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21 लाख की ट्रॉली से खुला बड़ा सवाल: रायबरेली में आपात बिजली व्यवस्था की फाइल कहां अटकी?

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Dainik India News

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21 लाख की ट्रॉली से खुला बड़ा सवाल: रायबरेली में आपात बिजली व्यवस्था की फाइल कहां अटकी?

सांसद निधि से दो चलित ट्रांसफार्मर उपलब्ध होने के बाद विभागीय खरीद, कार्ययोजना और भंडार व्यवस्था की पड़ताल जरूरी; रिकॉर्ड बताएगा कि जरूरत पहले पहचानी गई थी तो समाधान देर से क्यों आया

दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।रायबरेली में करीब 21 लाख रुपये की लागत से सांसद निधि के जरिए दो चलित ट्रांसफार्मर उपलब्ध कराए जाने की घटना अपने आप में विकास कार्य का एक हिस्सा है, लेकिन इसके पीछे छिपा प्रशासनिक सवाल इससे कहीं बड़ा है—जिस उपकरण की जरूरत विद्युत आपूर्ति की आपात स्थिति में पड़ती है, उसके लिए विभागीय व्यवस्था क्या थी? नौ सितंबर को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष एवं रायबरेली सांसद राहुल गांधी द्वारा इन ट्रांसफार्मरों को हरी झंडी दिखाए जाने के बाद यही प्रश्न केंद्र में है। सार्वजनिक रिपोर्टों में भी इस दौरे के दौरान ट्रांसफार्मर ट्रॉली और अन्य विकास कार्यों के लोकार्पण-शिलान्यास का उल्लेख हुआ है।

पहला सवाल: जरूरत विभाग को पता थी या नहीं?

चलित ट्रांसफार्मर कोई सामान्य विकास सामग्री नहीं है। इसका इस्तेमाल खराब या जले ट्रांसफार्मर की स्थिति में विद्युत आपूर्ति को अस्थायी रूप से बहाल करने के लिए किया जाता है। इसलिए इसकी उपलब्धता किसी वितरण निगम की आपात तैयारी का हिस्सा मानी जाएगी। यदि रायबरेली में विभागीय कार्ययोजना में ट्रांसफार्मर की जरूरत पहले से दर्ज थी और भंडार के लिए मांग भी लगाई गई थी, तो सबसे पहले यह पता करना होगा कि उस मांग की तारीख क्या थी, स्वीकृति कब मिली और खरीद कब हुई।

यहीं से जांच का पहला सिरा निकलता है। जरूरत पहले दर्ज हुई या सांसद निधि से संसाधन उपलब्ध कराने का निर्णय पहले आया? दोनों घटनाओं की तारीखें सामने आ जाएं तो यह स्पष्ट हो सकता है कि सांसद निधि से उपलब्ध कराया गया संसाधन विभागीय कमी की भरपाई था या स्वतंत्र रूप से किया गया विकास कार्य।

दूसरा सवाल: विभाग के पास तब कितने ट्रांसफार्मर थे?

किसी भी आपात व्यवस्था की वास्तविक स्थिति दावों से नहीं, स्टॉक रजिस्टर से पता चलती है। रायबरेली जोन के भंडार में संबंधित अवधि में कितने चलित ट्रांसफार्मर उपलब्ध थे? कितने उपयोग में थे? कितने खराब थे? कितने अलग-अलग वितरण क्षेत्रों में भेजे गए? कितने की खरीद लंबित थी?

इन सवालों के जवाब उपलब्ध हो जाएं तो 21 लाख रुपये के दो नए ट्रांसफार्मरों की आवश्यकता का प्रशासनिक संदर्भ साफ हो सकता है।

यदि विभाग के पास पर्याप्त ट्रॉली पहले से थीं, तो नई व्यवस्था की आवश्यकता और उपयोग का आधार स्पष्ट करना होगा। यदि पर्याप्त ट्रॉली नहीं थीं, तो अगला सवाल खरीद प्रक्रिया की समयसीमा और जिम्मेदारी पर जाएगा।

तीसरा सवाल: कार्ययोजना में स्वीकृति के बाद जमीन पर क्या हुआ?

