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10% अतिरिक्त विद्युत अधिभार और अंधेरे का जून: क्या ऊर्जा विभाग जनता की जेब काटकर पूंजीपतियों के खजाने भर रहा है?

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10% अतिरिक्त विद्युत अधिभार और अंधेरे का जून: क्या ऊर्जा विभाग जनता की जेब काटकर पूंजीपतियों के खजाने भर रहा है?

उपभोक्ता संरक्षण उत्थान समिति ने उठाए गंभीर प्रश्न, महंगी बिजली खरीद और व्यापक कटौती को बताया सुनियोजित आर्थिक प्रहार

ऊर्जा मंत्री के ‘पर्याप्त बिजली उपलब्धता’ के दावों पर सवाल, आखिर फिर क्यों भुगत रही है जनता दोहरी यातना?

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ, 31 मई 2026।

उत्तर प्रदेश की करोड़ों जनता इस समय एक ऐसे आर्थिक और प्रशासनिक संकट के दौर से गुजर रही है, जहाँ उसे एक साथ महंगाई, अतिरिक्त विद्युत भार और अघोषित अंधकार—तीनों का सामना करना पड़ रहा है। जून 2026 के विद्युत बिलों में 10 प्रतिशत अतिरिक्त फ्यूल एवं विद्युत क्रय समायोजन अधिभार लगाए जाने के निर्णय ने पहले ही उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी थी, किंतु इसी के समानांतर पूरे जून माह के लिए व्यापक विद्युत कटौती की घोषणा ने जनाक्रोश को और प्रबल कर दिया है। उपभोक्ता संरक्षण उत्थान समिति ने इसे केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि आम उपभोक्ताओं पर सुनियोजित आर्थिक प्रहार बताया है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब प्रदेश के ऊर्जा मंत्री लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के पास पर्याप्त से अधिक विद्युत उपलब्ध है, तब आखिर प्रदेशवासियों को घंटों की बिजली कटौती क्यों झेलनी पड़ रही है? 29 मई को जारी आदेश के अनुसार 1 जून से 30 जून तक विभिन्न जनपदों में नियमित विद्युत अवरोध लागू रहेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में तो प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक अनेक चरणों में आपूर्ति बाधित रहने का कार्यक्रम निर्धारित किया गया है। ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि यदि बिजली उपलब्ध है, तो अंधेरा किसके हित में परोसा जा रहा है?

यहीं से शुरू होता है वह प्रश्न, जिसने पूरे विवाद को और अधिक गंभीर बना दिया है। ऊर्जा विभाग का तर्क है कि विभिन्न उत्पादन इकाइयों का अनुरक्षण आवश्यक है, किंतु उपभोक्ता संरक्षण उत्थान समिति पूछती है कि जब ग्रीष्म ऋतु विद्युत मांग का चरम काल होती है, तब ही अनुरक्षण का कार्यक्रम क्यों बनाया जाता है? सर्दियों के उन महीनों में, जब विद्युत मांग न्यूनतम रहती है, तब ऐसी गतिविधियाँ क्यों नहीं संचालित की जातीं? समिति का आरोप है कि अनुरक्षण का यह तर्क वस्तुतः एक आवरण मात्र है, जिसके पीछे कहीं अधिक गंभीर आर्थिक समीकरण छिपे हुए हैं।

समिति का दावा है कि उत्पादन इकाइयों को सीमित क्षमता पर संचालित करके या अस्थायी रूप से बंद रखकर निजी स्रोतों से अपेक्षाकृत महंगी बिजली खरीदी जाती है। परिणामस्वरूप एक ओर पूंजीगत हितों को लाभ पहुँचता है, तो दूसरी ओर उसकी कीमत आम उपभोक्ता से वसूली जाती है। यही कारण है कि आज किसान, मजदूर, व्यापारी और मध्यमवर्गीय परिवार स्वयं को ऐसी व्यवस्था के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं, जहाँ भुगतान भी उन्हें करना पड़ रहा है और सुविधाओं से वंचित भी वही हो रहे हैं।

इस पूरे प्रकरण का सबसे रहस्यमय और विवादास्पद पक्ष तथाकथित ‘क्षमता शुल्क’ है। उपभोक्ता संरक्षण उत्थान समिति के अनुसार विद्युत कंपनियाँ केवल बिजली खरीदने पर ही नहीं, बल्कि कई परिस्थितियों में बिजली न खरीदने पर भी क्षमता शुल्क का भुगतान करती हैं। समिति का प्रश्न है कि यदि किसी उपभोक्ता को वस्तु प्राप्त ही न हो, तो उसके लिए भुगतान किस सिद्धांत के अंतर्गत किया जाए? यह प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक उत्तरदायित्व और वित्तीय पारदर्शिता से भी जुड़ा हुआ है।

