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भारतीय रेल का बदलता स्वरूप — "अतिथि देवो भवः" की नई परिभाषा

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Dainik India News

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भारतीय रेल का बदलता स्वरूप — "अतिथि देवो भवः" की नई परिभाषा

तेजस एक्सप्रेस से लखनऊ से गाजियाबाद की यात्रा बनी उत्कृष्ट सेवाओं का साक्षी

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ/नई दिल्ली। वर्षों बाद एक बार फिर रेल यात्रा का अनुभव प्राप्त हुआ और यह अनुभव भारतीय रेल की नई सोच, आधुनिक व्यवस्था और सेवा भाव का जीवंत उदाहरण बन गया। आईआरसीटीसी की तेजस एक्सप्रेस (गाड़ी संख्या 82501) से लखनऊ से गाजियाबाद तक की ईसी-1 सीट संख्या 45 पर की गई यह यात्रा, रेलवे के पारंपरिक व्यवहार और वर्तमान नवाचार के बीच स्पष्ट अंतर को दर्शाती है।

जहां आमतौर पर सरकारी, अर्ध-सरकारी या सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यरत कर्मियों के व्यवहार में उपभोक्ता के प्रति नीरसता, उपेक्षा और औपचारिकता देखने को मिलती है, वहीं तेजस एक्सप्रेस की इस यात्रा में इन सभी पूर्वग्रहों को पूरी तरह तोड़ दिया गया। जैसे ही यात्री डिब्बे में प्रवेश करता है, उसका स्वागत पुष्प और आत्मीय मुस्कान के साथ किया जाता है — एक ऐसा अनुभव, जो यह विश्वास दिलाता है कि रेलवे अब वास्तव में "अतिथि देवो भवः" के मंत्र को आत्मसात कर चुका है।

स्वच्छता, सुविधा और सेवा का संगम

कोच की स्वच्छता, सुगंधित वातावरण, आरामदेह सीटें और अत्यंत सुनियोजित रखरखाव मन को आनंद और संतोष प्रदान करता है। यह सर्वविदित है कि यात्रियों द्वारा पहले से टिकट के माध्यम से इन सेवाओं का मूल्य चुकाया जाता है, फिर भी बीते वर्षों में अपेक्षित स्तर की स्वच्छता और सेवा मिल पाना एक चुनौती रहा है। किंतु अब रेलवे ने इस दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन करते हुए खाद्य सामग्री की गुणवत्ता, स्टाफ के व्यवहार, और तकनीकी नवाचारों के माध्यम से सेवाओं को अंतरराष्ट्रीय मानकों के स्तर तक पहुँचा दिया है।

इस परिवर्तन के पीछे रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का कुशल नेतृत्व और प्रशासनिक दूरदृष्टि प्रमुख भूमिका निभा रही है। तकनीकी संसाधनों के समुचित उपयोग और मानव संसाधन के कुशल प्रशिक्षण ने रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों को आधुनिक स्वरूप में परिवर्तित कर दिया है।

सेवादल को सम्मान, सेवा के प्रति साधुवाद

इस सुखद यात्रा के दौरान कोच ईसी-1 में कार्यरत पवन सिंह एवं शिवांगी द्वारा यात्रियों को दी गई सेवा अत्यंत सराहनीय रही। सीट संख्या 45 पर यात्रा कर रहे राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह ने स्वयं कोच के इन कर्मचारियों को पुष्प भेंट कर सम्मानित किया और उनकी सेवा को "उत्कृष्ट और अनुकरणीय" बताया। उन्होंने समस्त यात्रियों की ओर से आभार व्यक्त करते हुए भारतीय रेलवे के उज्जवल और स्वर्णिम भविष्य की मंगलकामना की।

यह छोटा सा सम्मान उस भाव का प्रतीक था जिसमें सेवा को केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि एक संस्कार और समर्पण के रूप में देखा गया। यह स्पष्ट संकेत है कि भारतीय रेलवे अब यात्रियों के अनुभव को केवल यात्रा तक सीमित नहीं रहने देना चाहता, बल्कि उसे यादगार और प्रेरणादायक बनाना चाहता है।

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