उपलब्ध सामग्री में विभागीय कार्ययोजना में ट्रांसफार्मर की स्वीकृति और भंडार में मांग दर्ज होने का उल्लेख है। लेकिन किसी योजना का कागज पर स्वीकृत होना और उसका जमीन पर उपलब्ध होना दो अलग-अलग अवस्थाएं हैं।

यहीं जांच का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजी बिंदु सामने आता है—स्वीकृति से खरीद तक कितने दिन लगे? खरीद आदेश कब जारी हुआ? आपूर्ति कब हुई? भुगतान कब किया गया?

अगर यह समय-रेखा लंबी है, तो देरी का कारण क्या था? यदि देरी नहीं थी, तो सांसद निधि से अलग व्यवस्था की आवश्यकता क्यों बनी? यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक प्रक्रिया और राजनीतिक प्रस्तुति एक-दूसरे से अलग होती हैं।

चौथा सवाल: शिकायतें थीं तो आपात व्यवस्था कितनी तैयार थी?

रायबरेली में ट्रांसफार्मर खराब होने और विद्युत आपूर्ति बाधित होने की शिकायतों का उल्लेख पहले भी सामने आता रहा है। नौ सितंबर की दिशा बैठक में भी राहुल गांधी ने जिले की विकास योजनाओं और खराब सड़कों को लेकर अधिकारियों से जवाब मांगे थे।

ऐसे वातावरण में विद्युत आपूर्ति से जुड़े संसाधनों की उपलब्धता की पड़ताल और महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किसी क्षेत्र में लगातार ट्रांसफार्मर खराब होने की शिकायतें थीं, तो वितरण व्यवस्था ने उस क्षेत्र के लिए कितने वैकल्पिक ट्रांसफार्मर निर्धारित किए थे? क्या आपात उपयोग के लिए अलग स्टॉक था? शिकायत दर्ज होने और खराब ट्रांसफार्मर बदलने के बीच औसत समय कितना रहा?

इन आंकड़ों के बिना यह तय करना कठिन होगा कि समस्या संसाधनों की थी, खरीद प्रक्रिया की, भंडारण की या संचालन व्यवस्था की।

पांचवां सवाल: सांसद निधि और विभागीय जिम्मेदारी की सीमा कहां है?

सांसद निधि से सामुदायिक उपयोग की परिसंपत्ति उपलब्ध कराना अपने आप में अनियमितता नहीं है। इसलिए इस पूरे मामले को केवल राजनीतिक विवाद के रूप में देखना तथ्यात्मक जांच को कमजोर करेगा।

असल प्रश्न यह है कि सांसद निधि से उपलब्ध कराया गया उपकरण विभागीय आपात व्यवस्था का पूरक है या उस व्यवस्था की कमी की भरपाई?

यदि विभाग के पास अपनी स्वीकृत और वित्तपोषित व्यवस्था थी, तो उसकी स्थिति सार्वजनिक होनी चाहिए। यदि विभाग के पास संसाधन नहीं थे, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आपात जरूरत के लिए पर्याप्त प्रावधान क्यों नहीं किया गया।

छठा सवाल: पद-विस्तारण के आरोपों का ट्रांसफार्मर से क्या संबंध?

मामले का एक अलग और संवेदनशील पहलू अधिकारियों-कर्मचारियों के पद-विस्तारण और तैनाती से जुड़े आरोप हैं। उपलब्ध सामग्री में गृहजनपद में तैनाती को लेकर प्रतिबंध संबंधी आदेश और उसके कथित उल्लंघन का उल्लेख है।

लेकिन यहां पत्रकारिता की सबसे जरूरी सावधानी यही होगी कि पद-विस्तारण के आरोप को विद्युत ट्रांसफार्मर की खरीद में देरी का कारण मानने से पहले दोनों के बीच दस्तावेजी संबंध साबित किया जाए।

किस अधिकारी ने कौन-सा आदेश जारी किया? किस पद का विस्तार हुआ? किस तारीख को हुआ? किस सक्षम अधिकारी ने मंजूरी दी? क्या उस समय ट्रांसफार्मर की खरीद अथवा आपात व्यवस्था की कोई फाइल लंबित थी?

