मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बोले—शिक्षक केवल ज्ञान का संवाहक नहीं, समाज की चेतना और युग का निर्माता है; पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की तपःसाधना ने सनातन मूल्यों को जनचेतना से जोड़ा, अब ‘इदम् राष्ट्राय स्वाहा’ के भाव से नई पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण की दिशा देनी होगी

दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली। अखिल विश्व गायत्री परिवार, शान्तिकुञ्ज हरिद्वार के तत्वावधान में आयोजित प्रान्तीय शिक्षक गरिमा कार्यशाला में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिक्षक की भूमिका को केवल कक्षा और पाठ्यक्रम तक सीमित मानने से इनकार करते हुए उसे समाज की चेतना, संस्कार और राष्ट्र के भविष्य से जोड़ा। उन्होंने कहा कि शिक्षक विद्यार्थियों को केवल शिक्षा नहीं देता, बल्कि नई पीढ़ी को संस्कार, दिशा और राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव प्रदान करता है। उनका स्पष्ट संदेश था कि यदि भारत का शिक्षक जागृत होकर अपने दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन करे, तो भारत को विश्वगुरु बनने में देर नहीं लगेगी। लेकिन मुख्यमंत्री के संबोधन का सबसे व्यापक संदेश शिक्षक की भूमिका से आगे बढ़कर उस वैचारिक परम्परा तक पहुंचा, जिसकी जड़ें पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की तपःसाधना में दिखाई देती हैं।

कार्यशाला के मंच से मुख्यमंत्री ने गायत्री परिवार के संस्थापक परम पूज्य तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य और उनकी साधना की अभिन्न सहयोगिनी माता भगवती देवी शर्मा की स्मृतियों को नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। दीप प्रज्वलित कर कार्यशाला का शुभारम्भ करने के साथ उन्होंने भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा में उत्तर प्रदेश में शीर्ष दस स्थान प्राप्त करने वाले विद्यालयों के शिक्षकों का सम्मान किया तथा ‘युग निर्माताओं से युग ऋषि का आह्वान’ स्मारिका का विमोचन किया। इस सम्मान और स्मरण के बीच मुख्यमंत्री ने जिस व्यक्तित्व का उल्लेख किया, वह उनके संबोधन का वैचारिक केन्द्र बन गया—लगभग एक शताब्दी पूर्व अपनी साधना से भारतीय सांस्कृतिक चेतना को पुनर्जीवित करने वाले पं. श्रीराम शर्मा आचार्य।

मुख्यमंत्री ने कहा कि लगभग 100 वर्ष पूर्व पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपनी साधना के माध्यम से भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्यों और भारतीय परम्पराओं के प्रति आस्था रखने वाले ऋषि के रूप में अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने मथुरा से साधना का आरम्भ किया और हरिद्वार में इस पवित्र संस्था की स्थापना कर देश की सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने का अभियान आगे बढ़ाया। मुख्यमंत्री के शब्दों में यह केवल किसी संस्था के संस्थापक का स्मरण नहीं था, बल्कि उस विचार-परम्परा की ओर संकेत था जिसने आध्यात्मिक साधना को सामाजिक चेतना और राष्ट्रहित से जोड़ने का प्रयास किया।

इसी क्रम में उन्होंने अखिल विश्व गायत्री परिवार के सामाजिक विस्तार को रेखांकित करते हुए कहा कि यज्ञों के माध्यम से सर्वसमाज को एक मंच और एक वेदी पर बैठाकर सामाजिक एकता का आदर्श प्रस्तुत किया गया है। यज्ञ की वेदी पर विभिन्न वर्गों के लोगों का एक साथ बैठना उनके लिए केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अनुभूति को व्यवहार में उतारने का माध्यम है। यही वह बिंदु था, जहां मुख्यमंत्री ने आध्यात्मिक चेतना को सामाजिक एकता और फिर राष्ट्रीय एकता से जोड़ते हुए शिक्षक की भूमिका को निर्णायक बताया।

योगी आदित्यनाथ ने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ प्रस्तुत करते हुए कहा कि वर्ष 1923 में गोरखपुर गीता प्रेस, वर्ष 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और वर्ष 1926 में अखिल विश्व गायत्री परिवार की स्थापना हुई। तीनों संस्थाओं के कार्यक्षेत्र और कार्यपद्धतियां अलग-अलग रहीं, लेकिन मुख्यमंत्री के अनुसार जनचेतना जागृत करने, समाज को सनातन मूल्यों से जोड़ने तथा भारत और भारतीयता का बोध कराने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी रहे थे। इतिहास के इसी संदर्भ से मुख्यमंत्री ने वर्तमान पीढ़ी के सामने यह प्रश्न रखा कि स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र निर्माण की अगली यात्रा में समाज और विशेषकर शिक्षक अपनी भूमिका किस प्रकार परिभाषित करेंगे।
