DIN,नई दिल्ली। देश में कानून के कथित दुरुपयोग और झूठे मुकदमों को लेकर बहस तेज है, लेकिन इस बहस के बीच संसद में करीब एक साल पहले उठी एक आवाज फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। भाजपा सांसद रवि किशन ने 11 दिसंबर 2025 को लोकसभा में कानून के दुरुपयोग और झूठे मुकदमों का मुद्दा उठाते हुए सरकार से ऐसे मामलों पर कड़ी कार्रवाई के लिए कानून बनाने की मांग की थी। संसदीय रिकॉर्ड में उनका विषय ही “Request for Strict Action Against Misuse of Legal System and Filing of False Cases” दर्ज है।
रवि किशन का तर्क था कि किसी निर्दोष व्यक्ति पर झूठा मुकदमा दर्ज होने का असर केवल अदालत की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता। परिवार टूटता है, सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित होती है और सरकारी मशीनरी तथा अदालतों पर भी मुकदमों का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। उन्होंने मांग की थी कि जानबूझकर झूठा मुकदमा दर्ज कराने वालों के साथ-साथ गलत आरोपों को जांच में सही ठहराने वाले अधिकारियों पर भी जवाबदेही तय हो।
अब सवाल यह है कि जिस चिंता को संसद में एक साल पहले उठाया गया था, उसकी गंभीरता को आंकड़ों की कसौटी पर कैसे देखा जाए? ताजा सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024 में देशभर में इस विशेष कानून के तहत अनुसूचित जाति से संबंधित 55,685 और अनुसूचित जनजाति से संबंधित 9,961 मामले दर्ज हुए—कुल मिलाकर 65,646 मामले। 2023 में यह संयुक्त संख्या 70,725 थी।
यहां आंकड़ों का दूसरा पहलू और भी महत्वपूर्ण है। 2024 के अंत तक अनुसूचित जाति से संबंधित 17,123 मामले और अनुसूचित जनजाति से संबंधित 7,219 मामले जांच में लंबित थे। यानी हजारों मामले उस समय भी जांच की प्रक्रिया से बाहर नहीं निकले थे।
अदालतों में पहुंचने वाले मामलों की तस्वीर भी एक कठिन सवाल खड़ा करती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2024 में इस कानून के तहत अनुसूचित जाति से संबंधित मामलों में अखिल भारतीय conviction rate 33.9 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति से संबंधित मामलों में 33.2 प्रतिशत रहा। 2023 में यही दर क्रमशः 32.4 और 24.6 प्रतिशत थी।
यहीं से बहस का सबसे संवेदनशील सवाल निकलता है—क्या जिन मामलों में सजा नहीं हुई, वे सभी झूठे थे? इसका जवाब आंकड़े अपने आप नहीं देते। किसी मामले में बरी होना, मुकदमे का लंबित रहना, सबूतों का पर्याप्त न होना और शिकायत का शुरू से ही झूठा होना—कानून की नजर में अलग-अलग स्थितियां हैं। इसलिए कम conviction rate को सीधे “फर्जी मुकदमों” की संख्या बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
फिर भी रवि किशन की एक साल पुरानी मांग का महत्व इसी जगह दिखाई देता है। यदि कोई व्यक्ति कानून का इस्तेमाल वास्तविक अत्याचार से सुरक्षा के लिए करता है तो उसे संरक्षण मिलना चाहिए, लेकिन यदि जांच के बाद आरोप जानबूझकर झूठे पाए जाते हैं तो शिकायतकर्ता और जांच प्रक्रिया की जवाबदेही पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। कानून कमजोर नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल में निष्पक्षता मजबूत हो—यही उस बहस का मूल प्रश्न है।
दिलचस्प यह भी है कि संसद के पुराने रिकॉर्ड में सरकार से इसी कानून के तहत “fake cases” के आंकड़ों के बारे में सवाल पहले भी पूछे जा चुके हैं। 2012 के एक संसदीय जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया था कि NCRB अलग से “fake cases” का आंकड़ा नहीं रखता था; वह “Charge found False/Mistake of Fact or Law etc.” जैसी श्रेणी में आंकड़े दर्ज करता था।
यानी असली चुनौती सिर्फ मुकदमों की संख्या गिनना नहीं, बल्कि हर मुकदमे के परिणाम तक पहुंचना है—कितने आरोप सही पाए गए, कितने में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले, कितने मामलों में आरोपी बरी हुए और कितने मामलों में शिकायत या आरोप जानबूझकर गलत पाए गए। जब तक इन श्रेणियों का अलग-अलग और पारदर्शी राष्ट्रीय आंकड़ा सामने नहीं आता, “फर्जी मुकदमों” की वास्तविक संख्या बताने का दावा करना जल्दबाजी होगा।
रवि किशन ने दिसंबर 2025 में जिस सवाल को संसद के पटल पर रखा था, वह आज भी अपनी जगह कायम है—कानून पीड़ित की ढाल बने, लेकिन किसी निर्दोष को फंसाने का हथियार न बने। अब जरूरत इस बात की है कि बहस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़े और सरकार तथा जांच एजेंसियां ऐसे मामलों का पारदर्शी आंकड़ा सामने रखें, ताकि न्याय सिर्फ दर्ज मुकदमों में नहीं, बल्कि उनके अंतिम परिणाम में भी दिखाई दे।