इन प्रश्नों के उत्तर के बिना दोनों घटनाओं को जोड़ना निष्कर्ष होगा, जांच नहीं।

सातवां सवाल: नवंबर 2025 के बाद क्या बदला?

नवंबर 2025 की समीक्षा के बाद रायबरेली जोन के दोनों अधीक्षण अभियंताओं को हटाए जाने की बात भी सामने आई है। यदि यह कार्रवाई विभागीय समीक्षा का परिणाम थी, तो उसके बाद क्या सुधारात्मक कदम उठाए गए, यह महत्वपूर्ण होगा।

किसी अधिकारी के स्थानांतरण या हटाए जाने से व्यवस्था अपने आप नहीं बदलती। वास्तविक सुधार का प्रमाण शिकायतों के निस्तारण, ट्रांसफार्मर बदलने के समय, स्टॉक की उपलब्धता और आपात प्रतिक्रिया की अवधि में दिखाई देता है।

इसलिए 2025 की समीक्षा से लेकर सितंबर 2026 तक की अवधि के आंकड़े इस जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं।

संसद तक पहुंचा तो सवाल आंकड़ों पर होगा

राजनीतिक रूप से यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है कि राहुल गांधी स्वयं लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और रायबरेली से सांसद हैं। उनके हालिया दौरे में विकास कार्यों और योजनाओं की समीक्षा को लेकर उनकी सक्रियता भी सामने आई है।

लेकिन संसद में किसी भी संभावित सवाल का ठोस उत्तर राजनीतिक दावों से नहीं, दस्तावेजों से देना होगा। यदि पूछा गया कि सांसद निधि से चलित ट्रांसफार्मर उपलब्ध कराने की आवश्यकता क्यों पड़ी, तो जवाब के साथ खरीद आदेश, स्टॉक स्थिति, कार्ययोजना, बजट स्वीकृति और आपूर्ति की समय-रेखा रखनी होगी।

जांच की असली फाइल यही है

इस पूरे मामले में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज सात हैं—कार्ययोजना की स्वीकृति, बजट आवंटन, भंडार की मांग, खरीद आदेश, आपूर्ति रसीद, स्टॉक रजिस्टर और सांसद निधि से हुई खरीद के स्वीकृति दस्तावेज।

इन सात दस्तावेजों को तारीखवार सामने रख दिया जाए तो विवाद का बड़ा हिस्सा स्वतः स्पष्ट हो सकता है।

यदि विभागीय खरीद पहले से स्वीकृत थी और फिर भी उपकरण उपलब्ध नहीं हुए, तो देरी की जिम्मेदारी तय करनी होगी। यदि खरीद प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई थी, तो योजना और क्रियान्वयन के बीच की खाई सामने आएगी। यदि विभाग के पास पर्याप्त स्टॉक था, तो सांसद निधि से नई ट्रॉलियों के औचित्य का प्रश्न उठेगा। और यदि स्टॉक अपर्याप्त था, तो आपात तैयारी की समीक्षा अनिवार्य होगी।

यही इस मामले की वास्तविक जांच है। 21 लाख रुपये की दो ट्रॉलियां अपने आप में बड़ा वित्तीय मामला नहीं हैं; बड़ा सवाल यह है कि वे उस व्यवस्था में क्यों आईं, जिसे आपात स्थिति में ऐसी मशीनें स्वयं उपलब्ध कराने में सक्षम होना चाहिए। इसका उत्तर किसी राजनीतिक मंच, सोशल मीडिया वीडियो या आरोप से नहीं, बल्कि विभाग की फाइलों और जमीन पर उपलब्ध आंकड़ों से निकलेगा।

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