गायत्री मंत्र की आध्यात्मिक महत्ता का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि अनेक ऋषियों ने भौतिक शक्ति के साथ आध्यात्मिक शक्ति की आवश्यकता को समझा और साधना के माध्यम से समाज में नई चेतना का संचार किया। उन्होंने महर्षि विश्वामित्र द्वारा रचित गायत्री मंत्र को परमपिता परमेश्वर के तेज से जुड़ने का आह्वान बताया और कहा कि इसी पवित्र मंत्र की शक्ति को समाज तक पहुंचाने के उद्देश्य से गायत्री परिवार का विस्तार हुआ। उनके संबोधन में गायत्री मंत्र केवल आध्यात्मिक साधना का प्रतीक बनकर नहीं आया, बल्कि आत्मशोधन, चेतना-जागरण और सामाजिक उत्तरदायित्व की व्यापक अवधारणा से जुड़ता दिखाई दिया।
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के व्यक्तित्व का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने एक ऐसा सूत्र प्रस्तुत किया, जो पूरे संबोधन की दार्शनिक धुरी बन गया। उन्होंने कहा कि आचार्य संगठन का नाम अपने नाम पर रख सकते थे, लेकिन उन्होंने व्यक्ति से बड़े परिवार और विचार को महत्व दिया। “व्यक्ति समाप्त हो सकता है, लेकिन विचार समाप्त नहीं होता”—मुख्यमंत्री ने इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए कहा कि शब्द ब्रह्म है और अखिल विश्व गायत्री परिवार उस विचार का प्रतीक है। आचार्य की तपःपरम्परा को इस दृष्टि से देखने पर उनका योगदान किसी एक कालखंड या संस्था की सीमाओं में बंधा हुआ नहीं दिखाई देता, बल्कि विचार की निरंतरता के रूप में सामने आता है।
मुख्यमंत्री ने परिवार व्यवस्था में आए परिवर्तन को भी सामाजिक चेतना की चुनौती से जोड़ा। उन्होंने कहा कि कभी संयुक्त परिवार समाज की सबसे बड़ी ताकत हुआ करते थे और सुख-दुःख तथा संकट के समय पूरा परिवार एक साथ खड़ा रहता था, लेकिन आज परिवार सीमित और विभाजित होते जा रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में समाज को जोड़ने वाली संस्थाओं की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने कहा कि छोटे बच्चों को गायत्री मंत्र का उच्चारण करते देखना नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ने की संभावना को दर्शाता है और सामाजिक बिखराव को रोकने की जिम्मेदारी भी ऐसी संस्थाओं को उठानी होगी।
योगी आदित्यनाथ ने धर्म और विज्ञान के संबंध पर पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की दृष्टि का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने धर्म को विज्ञान से अलग नहीं माना, बल्कि दोनों को परस्पर सहयोगी के रूप में देखा। इसी संदर्भ में उन्होंने देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार के प्रति कुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या का उल्लेख किया, जो आधुनिक चिकित्सा के चिकित्सक होने के साथ अखिल विश्व गायत्री परिवार के अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं। मंच पर उपस्थित यह नेतृत्व-परम्परा मुख्यमंत्री के उस विचार को पुष्ट करती रही जिसमें प्राचीन आध्यात्मिक दृष्टि और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया।
भारत की गुरु-शिष्य परम्परा को भारतीय ज्ञान-परम्परा की आधारशिला बताते हुए मुख्यमंत्री ने तक्षशिला और नालन्दा जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों का उल्लेख किया। उन्होंने चाणक्य-चन्द्रगुप्त, महर्षि वशिष्ठ-श्रीराम तथा महर्षि संदीपन-श्रीकृष्ण-सुदामा की परम्परा को स्मरण करते हुए कहा कि भारत के श्रेष्ठ आचार्यों की परम्परा ने केवल ज्ञान नहीं दिया, बल्कि चरित्र और नेतृत्व का निर्माण किया। इसी परम्परा को वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में जीवित रखना शिक्षक समाज के सामने सबसे महत्वपूर्ण दायित्वों में से एक है।
युवाओं के संदर्भ में मुख्यमंत्री ने गायत्री परिवार द्वारा आयोजित प्रतियोगिता का उल्लेख करते हुए बताया कि शिक्षक समाज के साथ 11 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं इससे जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को आगे बढ़ाना, उसका मार्गदर्शन करना और उसे प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना आवश्यक है, क्योंकि आज का युवा ही भारत के भाग्य का विधाता बनने वाला है। यह संख्या केवल सहभागिता का आंकड़ा नहीं, बल्कि नई पीढ़ी तक संस्कार, ज्ञान और राष्ट्रीय चेतना पहुंचाने की व्यापक संभावना का संकेत भी है।
