पूर्व कोतवाल और अधिवक्ता के विरुद्ध लगाए गए गंभीर आरोपों से जुड़े प्रकरण में क्षेत्राधिकारी नगर की आख्या पर न्यायालय ने मांगी स्पष्टता; 23 सितंबर के आदेश में हस्ताक्षरकर्ता अधिकारी की पहचान बताने का निर्देश, 9 अक्टूबर को अगली सुनवाई
दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।सुलतानपुर में पूर्व कोतवाली नगर प्रभारी निरीक्षक एवं अधिवक्ता अब्बास अहमद के विरुद्ध लगाए गए गंभीर आरोपों से संबंधित न्यायालयीन कार्यवाही में 23 सितंबर 2026 को एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक बिंदु सामने आया। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कक्ष संख्या-16, सुलतानपुर के न्यायालय ने पुलिस की ओर से प्रस्तुत आख्या का परीक्षण करते हुए उस पर अंकित हस्ताक्षर की स्पष्ट पहचान मांगी है। न्यायालय ने प्रभारी निरीक्षक, कोतवाली नगर को निर्देश दिया है कि आख्या पर किए गए हस्ताक्षर किस पुलिस अधिकारी के हैं, इसकी स्पष्ट जानकारी प्राप्त कर नियत तिथि पर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाए। मामले की अगली सुनवाई 9 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है।
यह कार्यवाही बल्दीराय थाना क्षेत्र के पूरे कंधई शुक्ल गांव निवासी सन्तराम शुक्ला द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना पत्र से संबंधित है। प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता बेलाल अहमद ने न्यायालय के समक्ष मामला रखा है। प्रार्थी ने पुलिस स्तर पर शिकायत के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई न होने का आरोप लगाते हुए न्यायालय से प्राथमिकी दर्ज कर विवेचना कराए जाने का अनुरोध किया है। प्रकरण में न्यायालय ने पुलिस से आख्या तलब की थी, जिसके क्रम में क्षेत्राधिकारी नगर, सुलतानपुर की ओर से 22 सितंबर 2026 को आख्या प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख 23 सितंबर के न्यायालयीन आदेश में है।
आरोपों के केंद्र में दस्तावेज, धनराशि और मुकदमे की पैरवी
प्रार्थी का आरोप है कि दीवानी न्यायालय में लंबित एक मुकदमे की पैरवी और अन्य कानूनी कार्यवाही के लिए उन्होंने अधिवक्ता अब्बास अहमद को कई महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध कराए थे। प्रार्थना पत्र में दावा किया गया है कि मुकदमे के खर्च और कानूनी कार्यवाही के नाम पर अलग-अलग समय में उनसे धनराशि ली गई, लेकिन उनके अनुसार अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई और दस्तावेज भी समय पर वापस नहीं किए गए।
प्रार्थी के अनुसार, जब उन्होंने अपने दस्तावेज और धनराशि वापस मांगी तो कथित रूप से उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया। प्रार्थना पत्र में यह भी कहा गया है कि बाद में उनकी पुत्री प्रियाशी शुक्ला के बैंक खाते में 1.50 लाख रुपये आरटीजीएस के माध्यम से भेजे गए। प्रार्थी ने आरोप लगाया है कि इसके बाद उक्त धनराशि को लेकर उन पर दबाव बनाया गया और मुकदमों में फंसाने की कथित धमकी दी गई।
2023 की घटना और एक करोड़ रुपये के चेक का भी आरोप
प्रार्थना पत्र में वर्ष 2023 की एक कथित घटना का भी उल्लेख है। प्रार्थी का आरोप है कि उन्हें लखनऊ से पकड़कर कोतवाली नगर लाया गया और कई दिनों तक वहां रखा गया। उन्होंने इस दौरान मानसिक एवं शारीरिक उत्पीड़न किए जाने का भी आरोप लगाया है।
