अमौसी जोन के दस्तावेज़ों ने खड़े किए कई प्रश्न; सीमित समय, बार-बार री-टेंडर और बिड ओपनिंग प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता पर बहस तेज
अविजित आनंद दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ।मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (एमवीवीएनएल) के अमौसी जोन में जारी एक टेंडर ने निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध टेंडर दस्तावेज़ों के अनुसार करोड़ों रुपये के कार्य से संबंधित निविदा को प्रकाशित करने से लेकर बिड जमा कराने और तकनीकी बिड खोलने तक की पूरी प्रक्रिया मात्र तीन दिनों के भीतर पूरी कर दी गई। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या इतनी कम अवधि वास्तव में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त थी?
दस्तावेज़ों के अनुसार टेंडर संख्या 43/SE(T)/AMAUSI ZONE/2026-27 (आईडी: 2026_MVVNL_1172138_2) 28 जुलाई 2026 को प्रकाशित हुआ, जबकि 31 जुलाई को दोपहर 12 बजे तक निविदाएं जमा कराई गईं और उसी दिन शाम तक तकनीकी बिड भी खोल दी गई। टेंडर की अर्नेस्ट मनी (ईएमडी) लगभग 2.11 लाख रुपये निर्धारित थी।
यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न जन्म लेता है। क्या कोई नई या स्वतंत्र कंपनी मात्र तीन दिनों के भीतर बैंक गारंटी, तकनीकी दस्तावेज, अनुभव प्रमाण-पत्र, वित्तीय अभिलेख और अन्य आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर सकती है? यदि नहीं, तो क्या इतनी कम अवधि प्रतिस्पर्धा को स्वाभाविक रूप से सीमित नहीं कर देती? क्या इससे केवल पहले से तैयार कंपनियों को लाभ मिलने की आशंका उत्पन्न होती है? इन प्रश्नों का उत्तर संबंधित विभाग को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।
तकनीकी बिड ओपनिंग के दस्तावेज़ भी कई जिज्ञासाएं उत्पन्न करते हैं। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार 31 जुलाई को बिड ओपनिंग प्रक्रिया में दो बिड ओपनर—ब्रह्म पाल और राहुल यादव—दर्ज हैं, जिनकी डिजिटल प्रविष्टियों में लगभग 14 मिनट का अंतर दिखाई देता है। अंतिम डिजिटल हस्ताक्षर केवल एक अधिकारी के नाम से प्रदर्शित होने की बात सामने आई है। यदि दस्तावेज़ सही हैं, तो यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि पूरी प्रक्रिया नियमानुसार किस स्तर पर और किन अधिकारियों की उपस्थिति में सम्पन्न हुई। इस संबंध में विभाग की आधिकारिक व्याख्या अत्यंत आवश्यक है।
मामले का एक और महत्वपूर्ण पक्ष बार-बार री-टेंडर होना है। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार पहले एक बार कथित रूप से गलत बीओक्यू का हवाला देकर और बाद में प्रशासनिक कारणों से प्रक्रिया दोबारा प्रारंभ की गई। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या बार-बार री-टेंडर की आवश्यकता वास्तव में प्रशासनिक कारणों से उत्पन्न हुई या इसके पीछे कोई अन्य कारण था? इसका उत्तर भी केवल विभागीय जांच और आधिकारिक स्पष्टीकरण से ही मिल सकता है।
सूत्रों के अनुसार अमौसी जोन के अन्य टेंडरों तथा सेंट्रल जोन की कुछ निविदाओं में भी कम समय, बार-बार समयवृद्धि, सीमित प्रतिस्पर्धा और कुछ कंपनियों की लगातार उपस्थिति जैसे समान पैटर्न दिखाई देने की चर्चा है। यदि ऐसा है, तो यह विषय केवल एक टेंडर तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि व्यापक प्रशासनिक समीक्षा की मांग करता है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी शेष है।
जब इस संबंध में विभागीय अधिकारियों से प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया गया, तो स्पष्ट उत्तर प्राप्त नहीं हो सका। विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों ने मामले को दूसरे अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र का बताते हुए टिप्पणी करने से परहेज किया। विभाग की यह चुप्पी भी पारदर्शिता को लेकर उठ रहे प्रश्नों को और गहरा कर रही है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन से जुड़े कार्यों की निविदा प्रक्रिया में इतनी अल्प अवधि, बार-बार री-टेंडर और प्रक्रियात्मक अस्पष्टताएं सामान्य प्रशासनिक घटनाएं हैं, या फिर इनकी स्वतंत्र तकनीकी एवं सतर्कता जांच आवश्यक है?
जनहित और सार्वजनिक धन की रक्षा की दृष्टि से अपेक्षा यही है कि मध्यांचल विद्युत वितरण निगम इस पूरे प्रकरण पर विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करे। यदि प्रक्रिया पूरी तरह नियमसम्मत रही है, तो तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए; और यदि कहीं कोई प्रक्रियात्मक त्रुटि या अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच कर उत्तरदायित्व तय किया जाना चाहिए। पारदर्शिता ही किसी भी सार्वजनिक संस्था की सबसे बड़ी विश्वसनीयता होती है।