इसके बाद मुख्यमंत्री का संबोधन सीधे उस प्रश्न पर पहुंचा कि आखिर भारत कैसा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह तय करना होगा कि देश ऐसा हो जो बिखरा हुआ हो, जातीय खेमों में विभाजित हो और आपस में संघर्ष करता रहे, अथवा ऐसा भारत बने जो एक हो और श्रेष्ठ भारत हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के संकल्प का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इसे साकार करने के लिए सभी को मिलकर कार्य करना होगा। मुख्यमंत्री ने जाति, क्षेत्र, भाषा तथा विभिन्न प्रकार के वादों के आधार पर समाज की एकता को छिन्न-भिन्न करने के प्रयासों से सावधान करते हुए शिक्षक समाज को विशेष उत्तरदायित्व निभाने का आह्वान किया।
राष्ट्र और समाज की एकता के इसी संदर्भ में उन्होंने स्वतंत्रता कालखंड की चुनौतियों को याद करते हुए कहा कि उस समय भी एक वर्ग समाज को बांटने का कार्य कर रहा था, जबकि दूसरा वर्ग समाज को जोड़ते हुए एकता की शक्ति से स्वतंत्रता की हुंकार को सुदृढ़ कर रहा था। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज भी ऐसी शक्तियां मौजूद हैं जो जाति, क्षेत्र, भाषा और विभिन्न प्रकार के वादों के आधार पर सामाजिक एकता को कमजोर करने का प्रयास करती हैं। उनके अनुसार शिक्षक समाज की जिम्मेदारी और बड़ी हो जाती है कि विभाजनकारी प्रवृत्तियों को सफल न होने दिया जाए।
प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण पर आते हुए मुख्यमंत्री ने यज्ञ के ‘इदम् न मम’ भाव को व्यापक सामाजिक दर्शन से जोड़ा। उन्होंने कहा कि यज्ञ हमें यह सिखाता है कि यह मेरा नहीं है, बल्कि प्रकृति का है। सूर्य प्रकाश देने में भेदभाव नहीं करता, वृक्ष फल देने में भेदभाव नहीं करता और गंगा किसी के साथ भेदभाव नहीं करती। इसलिए प्रकृति से जितना लिया जाए, उससे अधिक उसके संरक्षण के लिए समर्पित करने की संस्कृति विकसित करनी होगी। उनके अनुसार यही भाव समाज को जोड़ते हुए सामाजिक एकता से राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने की प्रेरणा दे सकता है और इसमें शिक्षक समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश सरकार के पौधरोपण अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2017 से वर्ष 2026 तक प्रदेश में 275 करोड़ पौधरोपण किया गया है और इस वर्ष भी 35 करोड़ पौधे लगाए गए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार केवल पौधरोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि पौधों के संरक्षण और सुरक्षा की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जा रही है। इसके लिए फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, देहरादून तथा गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ को थर्ड पार्टी के रूप में जोड़े जाने और उनके द्वारा पौधरोपण एवं संरक्षण की स्थिति की रिपोर्ट दिए जाने की जानकारी भी उन्होंने दी। पर्यावरण की चर्चा यहीं समाप्त नहीं हुई, क्योंकि मुख्यमंत्री ने इसके बाद जीवन की धमनियों के रूप में नदियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया।
नदियों के प्रदूषण को बड़ी चुनौती बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि स्वार्थ के कारण नदी संस्कृति को नुकसान पहुंचाया गया है। जीवनदायिनी नदियों के अस्तित्व पर संकट का अर्थ जीवन के सामने नए संकट का खड़ा होना है। उन्होंने नदियों की भूमिका की तुलना मानव शरीर की धमनियों से करते हुए कहा कि इन्हें बचाना और अविरल तथा निर्मल बनाना आवश्यक है। उन्होंने एक जनपद में वर्षों पूर्व सूख चुकी नदी के पुनर्जीवन का उदाहरण भी दिया, जहां सेटेलाइट मैपिंग के माध्यम से नदी की पुरानी तस्वीरें प्राप्त कर उसी के अनुरूप खुदाई कराई गई और वर्षा के बाद वहां पुनः जलधारा प्रवाहित हुई। मुख्यमंत्री ने इसे पूर्वजों की तपस्या और उनके आशीर्वाद से जोड़ते हुए कृतज्ञता के भाव को समाज की बड़ी शक्ति बताया।
