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‘ऑर्गेनिक’ चीनी के नाम पर बड़ा खेल? पैकेट पर दावे, उत्पाद की शुद्धता पर गंभीर सवाल

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Dainik India News

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‘ऑर्गेनिक’ चीनी के नाम पर बड़ा खेल? पैकेट पर दावे, उत्पाद की शुद्धता पर गंभीर सवाल

दिल्ली में संदिग्ध चीनी के मामले ने बढ़ाई चिंता; उपभोक्ताओं की सेहत से जुड़े दावों की वैज्ञानिक जांच जरूरी, खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर भी उठे सवाल

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दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।‘ऑर्गेनिक’, ‘नेचुरल’ और ‘मिनरल’ जैसे आकर्षक नामों के सहारे सामान्य चीनी से कई गुना अधिक कीमत वसूलने वाले उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। दिल्ली में सामने आए एक संदिग्ध मामले में चीनी के नमूने में कथित रूप से रासायनिक तत्व पाए जाने की बात सामने आई है। संबंधित उत्पाद के पैकेट और उपलब्ध सामग्री ने उपभोक्ताओं के बीच यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या महंगे दाम और पैकेट पर छपे प्रमाणन को ही खाद्य पदार्थ की शुद्धता की गारंटी मान लिया जाए?

मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता का सीधा संबंध लोगों के स्वास्थ्य से है। यदि किसी उत्पाद में प्रतिबंधित रसायन अथवा निर्धारित सीमा से अधिक किसी रासायनिक पदार्थ की मौजूदगी प्रमाणित होती है, तो यह केवल एक कंपनी या उत्पाद का मामला नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य सुरक्षा की पूरी निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करेगा।

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‘ऑर्गेनिक’ नाम पर महंगी बिक्री, जांच कितनी पुख्ता?

स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण बड़ी संख्या में उपभोक्ता अब सामान्य खाद्य पदार्थों के बजाय ऑर्गेनिक और प्राकृतिक उत्पाद खरीदना पसंद करते हैं। इसी बदलती उपभोक्ता प्रवृत्ति के बीच ऐसे उत्पादों की कीमत भी सामान्य उत्पादों की तुलना में काफी अधिक होती है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस उत्पाद के नाम पर ग्राहक अतिरिक्त कीमत चुका रहा है, क्या उसकी गुणवत्ता और दावों की पर्याप्त वैज्ञानिक जांच भी हो रही है?

पैकेट पर प्रमाणन अथवा गुणवत्ता संबंधी चिह्न देखकर उपभोक्ता स्वाभाविक रूप से उत्पाद को सुरक्षित और प्रमाणित मान लेता है। लेकिन किसी उत्पाद की वास्तविक गुणवत्ता का अंतिम निर्धारण प्रयोगशाला परीक्षण और वैधानिक मानकों के आधार पर ही किया जा सकता है।

रिपोर्ट सामने आई तो बढ़ सकती है जांच की मांग

दिल्ली से जुड़े इस मामले में चीनी के नमूने में कथित रूप से कुछ रासायनिक तत्व पाए जाने की चर्चा ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है। हालांकि, किसी रसायन की मौजूदगी, उसकी मात्रा और उससे स्वास्थ्य पर संभावित प्रभाव की पुष्टि मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला की रिपोर्ट से ही हो सकती है।

यदि जांच में किसी प्रतिबंधित रसायन अथवा निर्धारित सीमा से अधिक पदार्थ की मौजूदगी प्रमाणित होती है तो संबंधित निर्माता, वितरक और विक्रेता के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही बाजार में मौजूद उसी बैच के अन्य पैकेटों की भी जांच कराई जानी चाहिए।

खाद्य सुरक्षा विभाग की भूमिका पर भी सवाल

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष खाद्य सुरक्षा निगरानी तंत्र है। यदि कोई संदिग्ध खाद्य उत्पाद बाजार में लंबे समय तक बिकता रहा और बाद में उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठे तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि उसकी नियमित निगरानी और नमूना जांच कब-कब हुई।

दिल्ली का खाद्य सुरक्षा विभाग खाद्य पदार्थों के नमूने लेने, उनकी जांच कराने और मानकों का उल्लंघन पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई करने के लिए जिम्मेदार है। ऐसे में इस मामले में विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित उत्पाद का नमूना लिया गया है या नहीं, जांच कहां कराई गई और रिपोर्ट में क्या सामने आया।

‘मिलीभगत’ के आरोपों की भी हो निष्पक्ष जांच

इस मामले में खाद्य सुरक्षा तंत्र की कथित मिलीभगत और भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि, बिना ठोस प्रमाण किसी अधिकारी अथवा विभाग पर रिश्वत लेकर किसी कंपनी को संरक्षण देने का आरोप तथ्य के रूप में नहीं लगाया जा सकता।

यदि ऐसे आरोपों के समर्थन में शिकायत, दस्तावेज, वित्तीय लेन-देन, जांच रिपोर्ट या अन्य प्रमाण उपलब्ध हैं तो उनकी स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए। दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों और कारोबारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

सरकार से उपभोक्ताओं के पांच सवाल

पहला— संदिग्ध चीनी के नमूने की वैज्ञानिक जांच हुई या नहीं?

दूसरा— जांच में कौन-कौन से रासायनिक तत्व पाए गए और उनकी मात्रा कितनी थी?

तीसरा— संबंधित उत्पाद का लाइसेंस, प्रमाणन और लेबलिंग नियमों के अनुरूप है या नहीं?

चौथा— यदि उत्पाद मानकों पर खरा नहीं उतरता तो उसके पूरे बैच को बाजार से हटाने की कार्रवाई हुई या नहीं?

पांचवां— निगरानी में लापरवाही सामने आने पर जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई होगी?

उपभोक्ता के भरोसे से बड़ा कोई प्रमाणपत्र नहीं

यह मामला केवल चीनी की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि उपभोक्ता के भरोसे का भी है। जिस ग्राहक को ‘ऑर्गेनिक’ या ‘मिनरल’ जैसे नामों के आधार पर किसी उत्पाद के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है, उसे यह अधिकार है कि उसे वास्तविक और प्रमाणित गुणवत्ता मिले।

सरकार और खाद्य नियामक संस्थाओं को ऐसे मामलों में केवल कागजी प्रमाणपत्रों पर निर्भर रहने के बजाय नियमित नमूना जांच, पारदर्शी प्रयोगशाला रिपोर्ट और कठोर बाजार निगरानी सुनिश्चित करनी होगी।

यदि किसी उत्पाद में मिलावट या हानिकारक रसायन की मौजूदगी प्रमाणित होती है तो कार्रवाई केवल संबंधित पैकेट तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पूरे बैच की जांच, बाजार से वापसी और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करना भी आवश्यक होगा।

दैनिक इंडिया न्यूज़ इस मामले से जुड़े उपलब्ध दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे भी पड़ताल जारी रखेगा। हमारा उद्देश्य किसी कंपनी या व्यक्ति को बिना प्रमाण दोषी ठहराना नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं के हित में यह सवाल उठाना है कि उनके पैसे और स्वास्थ्य के साथ किसी भी स्तर पर समझौता तो नहीं हो रहा।

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