लखनऊ के भोजपुरी महोत्सव से उठी बड़ी आवाज,भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा, अकादमी के गठन और छठ पर राष्ट्रीय अवकाश की मांग; 42 वर्षों से भाषा-संस्कृति के संरक्षण में जुटा अखिल भारतीय भोजपुरी समाज

दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।लखनऊ में भोजपुरी की सांस्कृतिक शक्ति शनिवार को राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के एक बड़े मंच में बदल गई। विश्वेश्वरैया प्रेक्षागृह में आयोजित भोजपुरी महोत्सव में लोकगीतों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच भोजपुरी भाषा को संवैधानिक दर्जा देने, भोजपुरी अकादमी के गठन तथा छठ महापर्व पर राष्ट्रीय अवकाश की मांग ने प्रमुखता से स्थान पाया। अखिल भारतीय भोजपुरी समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रभुनाथ राय के नेतृत्व में आयोजित इस आयोजन में सत्ता, प्रशासन, चिकित्सा, शिक्षा, साहित्य, बैंकिंग और कला जगत की अनेक प्रमुख हस्तियों की मौजूदगी ने भोजपुरी से जुड़े प्रश्नों को व्यापक सार्वजनिक संदर्भ प्रदान किया। चार दशक से अधिक समय से भाषा और लोकसंस्कृति के संरक्षण के लिए सक्रिय संगठन ने स्पष्ट किया कि भोजपुरी का प्रश्न केवल भाषा का नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक अस्मिता और विरासत से जुड़ा विषय है।

महोत्सव में प्रदेश अध्यक्ष भाजपा, उत्तर प्रदेश एवं केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी मुख्य अतिथि रहे। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक, दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी, उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह तथा लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल समेत अनेक जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति रही। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष नीरज सिंह, विधान परिषद सदस्य पवन सिंह चौहान, विधायक शलभ मणि त्रिपाठी, कुशीनगर के विधायक पी.एन. पाठक, प्रदेश महामंत्री संजय राय और लखनऊ भाजपा के आनंद द्विवेदी सहित कई विशिष्ट अतिथियों ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की।

मंच पर राजनीति के साथ लोकसंस्कृति का विराट रंग

राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के बीच महोत्सव का मंच भोजपुरी की लोकधारा से भी सराबोर रहा। मनोज तिवारी, कल्पना पटवारी, गोपाल राय, अवधेश, सुरेश कुशवाहा और एस.पी. चौहान समेत 50 से अधिक लोक कलाकारों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। गीत-संगीत की इन प्रस्तुतियों ने भोजपुरी की उस जीवंत परंपरा को सामने रखा, जो गांवों की चौपाल से लेकर देश-विदेश में बसे भोजपुरी समाज तक अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
लेकिन इस आयोजन का महत्व केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं रहा। सम्मान समारोह के माध्यम से संगठन ने प्रशासन, राजनीति, चिकित्सा, साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा, बैंकिंग और सामाजिक सेवा से जुड़े लोगों को भोजपुरी समाज के व्यापक सरोकारों से जोड़ने का प्रयास किया।
‘भोजपुरी शिरोमणि’ से लेकर ‘भोजपुरी गौरव’ तक सम्मान

अखिल भारतीय भोजपुरी समाज ने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली विभूतियों को ‘भोजपुरी शिरोमणि’, ‘भोजपुरी रत्न’ और ‘भोजपुरी गौरव’ सम्मान से सम्मानित किया।
‘भोजपुरी शिरोमणि’ सम्मान से पंकज चौधरी, केशव प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, मनोज तिवारी और जयवीर सिंह को सम्मानित किया गया। समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रभुनाथ राय, राष्ट्रीय महासचिव मनोज सिंह और राष्ट्रीय सचिव वेद प्रकाश राय ने सम्मान प्रदान किए।

