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ढाई लाख युवाओं की मेहनत पर भारी पड़े रसूखदार रिश्ते? विधानसभा भर्ती विवाद की परतें खोल रहे न्यायालयी अभिलेख

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Dainik India News

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ढाई लाख युवाओं की मेहनत पर भारी पड़े रसूखदार रिश्ते? विधानसभा भर्ती विवाद की परतें खोल रहे न्यायालयी अभिलेख

भर्ती या भाई-भतीजावाद? चयन सूची में प्रभावशाली परिवारों के नामों ने बढ़ाई हलचल


हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद फिर चर्चा में विधानसभा भर्ती प्रकरण, क्या सामने आएगा पूरा सच?

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।उत्तर प्रदेश विधानसभा एवं विधान परिषद सचिवालय में वर्ष 2020-21 के दौरान संपन्न हुई भर्तियां आज भी प्रदेश की सबसे चर्चित और विवादास्पद भर्ती प्रक्रियाओं में गिनी जाती हैं। यह विवाद केवल कुछ नियुक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लाखों युवाओं की आकांक्षाओं, विश्वास और वर्षों की कठिन मेहनत से भी जुड़ा हुआ है, जिन्होंने सरकारी सेवा में चयन का सपना लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लिया था। समय बीतने के साथ यह भर्ती प्रक्रिया न्यायालय की चौखट तक पहुंची और इसके साथ ऐसे अनेक प्रश्न खड़े हुए, जिनका उत्तर आज भी अभ्यर्थी, समाज और न्याय व्यवस्था तलाश रही है।

वर्ष 2020 में विधान परिषद सचिवालय ने विभिन्न श्रेणियों के 99 पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। इसके बाद नवंबर एवं दिसंबर 2020 में प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाएं आयोजित की गईं तथा मार्च 2021 में परिणाम घोषित किए गए। दूसरी ओर विधानसभा सचिवालय ने दिसंबर 2020 में 87 पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ की। जनवरी 2021 में प्रारंभिक परीक्षा, फरवरी में मुख्य परीक्षा तथा मार्च में टाइपिंग टेस्ट आयोजित किया गया। इसके बाद 26 मार्च 2021 को अंतिम परिणाम घोषित कर दिए गए।

सूत्रों के अनुसार दोनों भर्ती प्रक्रियाओं में लगभग ढाई लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था। हजारों परिवारों की उम्मीदें इन परीक्षाओं से जुड़ी थीं। परिणाम घोषित होने के बाद कुछ असफल अभ्यर्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चयन सूची का विश्लेषण करना शुरू किया। इसी दौरान कुछ ऐसे नाम सामने आने लगे जिनके संबंध प्रभावशाली अधिकारियों, राजनीतिक व्यक्तियों तथा विधानसभा और विधान परिषद सचिवालय से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारियों से बताए गए।

न्यायालय में प्रस्तुत याचिकाओं और अभिलेखों के अनुसार तत्कालीन प्रमुख सचिव संसदीय कार्य जय प्रकाश सिंह के पुत्र एवं पुत्री का चयन समीक्षा अधिकारी (RO) पद पर हुआ। विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे के कई संबंधियों के चयन का भी उल्लेख याचिकाओं में किया गया। इसी प्रकार विधान परिषद के तत्कालीन प्रमुख सचिव डॉ. राजेश सिंह के पुत्र, पूर्व मंत्री महेंद्र सिंह के भतीजे, पूर्व प्रमुख सचिव एवं उपलोकायुक्त दिनेश कुमार सिंह के पुत्र, पूर्व ओएसडी अजय कुमार सिंह के पुत्र तथा अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों से जुड़े अभ्यर्थियों के चयन का उल्लेख भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों का हिस्सा बना।

इन नामों के सामने आने के बाद विवाद और गहरा गया। सवाल उठने लगे कि क्या यह मात्र संयोग था अथवा चयन प्रक्रिया में ऐसी परिस्थितियां मौजूद थीं जिनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। यही प्रश्न आगे चलकर न्यायालय में दायर याचिकाओं का आधार बना।

