समाज के कल्याण के लिए समर्पित होना हो। इसी मंगलकामना के साथ उन्होंने महानवमी और विजयदशमी की समस्त देशवासियों को पुनः हार्दिक शुभकामनाएं अर्पित कीं।