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मधुबन में हनुमंत कथा का दिव्य उत्कर्ष : हनुमान चालीसा के तत्वबोध से आलोकित हुआ चेतना का विराट क्षितिज

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मधुबन में हनुमंत कथा का दिव्य उत्कर्ष : हनुमान चालीसा के तत्वबोध से आलोकित हुआ चेतना का विराट क्षितिज

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।मधुबन (मऊ)स्थित श्री संकट मोचन दक्षिणेश्वर हनुमान मंदिर सेवा समिति के पावन सान्निध्य में संपन्न हो रहे श्री हनुमान चालीसा महायज्ञ एवं श्री हनुमंत कथा के सप्तम दिवस पर भक्ति, ज्ञान और वेदान्त का अद्वितीय समन्वय दृष्टिगोचर हुआ। व्यासपीठ से विराजमान पूज्य विश्वंभर जी महाराज ने अपने दिव्य, गूढ़ार्थमय एवं आत्मानुभूति से परिपुष्ट प्रवचनों के माध्यम से हनुमान चालीसा को केवल स्तुतिगान नहीं, अपितु आत्मतत्व के साक्षात् उद्घाटन के रूप में प्रतिपादित किया। उनके प्रत्येक शब्द में ऐसी आध्यात्मिक ऊर्जा संचारित थी, मानो श्रोताओं का अंतःकरण स्वयं ब्रह्मानुभूति की ओर उन्मुख हो रहा हो।


महाराज श्री ने “दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते” चौपाई का विवेचन करते हुए कहा कि यह केवल कृपा का आश्वासन नहीं, बल्कि जीव के सीमित बोध से असीम चैतन्य की यात्रा का उद्घोष है। जब साधक हनुमान रूपी गुरु-तत्त्व की शरण में समर्पित होता है, तब जीवन के समस्त दुष्कर एवं दुरूह बंधन सहज ही विलीन हो जाते हैं। यह अनुग्रह ही वह अदृश्य शक्ति है, जो साधक को आत्मबोध के परम सोपान तक पहुँचाती है।

इसी क्रम में “बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार” का गूढ़ार्थ उद्घाटित करते हुए उन्होंने कहा कि यह चौपाई आत्मसमर्पण की चरम परिणति का प्रतीक है। जब साधक अपनी बौद्धिक क्षुद्रता का स्वीकार करता है, तभी दिव्य प्रज्ञा का द्वार उद्घाटित होता है। यह विनय ही वह सेतु है, जो जीव को अहंकार से मुक्त कर चैतन्य के महासागर में अवगाहन कराता है।

महाराज श्री ने “राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे” के माध्यम से यह प्रतिपादित किया कि हनुमान जी केवल द्वारपाल नहीं, बल्कि जीव और ब्रह्म के मध्य स्थित चेतना के संरक्षक हैं। राम का द्वार यहाँ परम सत्य का प्रतीक है, जहाँ प्रवेश हेतु निष्कलुष भक्ति और शुद्ध अंतःकरण अनिवार्य है। हनुमान जी की कृपा के बिना इस सत्य का साक्षात्कार संभव नहीं—अर्थात गुरु ही ब्रह्मज्ञान के द्वार के उद्घाटक हैं।

जब उन्होंने “संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा” का तत्वार्थ प्रस्तुत किया, तो समस्त वातावरण भक्ति-रस में आप्लावित हो उठा। उन्होंने कहा कि यहाँ ‘संकट’ केवल सांसारिक कष्ट नहीं, बल्कि अज्ञान, मोह और माया के सूक्ष्म बंधन हैं। हनुमान जी का स्मरण इन बंधनों को क्षीण कर आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप की ओर उन्मुख करता है—जहाँ केवल आनंद, केवल शांति और केवल सत्य का अधिवास है।

कथा के मध्य रामचरितमानस के केवट प्रसंग का अत्यंत मार्मिक वर्णन करते हुए महाराज श्री ने कहा कि केवट का चरण पखारना केवल सेवा नहीं, बल्कि आत्मनिवेदन की पराकाष्ठा है। यह प्रसंग दर्शाता है कि जब जीव पूर्ण समर्पण के साथ प्रभुचरणों में अवस्थित होता है, तब उसका समस्त जीवन दिव्यता का माध्यम बन जाता है। यही भक्ति का चरम उत्कर्ष है—जहाँ जीव और ईश्वर के मध्य का भेद विलीन हो जाता है।

कथा के पूर्व सुनीता सिंह, भरत सिंह, रविन्द्र मौर्य, जयप्रकाश जायसवाल एवं अजय गुप्ता द्वारा विधिवत पूजन-अर्चन कर व्यासपीठ का अभिषेक किया गया। प्रत्येक क्षण में श्रद्धालु मानो आध्यात्मिक अमृत का पान कर रहे थे, और उनके अंतर्मन में एक अदृश्य शांति का संचार हो रहा था।

कथा के समापन की ओर अग्रसर होते हुए महाराज श्री ने हनुमान चालीसा की फलश्रुति का अत्यंत रहस्यमय एवं प्रभावशाली वर्णन किया। उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास जी के उस दिव्य संकेत को उद्घाटित किया कि जो साधक श्रद्धा, विश्वास और विधिपूर्वक सतवार—अर्थात बारंबार एवं नियत संख्याओं में—हनुमान चालीसा का पाठ करता है, उसके जीवन के समस्त बंधन, बाधाएँ एवं अदृश्य अवरोध स्वतः ही क्षीण हो जाते हैं। वैदिक विधान के अनुसार 108 पाठ का अनुष्ठान केवल संख्यात्मक प्रक्रिया नहीं, बल्कि चेतना के क्रमिक शुद्धिकरण का साधन है।

उन्होंने कहा कि अनेक बार मनुष्य अनजाने में कर्मबंधन, ग्रहबाधा या मानसिक जड़ता के ऐसे जाल में उलझ जाता है, जहाँ से निकलना असंभव प्रतीत होता है। किन्तु हनुमान चालीसा का नियमित, एकाग्र एवं भावपूर्ण पाठ उस जड़ता को भंग कर देता है। यह पाठ साधक के भीतर सुप्त दिव्य ऊर्जा को जाग्रत कर, उसे बंधनमुक्त कर जीवन के उत्कर्ष एवं उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करता है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशक्ति के जागरण का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक साधन है—जो साधक को निर्भय, निर्बाध और निर्विकल्प बना देता है।

अंततः उन्होंने कहा कि हनुमान चालीसा का प्रत्येक शब्द, प्रत्येक अक्षर एक मंत्रमय स्पंदन है, जो साधक के सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर उसे परम आनंद की अनुभूति कराता है। जब यह पाठ श्रद्धा और समर्पण के साथ किया जाता है, तब साधक केवल बंधनों से मुक्त नहीं होता, बल्कि वह अपने जीवन के सर्वोच्च उद्देश्य—आत्मसाक्षात्कार—की ओर अग्रसर हो जाता है।अगले प्रवचन में पूज्य महाराज श्री इस गूढ़ विषय का विस्तार करेंगे कि हनुमान जी वास्तव में कौन हैं और रामजी कौन है हनुमान जी के

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