विवाद का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष भर्ती एजेंसियों की भूमिका को लेकर सामने आया। न्यायालयी अभिलेखों के अनुसार विधानसभा भर्ती प्रक्रिया का दायित्व Broadcasting Engineering Consultants India Limited (BECIL) को सौंपा गया था। बाद में BECIL द्वारा TSR Data Processing को कार्य आवंटित किया गया। वहीं विधान परिषद भर्ती प्रक्रिया में राभव (Rabhav) नामक संस्था की भूमिका का उल्लेख भी न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेजों में किया गया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इन एजेंसियों से जुड़े व्यक्तियों के परिजनों को भी नियुक्तियां मिलीं, जिससे चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न और गहरे हो गए।

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू वह नियम संशोधन भी है जिस पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गंभीर टिप्पणियां की थीं। न्यायालयी अभिलेखों के अनुसार वर्ष 2016 तक विधानसभा सचिवालय की भर्तियां उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से कराई जाती थीं। बाद में नियमों में संशोधन कर भर्ती की जिम्मेदारी स्वयं विधानसभा सचिवालय को सौंप दी गई। इसी प्रकार वर्ष 2019 में विधान परिषद सचिवालय ने भी अपने नियमों में परिवर्तन किया। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इसी परिवर्तन के बाद पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हुए।

18 सितंबर 2023 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कठोर टिप्पणियां करते हुए कहा कि भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी कई परिस्थितियां संदेह उत्पन्न करती हैं। न्यायालय ने मामले को जनहित याचिका (PIL) के रूप में परिवर्तित करने तथा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से जांच कराने का निर्देश दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सेवाओं में भर्ती निष्पक्षता, पारदर्शिता और समान अवसर के सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए तथा इन सिद्धांतों से किसी भी प्रकार का विचलन गंभीर चिंता का विषय है।

इसके बाद 3 अक्टूबर 2023 को पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान भी उच्च न्यायालय ने अपने पूर्व आदेश को बरकरार रखा। न्यायालय ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों और अभिलेखों के अध्ययन के आधार पर प्रथम दृष्टया ऐसे संकेत मिलते हैं जिनकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है। न्यायालय ने भर्ती प्रक्रिया में शामिल बाहरी एजेंसियों की विश्वसनीयता और चयन प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं पर भी गंभीर प्रश्न उठाए।

उच्च न्यायालय के आदेश के बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry) प्रारंभ कर संबंधित अभिलेखों का परीक्षण शुरू किया। हालांकि बाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम स्थगन आदेश जारी किए जाने के कारण जांच प्रक्रिया प्रभावित हुई। इसके बावजूद यह मामला आज भी न्यायिक और सार्वजनिक चर्चा का विषय बना हुआ है।

इस भर्ती विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इससे केवल कुछ नियुक्तियों का प्रश्न नहीं जुड़ा है, बल्कि उन लाखों युवाओं का विश्वास भी जुड़ा है जो प्रतियोगी परीक्षाओं को अपने भविष्य का आधार मानते हैं। यदि चयन प्रक्रिया पर प्रश्न उठते हैं तो उसका प्रभाव केवल एक भर्ती तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी पड़ता है।

इसी क्रम में याचिकाकर्ता केपी सिंह की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन. सिंह ने मीडिया के समक्ष उनका पक्ष रखते हुए कहा कि विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे को जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उनके वर्तमान पद से पृथक किए जाने पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि केपी सिंह का मानना है कि मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के लिए ऐसा कदम आवश्यक हो सकता है। रीना एन. सिंह ने बताया कि केपी सिंह ने माननीय उच्च न्यायालय से अनुरोध किया है कि भर्ती प्रक्रिया से जुड़े सभी तथ्यों, अभिलेखों और परिस्थितियों की गहन जांच कराई जाए, ताकि पूरे प्रकरण का सत्य सामने आ सके। हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय माननीय न्यायालय द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों, दस्तावेजों और विधिक प्रावधानों के आधार पर ही लिया जाएगा।

अब प्रदेश के लाखों अभ्यर्थियों, उनके परिवारों और आम नागरिकों की निगाहें न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हैं। सभी यह जानना चाहते हैं कि आखिर इस बहुचर्चित भर्ती विवाद का अंतिम सच क्या है। क्या जांच से सभी प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे, क्या भर्ती प्रक्रिया पर लगे आरोप सिद्ध होंगे या खारिज होंगे, और क्या भविष्य में ऐसी भर्तियों के लिए अधिक पारदर्शी व्यवस्था विकसित की जाएगी? इन सभी प्रश्नों का उत्तर आने वाला समय, न्यायिक परीक्षण और जांच एजेंसियों की निष्पक्ष कार्रवाई ही दे सकेगी।

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