सुलतानपुर में भू-स्वामियों की शिकायत से गरमाया मामला; बिना आवश्यक अनुमति भूमि हस्तांतरण, राजस्व अभिलेखों में नामांतरण और मुआवजा भुगतान की प्रक्रिया पर सवाल, एनएचएआई से संबंधित अभिलेखों की भी जांच की मांग
दैनिक इंडिया न्यूज़, सुलतानपुर। भूमि अधिग्रहण के एवज में मिलने वाले मुआवजे की धनराशि को लेकर सुलतानपुर में सामने आया विवाद अब महज भूमि स्वामित्व के दावे-प्रतिदावे तक सीमित नहीं रह गया है। लगभग 1.04 करोड़ रुपये के मुआवजे से जुड़े इस प्रकरण में कई भू-स्वामियों ने मुख्यमंत्री और जिलाधिकारी से शिकायत कर ऐसी जांच की मांग की है, जो बैनामे की वैधता से लेकर राजस्व अभिलेखों में हुए नामांतरण और अंततः मुआवजा भुगतान तक की पूरी श्रृंखला को जांच के केंद्र में ला सके। शिकायत में होंडा एजेंसी के संचालक विजय अग्रवाल सहित संबंधित पक्षों के विरुद्ध विभिन्न आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन शिकायत में उठाए गए दस्तावेजी प्रश्नों ने पूरे प्रकरण की प्रशासनिक पड़ताल को महत्वपूर्ण बना दिया है।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कुछ अनुसूचित जाति के भू-स्वामियों की भूमि का कथित रूप से आवश्यक अनुमति के बिना बैनामा कराया गया और उसके बाद राजस्व अभिलेखों में दाखिल-खारिज की प्रक्रिया भी पूरी कर दी गई। यहीं से मामले का वह पक्ष सामने आता है, जिसकी अगली कड़ी सीधे करोड़ों रुपये की भूमि-अधिग्रहण प्रक्रिया से जुड़ती है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, जिस भूमि के हस्तांतरण की वैधता पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं, उसी भूमि के अधिग्रहण से संबंधित करीब 1.04 करोड़ रुपये का मुआवजा दूसरे पक्ष को प्राप्त हो गया। अब मूल प्रश्न यह है कि मुआवजा निर्धारित और वितरित करते समय संबंधित अभिलेखों में स्वामित्व की स्थिति को किस आधार पर स्वीकार किया गया।
यही प्रश्न इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील बिंदु बनकर उभरता है—मुआवजे की धनराशि आखिर किसके नाम स्वीकृत हुई, किस आधार पर भुगतान का आदेश हुआ और वह राशि किस बैंक खाते में पहुंची? शिकायतकर्ताओं के अनुसार, विवाद सामने आने के बाद तत्कालीन मुख्य राजस्व अधिकारी के स्तर से संबंधित बैंक खाते को सीज किए जाने की कार्रवाई भी की गई थी। यदि ऐसा हुआ था तो उसके बाद मुआवजा राशि के संबंध में क्या कार्रवाई की गई, धनराशि की वर्तमान स्थिति क्या है और संबंधित प्रशासनिक आदेशों में क्या दर्ज है—इन प्रश्नों का उत्तर अब मूल पत्रावलियों और बैंक अभिलेखों से ही मिल सकता है।
लेकिन विवाद की परतें यहीं समाप्त होती दिखाई नहीं देतीं। शिकायत में तत्कालीन तहसीलदार के.डी. यादव सहित संबंधित राजस्व अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी प्रश्न उठाए गए हैं। आरोप यह है कि विवादित भूमि का बैनामा होने के बाद दाखिल-खारिज की प्रक्रिया पूरी कर दी गई। ऐसे में जांच के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी वही होगी, जहां बैनामे के बाद राजस्व अभिलेखों में स्वामित्व परिवर्तन दर्ज हुआ। यदि संबंधित भूमि के हस्तांतरण के लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति अनिवार्य थी, तो उस अनुमति का अभिलेख कहां है और यदि अनुमति नहीं थी तो नामांतरण किस विधिक आधार पर हुआ—यही प्रश्न अब पूरे राजस्व तंत्र की प्रक्रिया को परखने की कसौटी बन गया है।