प्रार्थी ने यह भी आरोप लगाया है कि इसी अवधि में उनसे एक करोड़ रुपये की राशि का हस्ताक्षरित चेक कथित रूप से जबरन भरवाया गया। प्रार्थना पत्र के अनुसार, बाद में उक्त चेक बैंक में प्रस्तुत किया गया और उसके अनादर के आधार पर परक्राम्य लिखत अधिनियम के अंतर्गत उनके विरुद्ध कार्यवाही शुरू की गई। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस न्यायालयीन आदेश में नहीं की गई है और इनका परीक्षण विधिक प्रक्रिया के अधीन है।
पुलिस अधिकारियों से शिकायत के बाद न्यायालय पहुंचे प्रार्थी
प्रार्थी का कहना है कि उन्होंने पूरे घटनाक्रम के संबंध में पुलिस अधीक्षक समेत संबंधित अधिकारियों को शिकायतें दीं, लेकिन उनके अनुसार प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने न्यायालय में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर प्राथमिकी दर्ज कराने तथा मामले की विवेचना कराए जाने का अनुरोध किया।
प्रार्थी की ओर से न्यायालय में यह तर्क रखा गया कि लगाए गए आरोपों की वास्तविकता का परीक्षण पुलिस विवेचना के माध्यम से ही प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। उनके अनुसार दस्तावेजों, बैंक लेनदेन तथा अन्य संबंधित साक्ष्यों की जांच भी विवेचना का हिस्सा होनी चाहिए।
22 सितंबर की पुलिस आख्या पर न्यायालय ने मांगी पहचान
मामले में निर्णायक रूप से सामने आया बिंदु पुलिस की ओर से प्रस्तुत आख्या है। न्यायालय के 23 सितंबर 2026 के आदेश में दर्ज है कि क्षेत्राधिकारी नगर, सुलतानपुर की ओर से 22 सितंबर को आख्या प्रस्तुत की गई। पत्रावली के अवलोकन में न्यायालय ने पाया कि आख्या पर क्षेत्राधिकारी नगर, सुलतानपुर की मुहर अंकित है और उसके ऊपर हस्ताक्षर भी मौजूद हैं, लेकिन हस्ताक्षर के नीचे संबंधित पुलिस अधिकारी का नाम अंकित नहीं है।
न्यायालय ने इसी तथ्य को स्पष्ट किए जाने योग्य मानते हुए प्रभारी निरीक्षक, कोतवाली नगर, सुलतानपुर को निर्देशित किया है कि यह स्पष्ट कराया जाए कि उक्त हस्ताक्षर किस पुलिस अधिकारी के हैं और इसकी स्पष्ट आख्या नियत तिथि पर न्यायालय में प्रस्तुत की जाए।
9 अक्टूबर को सामने आएगा अगला न्यायालयीन कदम
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नवनीत सिंह द्वारा 23 सितंबर 2026 को पारित आदेश के अनुसार पत्रावली को 9 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के लिए प्रस्तुत किया जाना है। उस तिथि पर पुलिस की ओर से मांगी गई स्पष्टीकरणात्मक आख्या प्रस्तुत किए जाने की अपेक्षा है। इसके बाद न्यायालय प्रकरण में आगे की कार्यवाही के संबंध में क्या आदेश पारित करता है, यह अगली सुनवाई में स्पष्ट होगा।
फिलहाल न्यायालय के 23 सितंबर के आदेश का केंद्र आरोपों की सत्यता पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं, बल्कि पुलिस द्वारा प्रस्तुत आख्या पर अंकित हस्ताक्षर की पहचान और उससे संबंधित स्पष्टता है। मूल आरोपों की सत्यता तथा उनसे जुड़े अन्य तथ्य न्यायिक प्रक्रिया में परीक्षण के अधीन हैं।
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पुलिस आख्या पर न्यायालय का सवाल: हस्ताक्षर किस अधिकारी के हैं?
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