‘भोजपुरी रत्न’ सम्मान से पुलिस महानिदेशक सीवीसीआईसी विनोद कुमार सिंह, भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष नीरज सिंह, लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल, भाजपा प्रदेश महामंत्री संजय राय, विधान परिषद सदस्य पवन सिंह चौहान, विधायक शलभ मणि त्रिपाठी, विधायक पी.एन. पाठक, लखनऊ भाजपा के नगर अध्यक्ष आनंद द्विवेदी तथा पत्रकारिता जगत से जुड़े सुनील द्विवेदी, मनमोहन राय और देवकी नंदन मिश्रा समेत अन्य विभूतियों को सम्मानित किया गया। भाजपा उत्तर प्रदेश के मुख्य प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह को भी सम्मान प्रदान किया गया।
‘भोजपुरी गौरव’ सम्मान के लिए प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों से लेकर चिकित्सकों, शिक्षाविदों, बैंक अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, साहित्यकारों और कलाकारों तक को चुना गया। इनमें लखनऊ जोन के अपर पुलिस महानिदेशक प्रवीण कुमार त्रिपाठी (आईपीएस), एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. (डा.) आर.के. धीमान, लोक निर्माण विभाग के प्रमुख अभियंता एवं विभागाध्यक्ष अशोक कुमार द्विवेदी, डॉ. राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. (डा.) सी.एम. सिंह, पर्यटन महानिदेशक डॉ. वेदपति मिश्रा (आईएएस), संस्कृति विभाग के निदेशक संजय सिंह (आईएएस) तथा सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के निदेशक विशाल सिंह (आईएएस) प्रमुख रूप से शामिल रहे।
चिकित्सा, बैंकिंग और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अनेक लोगों तथा भोजपुरी कला-साहित्य की हस्तियों—कल्पना पटवारी, गोपाल राय, डॉ. वंदना द्विवेदी और डॉ. अनीता सिंह समेत अन्य विभूतियों—को भी सम्मानित किया गया।

42 वर्षों की यात्रा और अब बड़ा सवाल
अखिल भारतीय भोजपुरी समाज की इस पहल की पृष्ठभूमि चार दशक से अधिक लंबी है। संगठन के अनुसार, पिछले 42 वर्षों से वह भोजपुरी भाषा, लोकसंस्कृति, लोककला, लोकसाहित्य तथा भोजपुरी क्षेत्र की विरासत, खान-पान और वेशभूषा के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए निरंतर कार्यक्रम आयोजित करता रहा है। भोजपुरी महोत्सव और छठ पूजा जैसे आयोजनों के माध्यम से भोजपुरी संस्कृति को व्यापक स्तर पर पहुंचाने का प्रयास किया जाता रहा है।
इसी दीर्घ यात्रा के बीच अब भोजपुरी के संस्थागत भविष्य का प्रश्न अधिक मुखर होकर सामने आया है। महोत्सव में भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा देने, भोजपुरी अकादमी गठित करने और छठ महापर्व पर राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने की मांग को प्रदेश और केंद्र सरकार तक पहुंचाने पर जोर दिया गया।
भोजपुरी समाज के लिए यह मांग महज प्रशासनिक मान्यता का प्रश्न नहीं है। इसके पीछे भाषा, लोकसाहित्य, लोककला और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षण देने की आकांक्षा भी जुड़ी है। यही कारण है कि लखनऊ का यह महोत्सव सांस्कृतिक आयोजन से आगे बढ़कर भाषा और पहचान के प्रश्न पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभरा।

संगठन की ताकत भी दिखी
महोत्सव की सफलता में राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रभुनाथ राय, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रातयतन यादव, राष्ट्रीय महासचिव मनोज सिंह, राष्ट्रीय सचिव वेद प्रकाश राय, सांस्कृतिक प्रकोष्ठ अध्यक्ष हनुमान यादव, सलाहकार मनोज राय, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के.डी. अग्रवाल, राष्ट्रीय संयोजक पारसनाथ तिवारी, प्रदेश महामंत्री संजय सिंह एवं मनीष पोद्दार, प्रदेश सचिव विजय यादव, साहित्यिक प्रकोष्ठ अध्यक्ष सुबाष चंद्र रसिया, महिला प्रकोष्ठ की प्रदेश महामंत्री सुनीता राय, युवा प्रकोष्ठ अध्यक्ष सुनील सिंह सहित अनेक पदाधिकारियों और सक्रिय सदस्यों की भूमिका रही।
राष्ट्रीय सचिव वेद प्रकाश राय ने संगठन की 42 वर्षों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन राष्ट्रीय महासचिव मनोज सिंह ने किया।
लखनऊ के मंच से भोजपुरी ने एक बार फिर अपनी सांस्कृतिक उपस्थिति दर्ज कराई, लेकिन इस बार उसके स्वर में केवल उत्सव का उल्लास नहीं था। उसके साथ भाषा की मान्यता, संस्थागत संरक्षण और सांस्कृतिक अधिकारों की मांग भी स्पष्ट रूप से जुड़ी थी। अब इस आवाज की अगली दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि भोजपुरी को संवैधानिक पहचान और उससे जुड़े संस्थागत प्रश्नों पर शासन स्तर पर कितना गंभीर विमर्श आगे बढ़ता है।