इस प्रकरण की एक और कड़ी भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) से जुड़ती है। शिकायत में तत्कालीन एनएचएआई के एक प्रभारी अधिकारी की कथित भूमिका अथवा सहमति को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि भूमि अधिग्रहण और मुआवजा निर्धारण की प्रक्रिया में संबंधित स्तर पर हुई कार्रवाई की भी पड़ताल होनी चाहिए। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए वास्तविक स्थिति जानने के लिए एनएचएआई की मूल अधिग्रहण पत्रावली, अवार्ड, मुआवजा निर्धारण के दस्तावेज, भुगतान संबंधी अभिलेख और अधिकारियों की नोटशीट का परीक्षण निर्णायक महत्व रखता है। इन्हीं दस्तावेजों से यह स्पष्ट हो सकेगा कि मुआवजे की प्रक्रिया किन तथ्यों और अभिलेखों के आधार पर आगे बढ़ी।
मामला प्रशासनिक स्तर पर आगे बढ़ते हुए कमिश्नर स्तर तक पहुंचने की बात भी शिकायतकर्ताओं ने कही है। उनके अनुसार, कमिश्नर के समक्ष हुई कार्यवाही के बाद पत्रावली पुनः तहसील सदर में सुनवाई के लिए भेजी गई। अब इस वापसी ने प्रकरण को एक बार फिर स्थानीय राजस्व न्यायिक प्रक्रिया के केंद्र में ला दिया है। तहसील में होने वाली आगामी कार्यवाही में यदि बैनामे, अनुमति, दाखिल-खारिज, स्वामित्व और मुआवजा भुगतान की पत्रावलियों को एक साथ रखकर परीक्षण किया जाता है, तो विवाद की वे कड़ियां सामने आ सकती हैं जो अभी आरोपों और दावों के बीच छिपी हुई हैं।
इसी बीच शिकायत में एजेंसी परिसर में बिना स्वीकृत मानचित्र भवन निर्माण किए जाने का एक अलग आरोप भी लगाया गया है। शिकायतकर्ताओं ने संबंधित भवन का स्वीकृत मानचित्र, निर्माण अनुमति और अन्य वैधानिक अभिलेखों की जांच कराने की मांग की है। इस आरोप की भी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है; इसलिए इसकी वास्तविकता संबंधित नगर निकाय अथवा विकास प्राधिकरण के अभिलेखों के परीक्षण से ही निर्धारित की जा सकती है। भूमि से आरंभ हुआ यह विवाद अब यदि भवन निर्माण संबंधी अभिलेखों तक भी पहुंचता है, तो जांच का दायरा स्वाभाविक रूप से और विस्तृत हो सकता है।
पूरे मामले में अब कई प्रश्न एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई दे रहे हैं—भूमि का बैनामा किस अनुमति के आधार पर हुआ, दाखिल-खारिज किस आदेश के तहत किया गया, लगभग 1.04 करोड़ रुपये का मुआवजा किसके नाम स्वीकृत हुआ, भुगतान किस खाते में पहुंचा, खाते को सीज किए जाने के बाद क्या कार्रवाई हुई और एनएचएआई की पत्रावली में संबंधित अधिकारियों की भूमिका क्या रही। इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण होगा कि विवादित भूमि के मूल भू-स्वामियों के दावों का परीक्षण किस स्तर पर और किन अभिलेखों के आधार पर किया गया।
भू-स्वामियों ने मुख्यमंत्री और जिलाधिकारी से पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच, मुआवजा भुगतान की समीक्षा तथा जांच में यदि नियमविरुद्ध भुगतान अथवा अनुचित लाभ प्राप्त किए जाने की पुष्टि हो तो नियमानुसार वसूली और जिम्मेदार व्यक्तियों एवं अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है। फिलहाल शिकायत में लगाए गए आरोप जांच के अधीन हैं और उनका स्वतंत्र सत्यापन नहीं हुआ है। इसलिए इस पूरे प्रकरण में निर्णायक महत्व अब उन सरकारी और राजस्व अभिलेखों का है, जिनमें बैनामे से लेकर नामांतरण और मुआवजे के भुगतान तक की प्रत्येक कड़ी दर्ज होनी चाहिए। यदि इन दस्तावेजों की समग्र जांच होती है, तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि लगभग 1.04 करोड़ रुपये के इस मुआवजे तक पहुंचने वाली प्रक्रिया में वास्तव में क्या हुआ था।