दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ।शरद पूर्णिमा के पावन पर्व पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह ने समस्त राष्ट्रवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए राष्ट्र के सर्वतोमुखी अभ्युदय, जन-जन के कल्याण तथा प्रत्येक परिवार के सुख, शांति एवं समृद्धि की मंगलकामना की। उन्होंने कहा कि शरद पूर्णिमा भारतीय सनातन संस्कृति की आध्यात्मिक गरिमा, धार्मिक आस्था और सनातन चेतना का अनुपम महापर्व है, जिसकी दिव्य आभा भारतीय सभ्यता की चिरंतन परंपराओं को आलोकित करती है। शरद ऋतु की निर्मल रात्रि में चंद्रमा की धवल चंद्रिका प्रकृति के सौंदर्य को अलौकिक आभा प्रदान करती है। सनातन परंपरा में यह पर्व पूर्णता, पवित्रता, शीतलता और आध्यात्मिक उत्कर्ष का प्रतीक माना जाता है। यह पावन अवसर मनुष्य को अंतर्मन की शुचिता, विचारों की सात्त्विकता और आचरण की उदात्तता का बोध कराते हुए अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए प्रेरित करता है।
शरद पूर्णिमा के धार्मिक एवं आध्यात्मिक महात्म्य को रेखांकित करते हुए जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि सनातन धर्म की समृद्ध उपासना परंपरा में इस पर्व का विशिष्ट स्थान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन तिथि पर चंद्रदेव की आराधना तथा धन-धान्य एवं ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी की उपासना का विशेष महत्त्व है। शरद पूर्णिमा की रात्रि को भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य महारास लीला के स्मरण से भी जोड़ा जाता है, जो जीवात्मा और परमात्मा के आध्यात्मिक संबंध, निष्काम प्रेम तथा अनन्य भक्ति की विलक्षण अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म की महत्ता उसकी चिरस्थायी जीवनदृष्टि, उदात्त मानवीय मूल्यों और समस्त सृष्टि के कल्याण की मंगलकामना में निहित है। हमारी सांस्कृतिक परंपराएं केवल धार्मिक अनुष्ठानों का विधान नहीं, अपितु लोकमंगल, सदाचार, करुणा, परोपकार और आत्मानुशासन की ऐसी जीवनपद्धति हैं, जो व्यक्ति के चरित्र का परिष्कार करते हुए समाज को नैतिक एवं आध्यात्मिक दृढ़ता प्रदान करती हैं।
राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष ने राष्ट्रवासियों से आह्वान किया कि वे शरद पूर्णिमा के इस पुण्य अवसर पर सनातन संस्कृति के शाश्वत आदर्शों को आत्मसात करते हुए सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकात्मता और सांस्कृतिक अस्मिता के संरक्षण का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि भारत की सनातन परंपरा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ के उदात्त उद्घोष के माध्यम से समस्त मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। राष्ट्र की वास्तविक उन्नति तभी सार्थक होगी, जब आध्यात्मिक चेतना के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व, सांस्कृतिक गौरव के साथ नैतिक आचरण तथा व्यक्तिगत प्रगति के साथ लोककल्याण की भावना का समन्वय स्थापित होगा। उन्होंने मंगलकामना की कि शरद पूर्णिमा की अमृतमयी चंद्रिका प्रत्येक भारतीय के जीवन में सुख-सौभाग्य, शांति, सद्बुद्धि और समृद्धि का संचार करे, सनातन संस्कृति की दिव्य पताका सदैव गौरवपूर्वक लहराती रहे तथा भारतवर्ष विश्वपटल पर अपनी आध्यात्मिक महत्ता, सांस्कृतिक वैभव और मानवीय आदर्शों से निरंतर यश एवं कीर्ति अर्जित करता रहे।