संबोधन के अंतिम चरण में मुख्यमंत्री ने गायत्री परिवार के सामने अगले 100 वर्षों की रूपरेखा का प्रश्न रखा। उन्होंने कहा कि पिछले 100 वर्षों में यज्ञ की वेदी के माध्यम से संस्था ने समाज की चेतना को जागृत करने में बड़ी भूमिका निभाई है, लेकिन पं. श्रीराम शर्मा आचार्य और माता भगवती देवी शर्मा के आगामी 100 वर्षों के लक्ष्य को अभी से निर्धारित करना होगा। उन्होंने डॉ. चिन्मय पण्ड्या जैसे सहज, सरल और दूरदर्शी नेतृत्व तथा डॉ. प्रणव पण्ड्या के मार्गदर्शन में संस्था को भविष्य के लक्ष्य निर्धारित करने का आह्वान किया। अब लक्ष्य केवल भारत के प्रत्येक क्षेत्र तक पहुंच बनाने का नहीं, बल्कि विश्वभर में तनाव और संघर्ष से जूझ रही मानवता के जीवन में नई रोशनी पहुंचाने का होना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने प्रदेश के शिक्षकों से कार्यशाला में प्राप्त संदेशों और विचारों को निश्चित समय-सीमा में धरातल पर उतारने तथा युवा पीढ़ी को सही दिशा देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार के संस्थापकों की भावनाओं के अनुरूप इस पवित्र अभियान में शिक्षकों की सहभागिता नई पीढ़ी के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। उन्होंने योग को इसका उदाहरण बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से योग को वैश्विक स्तर पर मान्यता मिली और 21 जून को विश्व के लगभग 190 देशों में लोग अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस से जुड़ते हैं। मुख्यमंत्री ने इसे भारत की ऋषि परम्परा की वैश्विक स्वीकार्यता का उदाहरण बताते हुए कहा कि भारत को अपनी विरासत पर गौरव करते हुए विश्व का नेतृत्व करने की दिशा में स्वयं को तैयार करना होगा।
कार्यक्रम में विधान परिषद सदस्य डॉ. महेंद्र सिंह ने भी अपने विचार रखते हुए शिक्षक समाज की भूमिका, भारतीय संस्कृति और सामाजिक चेतना के परस्पर संबंध को रेखांकित किया। उन्होंने कार्यशाला के उद्देश्य के अनुरूप शिक्षकों को नई पीढ़ी के निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम बताया और इस प्रकार के आयोजनों को शिक्षा के साथ संस्कार एवं मूल्यबोध के विस्तार की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया। वहीं जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने भी अपने संबोधन में समाज, संस्कृति, पर्यावरण और राष्ट्रहित से जुड़े विषयों पर विचार रखे तथा कार्यशाला के माध्यम से शिक्षक समाज तक पहुंचाए जा रहे संदेशों की महत्ता को रेखांकित किया। दोनों जनप्रतिनिधियों की सहभागिता ने कार्यक्रम के विमर्श को शिक्षा और आध्यात्मिक चेतना से आगे बढ़ाकर सामाजिक उत्तरदायित्व और लोककल्याण के व्यापक परिप्रेक्ष्य से जोड़ दिया।
2047 के भारत की परिकल्पना को संबोधन के अंतिम संदेश से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि स्वतंत्रता के शताब्दी महोत्सव तक पहुंचने के लिए गुलामी की मानसिकता का परित्याग, अपनी विरासत पर गौरव, सामाजिक समता के लिए प्रयास, विकसित भारत के संकल्प को आगे बढ़ाना और नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजगता आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अधिकारों से अधिक अपने कर्तव्यों को महत्व देना होगा। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार हो जाए, तो दुनिया की कोई शक्ति भारत की ओर आंख उठाकर नहीं देख सकती।
और अंततः मुख्यमंत्री के संबोधन का सार उस यज्ञीय चेतना में संकेंद्रित दिखाई दिया, जिसे उन्होंने ‘इदम् न मम’ से ‘इदम् राष्ट्राय स्वाहा’ तक विस्तृत करने का आह्वान किया। उनके अनुसार राष्ट्र निर्माण केवल नीतियों और योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के भीतर कर्तव्य, संस्कार, त्याग और समर्पण की चेतना जागृत करने की सतत प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया में शिक्षक ज्ञान के संवाहक से आगे बढ़कर युग-निर्माता की भूमिका ग्रहण करता है, गायत्री परिवार अपनी शताब्दी यात्रा के अनुभवों को आगामी शताब्दी के संकल्प में रूपांतरित करता है और पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की तपःपरम्परा एक ऐसे विचार-दीप के रूप में सामने आती है, जिसकी ज्योति आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बन सकती है। मुख्यमंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि वर्ष 2047 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी पूर्ण करेगा, तब कर्तव्यबोध, सांस्कृतिक आत्मगौरव, सामाजिक समरसता और राष्ट्रसमर्पण से आलोकित भारत की परिकल्पना साकार रूप ले चुकी होगी।