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सड़क किनारे कचरे का पहाड़ देख हाईकोर्ट सख्त, नगर निगम को स्थायी समाधान का आदेश

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सड़क किनारे कचरे का पहाड़ देख हाईकोर्ट सख्त, नगर निगम को स्थायी समाधान का आदेश

ब्रह्मनगर में खुले में कूड़ा फैलाने पर लखनऊ पीठ की तल्ख टिप्पणी—कहा, सड़क के पास इस तरह कचरा बिखरा रहना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं; वैकल्पिक स्थल तलाशने और कॉम्पेक्टर लगाने की संभावना पर भी विचार के निर्देश

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दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ। राजधानी लखनऊ में सड़क किनारे खुले में कचरा डंप किए जाने की तस्वीरें जब हाईकोर्ट के सामने पहुंचीं तो नगर निगम की सफाई व्यवस्था को लेकर अदालत का रुख कठोर हो गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ब्रह्मनगर क्षेत्र में  कबीर मंदिर सड़क से लगी खुली भूमि पर बिखरे कचरे की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट किया कि इस प्रकार कचरा फैलाया जाना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता। न्यायालय ने नगर आयुक्त, लखनऊ को समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में तत्काल कदम उठाने के साथ यह तलाशने का निर्देश दिया है कि कचरा डंप करने के लिए किसी अन्य स्थान की व्यवस्था संभव है या नहीं। जरूरत पड़ने पर कॉम्पेक्टर लगाए जाने की संभावना पर भी विचार करने को कहा गया है। अदालत की इस टिप्पणी ने अब पूरे मामले को केवल सफाई व्यवस्था से आगे सार्वजनिक स्वास्थ्य और नगर प्रबंधन की जिम्मेदारी से जोड़ दिया है।

मामला पीआईएल संख्या 841/2026, कुलदीप बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य से संबंधित है। याचिका में आरोप लगाया गया कि लखनऊ के ब्रह्मनगर, मड़ियांव क्षेत्र में  के सामने तथा सीतापुर रोड के निकट खुले स्थान पर नगर निगम द्वारा कचरा डंप किया जा रहा है। इससे आसपास रहने वाले लोगों और वहां से गुजरने वाले राहगीरों को दुर्गंध तथा अस्वच्छ वातावरण का सामना करना पड़ रहा है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक कुमार बाजपेई ने न्यायालय के समक्ष पक्ष रखा। लेकिन सुनवाई के दौरान जो तस्वीरें अदालत के सामने आईं, उन्होंने शिकायत में दर्ज स्थिति को और गंभीर बना दिया।

नगर निगम की ओर से न्यायालय के समक्ष तस्वीरें प्रस्तुत की गईं। पीठ ने जब इन तस्वीरों का अवलोकन किया तो उसने पाया कि वास्तविक स्थिति याचिका में बताए गए हालात से भी खराब है। अदालत के आदेश में दर्ज है कि कचरा केवल खुले स्थान पर डाला नहीं जा रहा, बल्कि सड़क से लगी जमीन पर बिखरा हुआ है और खुले तौर पर दिखाई दे रहा है। इस दृश्य ने न्यायालय को यह कहने के लिए विवश किया कि ऐसी स्थिति से उत्पन्न दुर्गंध और गंदगी वहां रहने वाले लोगों के साथ-साथ आने-जाने वाले लोगों के स्वास्थ्य और स्वच्छता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

मामले में नगर निगम की ओर से यह पक्ष रखा गया कि कचरा किसी आवासीय क्षेत्र में नहीं, बल्कि राजमार्ग के किनारे डाला जा रहा है। हालांकि, न्यायालय ने इस तर्क को स्थिति की स्वीकार्यता का आधार नहीं माना। पीठ ने अपने आदेश में साफ शब्दों में कहा कि किसी भी कल्पना के आधार पर सड़क के पास इस प्रकार कचरा फैलाया जाना स्वीकार्य नहीं हो सकता। अदालत की यह टिप्पणी उस बिंदु पर महत्वपूर्ण है, जहां खुले में कचरा डंप करने की जगह और उसके आसपास की आबादी के बीच की दूरी को व्यवस्था का औचित्य मानने के बजाय स्वयं स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रश्न को केंद्र में रखा गया।

न्यायालय ने इसके बाद केवल तत्काल सफाई कराने के बजाय स्थायी समाधान खोजने पर जोर दिया। नगर आयुक्त, लखनऊ को यह तलाशने के लिए कहा गया है कि वर्तमान स्थान के बजाय किसी अन्य स्थल पर कचरा डंप किए जाने की व्यवस्था की जा सकती है या नहीं। यदि किसी वैकल्पिक व्यवस्था में कचरे के प्रबंधन को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए कॉम्पेक्टर स्थापित करना संभव हो, तो उस दिशा में भी आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है। अदालत का निर्देश स्पष्ट करता है कि समस्या का समाधान केवल कचरा उठाकर दूसरे दिन फिर उसी स्थान पर जमा कर देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि स्थायी व्यवस्था लागू होने तक लोगों के स्वास्थ्य और स्वच्छता की सुरक्षा के लिए अस्थायी उपाय किए जाएं। यानी अगली व्यवस्था तैयार होने तक वर्तमान स्थिति को यूं ही छोड़ देने की गुंजाइश नहीं है। नगर निगम को अब ऐसी कार्रवाई करनी होगी जिससे खुले में फैले कचरे से उत्पन्न अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों को नियंत्रित किया जा सके और आसपास के लोगों को राहत मिल सके।

इस आदेश का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 30 सितंबर 2026 है, जब मामले को पुनः सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। न्यायालय ने नगर निगम को पर्याप्त और त्वरित कदम उठाने का निर्देश दिया है। ऐसे में अगली सुनवाई में इस बात पर नजर रहेगी कि आदेश के बाद मौके की स्थिति में कितना परिवर्तन आया और स्थायी समाधान की दिशा में नगर निगम ने क्या ठोस कदम उठाए।

3 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की खंडपीठ द्वारा पारित यह आदेश राजधानी की स्वच्छता व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी के रूप में सामने आया है। अदालत ने किसी प्रशासनिक दावे पर निर्भर रहने के बजाय मौके की तस्वीरों में दिखाई दे रही स्थिति को अपने सामने रखकर दिशा-निर्देश दिए हैं। अब असली कसौटी यह होगी कि 30 सितंबर को अदालत के सामने कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि ब्रह्मनगर की सड़क किनारे की जमीन पर बदली हुई तस्वीर कितनी स्पष्ट दिखाई देती है।

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