आधिकारिक दस्तावेजों में अन्य वार्षिक व्ययों के नाम पर हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान दर्ज है। समिति का आरोप है कि इन मदों में व्यय की वास्तविक आवश्यकता और पारदर्शिता को लेकर अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं। उनका कहना है कि यदि विभिन्न शुल्कों और व्ययों का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए तो अनेक ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं, जो वर्तमान व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दें।

विवाद का एक और महत्वपूर्ण पक्ष बिजली खरीद की दरों को लेकर है। समिति का दावा है कि जहाँ नियामक आयोग द्वारा औसत विद्युत क्रय दर लगभग 4.94 रुपये प्रति यूनिट स्वीकृत की गई थी, वहीं व्यवहार में इससे अधिक दरों पर बिजली खरीदे जाने के उदाहरण सामने आ रहे हैं। इसी संदर्भ में अडानी समूह के साथ हुए दीर्घकालिक विद्युत क्रय समझौते को भी समिति ने चर्चा के केंद्र में रखा है। उनका प्रश्न है कि यदि सस्ती दरों पर विकल्प उपलब्ध हैं, तो महंगे समझौते किन परिस्थितियों और किन तर्कों के आधार पर किए जा रहे हैं?

समिति का यह भी आरोप है कि विद्युत निगमों और उनसे संबद्ध संस्थाओं के शीर्ष प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारी ही नीतिगत निर्णयों की दिशा निर्धारित करते हैं। बिजली खरीद, दीर्घकालिक अनुबंध, अनुरक्षण कार्यक्रम तथा वित्तीय प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषय उन्हीं के नियंत्रण में रहते हैं। इसलिए यदि जनता पर अतिरिक्त आर्थिक भार डाला जा रहा है, तो उसकी जवाबदेही भी स्पष्ट रूप से निर्धारित की जानी चाहिए।

इस बीच आम उपभोक्ता स्वयं को ऐसी स्थिति में पा रहा है जहाँ उससे स्मार्ट मीटर का खर्च भी लिया गया, प्रीपेड व्यवस्था भी लागू की गई, अतिरिक्त 10 प्रतिशत अधिभार भी वसूला जा रहा है और इसके बावजूद निर्बाध विद्युत आपूर्ति का वादा पूरा होता दिखाई नहीं दे रहा। जनता के मन में यह स्वाभाविक प्रश्न उठ रहा है कि आखिर त्याग और समायोजन केवल उपभोक्ता ही क्यों करे, जबकि निर्णय लेने वाली व्यवस्था किसी प्रत्यक्ष जवाबदेही से मुक्त दिखाई देती है।

उपभोक्ता संरक्षण उत्थान समिति ने इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच, महंगे विद्युत क्रय समझौतों की समीक्षा, क्षमता शुल्क की पुनर्समीक्षा तथा उत्तरदायी अधिकारियों की जवाबदेही तय किए जाने की मांग की है। समिति का मानना है कि यदि इन विषयों पर निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो जाए, तो ऊर्जा क्षेत्र की अनेक विसंगतियाँ स्वतः उजागर हो सकती हैं।

प्रदेशवासियों के बीच एक विश्वास यह भी है कि यदि इन तथ्यों और जनभावनाओं की वास्तविक प्रतिध्वनि मुख्यमंत्री तक निष्पक्ष रूप से पहुँचती है, तो वे निश्चित रूप से जनता के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे। सुशासन, पारदर्शिता और जनकल्याण की अपनी स्थापित छवि के कारण मुख्यमंत्री से लोगों को अपेक्षा है कि वे ऊर्जा विभाग की कार्यप्रणाली की गंभीर समीक्षा कराएँगे। यदि जनता पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत अधिभार का औचित्य सिद्ध नहीं हो पाता, तो विभाग को अपने कदम पीछे खींचने पड़ सकते हैं। जनचर्चाओं में यह प्रश्न भी तीव्रता से उठ रहा है कि जब मुख्यमंत्री लगातार विकास और जनसुविधाओं के विस्तार की बात कर रहे हैं, तब ऊर्जा विभाग की नीतियाँ आखिर किसके हित साध रही हैं—जनता के या कुछ विशेष आर्थिक समूहों के? आने वाले दिनों में इस प्रश्न का उत्तर ही तय करेगा कि अतिरिक्त भार वापस लिया जाता है या जनता का असंतोष और अधिक मुखर होकर सामने आता है।

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